संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २८६
तच्छ्रुत्वा भगवान्साक्षादगस्त्यः कुंभसंभवः । मोदमान उवाचेदं भार्गवं पुरतः स्थितम् ॥२ अगस्त्य उवाच- शृणु राम महाभाग कार्याकार्यविशारद । हितं वदामि यत्तेऽद्य तत्कुरुष्व समाहितः ॥३ इतो विदूरे सुमहत्स्थानं विष्णोः सुदुर्लभम् । पदानि यत्र दृश्यंते न्यस्तानि सुमहात्मना ॥४ यत्र गंगा समुद्भूता वामनस्य महात्मनः । पदाग्रात्क्रमतो लोकांस्तद्वलेस्तु विनिग्रहे ॥५ तत्र गत्वा स्तवं चेदं मासमेकमनन्यधीः । पठस्व नियमेनैव नियतो नियताशनः ॥६ यत्त्वया कवचं पूर्वमभ्यस्तं सिद्धिमिच्छता । शत्रूणां निग्रहार्थाय तच्च ते सिद्धिदं भवेत् ॥७
श्री वसिष्ठजी ने कहा—उस समय में परशुराम ने इस महान आश्चर्य को देखकर उन दोनों हरिण-हरिणियों का सम्पूर्ण वृत्तान्त जैसा भी सुना गया था अगस्त्य मुनि से कह दिया था।१। साक्षात् कुम्भ से समुत्पत्ति ग्रहण करने वाले अगस्त्य भगवान् ने इस वृत्तान्त का श्रवण करके बहुत ही अधिक प्रसन्न होते हुए अपने समक्ष में संस्थित भार्गव राम से यह कहा था।२। अगस्त्य जी ने कहा—हे राम ! आप तो महान् भाग वाले हो और क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इस विषय में आप बहुत विद्वान हैं। आज मैं जो आपके हित की बात है उसको आपको बतलाता हूँ। उसे आप बहुत ही सावधान होते हुए कर डालिए ।३। इस स्थल से विशेष दूरी पर भगवान विष्णु का परम दुर्लभ एक बड़ा भारी स्थान है जहाँ पर भगवान् के कमनीय कोमल चरणों के चिह्न दिखलाई दिया करते हैं जहाँ पर महान् आत्मा वाले प्रभु ने उन अपने चरणों को रक्खा था।४। यह वह स्थल है जहाँ पर प्रभु ने वामन का अवतार लेकर राजा बलि को विनिगृहीत करने के कार्य में अपने चरण के अग्रभाग से सभी लोकों को समाक्रान्त कर लिया था। उस समय में ब्रह्माजी ने भगवान के चरणों को प्रक्षालित किया था और जहाँ पर महात्मा वामन के चरणों के जलसे गङ्गा
२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
का समुद्भव हुआ था ।५। अब आप उसी स्थल में जाकर अनन्य बुद्धि वाले होते हुए एक मास तक इस स्तोत्र का पाठ करो और पूर्ण नियम से ही नियत तथा नियत अशन (भोजन) वाले होकर रहो ।६। आपने सिद्धि की इच्छा रखते हुए जिस कवच का पूर्व में अभ्यास किया था और अपने समस्त शत्रुओं के निग्रह करने की कामना से ही किया था वही अब आपको सिद्धि के देने वाला हो जायगा ।७।
वसिष्ठ उवाच–
एवमुक्तो ह्यगस्त्येन रामः शत्रुनिबर्हणः ।
नमस्कृत्य मुनिं शांतं निर्जगाश्रमाद्बहिः ॥८
पुनस्तेनैव मार्गेण संप्राप्तस्तत्र सत्वरम् ।
यत्रोत्तरात्पदन्यासान्निर्गता स्वर्णदी नृप ॥९
तत्र वासं प्रकल्प्यासावकृतव्रणसंयुतः ।
समभ्यस्यत्स्तवं दिव्यं कृष्णप्रेमामृताभिधम् ॥१०
नित्यं व्रतपतेस्तस्य स्तोत्रं तुष्टोऽभवद्धरिः ।
जगाम दर्शनं तस्य जामदग्न्यस्य भूपते ॥११
चतुर्व्यूहाधिपः साक्षात्कृष्णः कमललोचनः ।
किरीटेनार्कवर्णेन कुंडलाभ्यां च राजितः ॥१२
कौस्तुभोद्भासितोरस्कः पीतवासा घनप्रभः ।
मुरलीवादनपरः साक्षान्मोहनरूपधृक् ॥१३
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय जामदग्न्यो मुदान्वितः ।
