संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चतुर्भिरद्भुतैः सिद्धैः कामरूपैर्मनोजवैः । अनुयातमथोत्प्लुत्य स्त्रीपुंसौ हरिणौ तदा । अगस्त्यचरणौ नत्वा समारुरुहतुर्मुदा ॥ ६० ॥ दिव्यदेहधरौ भूत्वा शंखचक्रादिचिह्नितौ । गतौ च वैष्णवं लोकं सर्वदेवनमस्कृतम् । पश्यतां सर्वभूतानां भार्गवागस्त्ययोस्तथा ॥ ६१ ॥
अगस्त्य महामुनि ने कहा कि हे राम ! श्री राधा के कान्त-परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण का यह समस्त सिद्धियों का प्रदान कर देने वाला प्रेमामृत नाम वाला स्तोत्र मैंने आपको बता दिया है ।५६। हे महाभाग राम ! यह स्तोत्र अत्यन्त दुर्लभ है । मैंने कथाओं का वर्णन करते हुए साक्षात् भगवान् शेष के ही मुख से इसका श्रवण किया है ।५७। इस लोक में जितने भी मन्त्रों के समूह हैं तथा स्तोत्र और कवच आदि हैं इस त्रिभुवन में वे सभी इस स्तोत्र के ही परिशीलन करने से सिद्ध हो जाया करते हैं । वसिष्ठजी ने कहा—हे महाराज ! इस रीति से श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तव को बतलाकर जब तक अगस्त्य मुनि विरत हुए थे तभी तक वहाँ स्वर्ग से एक यान आ गया था ।५८-५९। उस मान में चार स्वेच्छया स्वरूप धारण करने वाले—मन के ही समान वेग से समन्वित और अतीव अद्भुत सिद्धों से युक्त था । इसके अनन्तर वे दोनों हरिण और हरिणी स्त्री एवं पुरुष के स्वरूप में होकर अगस्त्य मुनि को प्रणाम करके उस समय में परम हर्ष से उछल कर उस यान में समारूढ़ हो गये ।६०। वे दोनों परम दिव्य देह के धारण करने वाले हो गये थे जो शङ्ख-चक्र आदि भगवान् के चिह्नों से संयुत थे । इसके पश्चात् वे समस्त देवगणों के द्वारा वन्दित भगवान् विष्णु के लोक में चले गये थे । उस समय इस विलक्षण घटना को वहाँ पर संस्थित सभी प्राणी तथा भार्गव राम और अगस्त्य मुनि भी देख रहे थे उन सबकी आँखों के ही सामने ऐसा हुआ था ।६१।
भार्गव चरित्र (१)
वसिष्ठ उवाच— दृष्ट्वा परशुरामस्तु तदाश्चर्यं महाद्भुतम् । जगाद सर्ववृत्तान्तं मृगयोस्तु यथाश्रुतम् ॥ १॥