संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र (१) ] [ २८६
तच्छ्रुत्वा भगवान्साक्षादगस्त्यः कुंभसंभवः । मोदमान उवाचेदं भार्गवं पुरतः स्थितम् ॥२ अगस्त्य उवाच- शृणु राम महाभाग कार्याकार्यविशारद । हितं वदामि यत्तेऽद्य तत्कुरुष्व समाहितः ॥३ इतो विदूरे सुमहत्स्थानं विष्णोः सुदुर्लभम् । पदानि यत्र दृश्यंते न्यस्तानि सुमहात्मना ॥४ यत्र गंगा समुद्भूता वामनस्य महात्मनः । पदाग्रात्क्रमतो लोकांस्तद्वलेस्तु विनिग्रहे ॥५ तत्र गत्वा स्तवं चेदं मासमेकमनन्यधीः । पठस्व नियमेनैव नियतो नियताशनः ॥६ यत्त्वया कवचं पूर्वमभ्यस्तं सिद्धिमिच्छता । शत्रूणां निग्रहार्थाय तच्च ते सिद्धिदं भवेत् ॥७
श्री वसिष्ठजी ने कहा—उस समय में परशुराम ने इस महान आश्चर्य को देखकर उन दोनों हरिण-हरिणियों का सम्पूर्ण वृत्तान्त जैसा भी सुना गया था अगस्त्य मुनि से कह दिया था।१। साक्षात् कुम्भ से समुत्पत्ति ग्रहण करने वाले अगस्त्य भगवान् ने इस वृत्तान्त का श्रवण करके बहुत ही अधिक प्रसन्न होते हुए अपने समक्ष में संस्थित भार्गव राम से यह कहा था।२। अगस्त्य जी ने कहा—हे राम ! आप तो महान् भाग वाले हो और क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इस विषय में आप बहुत विद्वान हैं। आज मैं जो आपके हित की बात है उसको आपको बतलाता हूँ। उसे आप बहुत ही सावधान होते हुए कर डालिए ।३। इस स्थल से विशेष दूरी पर भगवान विष्णु का परम दुर्लभ एक बड़ा भारी स्थान है जहाँ पर भगवान् के कमनीय कोमल चरणों के चिह्न दिखलाई दिया करते हैं जहाँ पर महान् आत्मा वाले प्रभु ने उन अपने चरणों को रक्खा था।४। यह वह स्थल है जहाँ पर प्रभु ने वामन का अवतार लेकर राजा बलि को विनिगृहीत करने के कार्य में अपने चरण के अग्रभाग से सभी लोकों को समाक्रान्त कर लिया था। उस समय में ब्रह्माजी ने भगवान के चरणों को प्रक्षालित किया था और जहाँ पर महात्मा वामन के चरणों के जलसे गङ्गा