प्रणम्य दंडवद्भूमौ तुष्टाव प्रयतो विभुम् ॥१४
वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से शत्रुओं के निवर्हण करने वाले राम से जब अगस्त्य मुनि के द्वारा कहा गया था तो फिर राम ने मुनि को नमस्कार करके जो महा मुनि परम शान्त स्वभाव वाले थे उस आश्रम से राम बाहिर निकलकर चला गया था ।८। हे भूप ! फिर उसी मार्ग से वह बहुत शीघ्र वहाँ पर पहुँच गया था जहाँ पर उत्तर पद के न्यास से स्वर्ग गङ्गा निकली थी ।९। उस स्थल पर उस परशुराम ने अकृतव्रण के साथ ही रहकर निवास करने का अपने मन में संकल्प किया था और श्रीकृष्ण प्रेमा-
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६१
मृत नामक दिव्य स्तव का भली-भांति अभ्यास किया था ।१०। हे भूपते ! ब्रज के स्वामी उन भगवान श्रीकृष्ण उस पर परम प्रसन्न हो गये थे और उन्होंने जमदग्नि के पुत्र के लिए अपना दर्शन दिया था ।११। अब भगवान के स्वरूप का वर्णन किया जाता है जिस रूप से राम को उन्होंने दर्शन दिया था—उनके नेत्र कमलों के समान परम सुन्दर थे—भगवान कृष्ण साक्षात् चतुर्व्यूहों के अधिप थे—सूर्य के वर्ण के सदृश जाज्वल्यमान किरीट और दोनों कानों में कुण्डलों की शोभा से समन्वित थे ।१२। वक्षःस्थल में कौस्तुभ महामणि धारण किये हुए थे जिसकी प्रभा से उनका उरःस्थल समु- द्भासित हो रहा था—पीताम्बर का परिधान करने वाले नील जलद के समान प्रभा वाले थे । उनके करकमलों में वंशी थी जिसका वादन वे कर रहे थे तथा वे साक्षात् मोहन करने वाले स्वरूप को धारण करने वाले थे । ।१३। ऐसे उन भगवान् श्री कृष्ण के दर्शन करके जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने तुरन्त ही अपने आसन से उठकर गात्रोत्थान दिया था और वह बहुत ही हर्ष के समन्वित हो गये थे । उस राम ने उनके सामने चरणों में दण्ड की भांति गिरकर उन विभु को प्रणाम किया था और फिर बहुत ही प्रणत होकर उनकी स्तुति की थी ।१४।
परशुराम उवाच— नमो नमः कारणविग्रहाय प्रपन्नपालाय सुरार्त्तिहारिणे । ब्रह्मेशविष्णुद्रमुखस्तुताय ततोऽस्मि नित्यं परमेश्वराय ॥१५
यं वेदवादैर्विविधप्रकारैर्निर्णोतुमीशानमुखा न शक्नुयुः । तं त्वामनिर्देश्यमजं पुराणमनंतमीडे भव मे दयापरः ॥१६
यस्त्वेक ईशो निजवांछितप्रदो धत्ते तनूर्लोकविहाररक्षणे । नानाविधा देवमनुष्यतिर्यंग्यादःसु भूमेर्भरवारणाय ॥१७
तं त्वामहं भक्तजनानुरक्तं विरक्तमत्यंतमपींदिरादिषु । स्वयं समक्षं व्यभिचारदुष्टचित्तास्वपि प्रेमनिबद्धमानसम् ॥१८
यं वै प्रसन्ना असुराः सुरा नराः सकिन्नरास्तिर्यंग्योतयोऽपि हि ।
२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गताः स्वरूपं निखिलं विहाय ते देहस्त्र्यपत्यार्थम- मत्वमीश्वर ॥१९॥ तं देवदेवं भजतामभीप्सितप्रदं निरीहं गुणवर्जितं च । अचिंत्यमव्यक्तमघौघनाशनं प्राप्तोऽरणं प्रेमनिधानमादरात् ॥२०॥ तर्पंति तापैर्विविधैः स्वदेहमन्ये तु यज्ञैर्विविधैर्यजंति । स्वप्नेऽपि ते रूपमलौकिकं विभो पश्यन्ति नैवार्थनिबद्धवासनाः ॥२१॥
परशुराम ने कहा—भक्तों की सुरक्षा करने के कारणों से शरीर धारण करने वाले—अपनी शरणागति में सम्प्राप्त जनों का प्रतिपालन करने वाले और सुरगणों की पीड़ा का हरण करने वाले आपके लिए मेरा बार-म्बार नमस्कार है । ब्रह्मा-शिव-विष्णु और इन्द्र जिनमें प्रमुख हैं ऐसे समस्त देवगणों के द्वारा जिनका स्तवन किया गया है ऐसे परमेश्वर प्रभु के लिए मैं नित्य ही प्रणाम निवेदन करने वाला हूँ ।१५। शिव आदि प्रमुख देव भी अनेक प्रकार के वेदों के वादों के द्वारा जिनके स्वरूप का निर्णय करने में समर्थ नहीं हुआ करते हैं उन निर्देशन करने के योग्य-अजन्मा-पुराण पुरुष तथा अनन्त प्रभु का मैं स्तवन करता हूँ । आप मेरे ऊपर दया में परायण हो जाइए ।१६। जो एक ही ईश हैं और नित्य ही अपने भक्तों के मनोवाञ्छितों को प्रदान करने वाले हैं वे आप इस भूमि के भार को उतारने के लिए लोकों में विहार और उनकी रक्षा करने के वास्ते अनेक प्रकार के देव-मनुष्य-तिर्यग् तथा जल जीवों में शरीर धारण करके अवतार ग्रहण किया करते हैं ।१७। ऐसे उन प्रभु आपको मैं स्वयं साक्षात् देख रहा हूँ जो अपने ही भक्तों में अनुराग रखने वाले हैं और इन्दिरा आदि में भी अत्यन्त विरक्त रहते हैं तथा व्यभिचार से दुष्ट चित्त वालियों में भी प्रेम से निबद्ध मन वाले हैं ।१८। हे ईश्वर ! जिन आपके स्वरूप की प्राप्ति परम प्रसन्न होते हुए सम्पूर्ण अपने देह-स्त्री-सन्तति और वैभव की ममता का त्यागकर असुर-सुर-नर-किन्नर-और तिर्यग् योनि वाले भी कर चुके हैं ।१९। उन्हीं देवों के भी देव-भजन करने वालों के लिये अभीप्सित प्रदान करने वाले-निरीह गुणों से रहित अर्थात् रजोगुणादि से रहित-न चिन्तन करने के योग्य-अव्यक्त और अघों के समुदायों के विनाश करने वाले-अरण तथा प्रेम के निधान
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६३
आपको मैंने आदर से इस समय साक्षात् प्राप्त कर लिया है। २०। अन्य जन तो नाना भाँति के तपश्चर्या जनित तापों से अपने देह को संतप्त किया करते हैं और विविध यज्ञों के द्वारा आपका यजन किया करते हैं। हे विभो ! इस प्रकार के परम क्लिष्ट विधानों के करते हुए भी वे सब किसी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए निबद्ध वासना वाले आपके इस अलौकिक स्वरूप का दर्शन स्वप्न में भी नेत्रों से नहीं किया करते हैं । २१।
ये वै त्वदीयं चरणं भवश्रमान्निर्विण्णचित्ता
विधिवत्स्मरंति ।
नमन्ति भक्त्याऽथ समर्च्चयन्ति वै परस्परं संसदि
वर्णयंति ॥२२
तेनेकजन्मोद्भवपंकभेदमप्रसक्तचित्ता भवतोंऽघ्रिपद्मे ।
तरंति चान्यानपि तारयंति हि भवौषधं नाम
मुद्या तवेज ॥२३
अहं प्रभो कामनिबद्धचित्तो भवंतमार्यं विविधप्रयत्नैः ।
आराधये नाथ भवानभिज्ञः किं ते ह
विज्ञाप्यमिहास्ति लोके ॥२४
वसिष्ठ उवाच—
इत्येवं जामदग्न्यं तु स्तुवंतं प्रणतं पुरः ।
उवाचागाधया वाचा मोहयन्निव मायया ॥२५
कृष्ण उवाच—
हंत राम महाभाग सिद्धं ते कार्यमुत्तमम् ।
कवचस्य स्तवस्यापि प्रभावादवधारय ॥२६
हत्वा तं कार्त्तवीर्यं हि राजानं दृप्तमानसम् ।
साधयित्वा पितुर्वैरं कुरु निःक्षत्रियां महीम् ॥२७
मम चक्रावतारो हि कार्त्तवीर्यो धरातले ।
कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ तं समापय मानद ॥२८
२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जो-जो भी भक्तगण आपके चरणाम्बुजों का इस संसार के बारम्बार जन्म-मरण के घोर श्रम से वैराग्य वाले होकर विधि के साथ स्मरण किया करते हैं—भक्ति की परम पूत भावना से नमन करते हैं और आपके चरणों का भली भाँति अर्चन किया करते हैं तथा परस्पर में एक-दूसरे सभा में इनका वर्णन किया करते हैं ।२२। उस रीति से आपके चरण कमल में एक जन्म में समुत्पन्न पङ्क के भेदन करने में प्रसक्त चित्त वाले भक्तजन स्वयं तर जाते हैं और दूसरों को तार दिया करते हैं । हे ईश ! आपका परम पुनीत नाम निश्चित रूप से इस सांसारिक रोग के दूर करने के लिए अमृत स्वरूप महौषध है ।२३। हे प्रभो ! मैं तो कुछ कामना से निबद्ध चित्त वाला वाला हूँ । मैंने परम श्रेष्ठतम आपकी विधिपूर्वक प्रबल प्रयत्नों के साथ आराधना की थी । हे नाथ ! आप तो स्वयं ही इसके अभिज्ञ हैं अर्थात् आपको सभी कुछ ज्ञात है । आपके लिए इस लोक में क्या बात विज्ञापित करने के योग्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ।२४। वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से स्तवन करते हुए अपने चरणों में आगे प्रणत होने वाले परशुराम से माया से मोहित करते हुए के समान ही अगाध वाणी से प्रभु ने कहा था ।२५। श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान् ने कहा—बड़ी ही प्रसन्नता की बात है हे राम ! आप महान् भाग्य वाले हो । आपका उत्तम कार्य सिद्ध हो गया है । इसकी सिद्धि कवच और स्तव के ही प्रभाव से हुई है—इसको मन में समझ लीजिए ।२६। बहुत ही वर्ष से युक्त मन वाले राजा कार्त्तवीर्य का हनन करके अपने पिता के साथ किये हुए कुत्सित व्यवहार के बैर का बदला लेकर इस भूमि को क्षत्रियों से रहित कर डालिए ।२७। इस धरातल में यह कार्त्तवीर्य मेरे ही चक्र का अवतार है हे मानद द्विजश्रेष्ठ ! उसको समाप्त करके आप सफल हो जाइए ।२८।
अद्य प्रभृति लोकेऽस्मिन्नंशावे शेन मे भवान् । चरिष्यति यथाकालं कर्त्ता हर्त्ता स्वयं प्रभुः ॥२६
चतुर्विंशे युगे वत्स त्रेतायां रघुवंशजः । रामो नाम भविष्यामि चतुर्व्यूहः सनातनः ॥३०
कौसल्यानन्दजनको राज्ञो दशरथादहम् । तदा कौशिकयज्ञं तु साधयित्वा सलक्ष्मणः ॥३१
गमिष्यामि महाभाग जनकस्य पुरं महत् । तत्रेशचाप निर्भज्य परिणीय विदेहजाम् ॥३२
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६५
तदा यास्यन्नयोध्यां ते हरिष्ये तेज उन्मदम् । वसिष्ठ उवाच- कृष्ण एवं समादिश्य जामदग्न्यं तपोनिधिम् । पश्यतोंऽतर्दधे तत्र रामस्य सुमहात्मनः ॥३३
आज से ही आरम्भ करके आप इस लोक में मेरे ही अंश के वेश से चरण करेंगे और यथा समय आप स्वयं ही कर्त्ता और हर्त्ता प्रभु हो जायेंगे ।२६। हे वत्स ! आगे चौबीसवें युग में जब त्रेतायुग होगा तब मैं राजा रघु के वंश में चतुर्व्यूह सनातन राम नाम वाला होऊँगा अर्थात् मेरा रामावतार होगा ।३०। मैं राजा दशरथ के वीर्य से उसकी रानी कौशल्या के गर्भ से जन्म ग्रहण कर उसके आनन्द को उत्पन्न करने वाला आत्मज होऊँगा । उस समय मैं लक्ष्मण के साथ कौशिक विश्वामित्र महर्षि के यज्ञ को पूर्ण कराकर जिसमें दानव बाधा डाल रहे थे मैं फिर हे महाभाग ! राजा जनक के महान् नगर को जाऊँगा । वहाँ पर धनुषशाला में समस्त वीर नृपों के मध्य में शिव के धनुष का भञ्जन करके विदेह की पुत्री जानकी के साथ विवाह करूँगा ।३१-३२। उस समय मैं अपनी राजधानी अयोध्यापुरी के लिये गमन करते हुए आपके उन्मदतेज का हनन कर दूँगा । वसिष्ठ जी ने कहा—इस रीति से भगवान् श्रीकृष्ण ने जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपना आदेश भली-भाँति देकर जो कि राम तप की निधि थे। वहीं पर महात्मा राम के देखते-देखते हुए ही भगवान् कृष्ण अन्तर्हित हो गये थे ।३३।
भार्गव-चरित्र (२)
वसिष्ठ उवाच- अंतर्द्धानं गते कृष्णे रामस्तु सुमहायशाः । समुद्रिक्तमथात्मानं मेने कृष्णानुभावतः ॥१ अकृतव्रणसंयुक्तः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । समायातो भार्गवोऽसौ पुरीं माहिष्मतीं प्रति ॥२ यत्र पापहरा पुण्या नर्मदा सरितां वरा । पुनाति दर्शनादेव प्राणिनः पापिनो ह्यपि ॥३
२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुरा यत्रहरेणापि निविष्टेन महात्मना ।
त्रिपुरस्य विनाशाय कृतो यत्नो महीपते ॥४
तत्र किं वर्ण्यंते पुण्यं नृणां देवस्वरूपिणाम् ।
स दृष्ट्वा नर्मदां भूप भार्गवः कुलनन्दनः ॥५
नमश्चकार सुप्रीतः शत्रुसाधनतत्परः ।
नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं हरदेहसमुद्भवे ॥६
क्षिप्रं नाशय शत्रून्मे वरदा भव शोभने ।
इत्येवं स नमस्कृत्य नर्मदां पापनाशिनीम् ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—भगवान् श्री कृष्ण के अन्तर्धान हो जाने पर सुमहान् यश वाले परशुराम ने इसके उपरान्त अपने आपको श्रीकृष्ण चन्द्र के अनुभाव समुद्रिक्त मान लिया था अर्थात् अपने आपको उच्चस्तरीय व्यक्ति मान लिया था ।१। अकृतव्रण से समन्वित होकर जलती हुई अग्नि के ही समान जलता हुआ यह भार्गव राम माहिष्मती नगरी की ओर आ गया था ।२। यह पुरी वहाँ पर थी जहाँ पर समस्त सरिताओं में परम श्रेष्ठ-पुण्य प्रदा और पापों का हरण करने वाली नर्मदा नाम वाली नदी बहती है । यह नदी बहती है । यह नदी केवल दर्शन मात्र ही से महापापी प्राणियों को पुनीत बना दिया करती है ।३। हे महीपते ! प्राचीन काल में त्रिपुर के हनन करने वाले भगवान् शम्भु ने भी जो कि महान् आत्मा वाले हैं यहीं पर निविष्ट होते हुए त्रिपुरासुर के विनाश के लिये यत्न किया था ।४। वहाँ पर जो भी मनुष्य हैं वे महापुण्य शाली देवों के समान स्वरूप वाले हैं । उनके महान् पुण्य का क्या वर्णन किया जावे अर्थात् उनका पुण्य तो अवर्णनीय है । उस भार्गव परशुराम ने जो अपने कुल को अभिनन्दित करने वाले थे, हे भूप ! उस पुण्यमयी परम पावनी नदी का दर्शन किया था ।५। फिर राम ने जो अपने महाशत्रु कार्त्तवीर्य के साधन करने में परायण थे परम-प्रीतिमान् होकर नर्मदा को प्रणाम किया था और सविनय प्रार्थना की थी कि हे नर्मदे ! आप तो साक्षात् भगवान् शङ्कर के देह से शरीर धारण करने वाली हैं । आपकी सेवा में मेरा प्रणिपात स्वीकार होवे ।६। हे शोभने ! मेरा यही विनम्र निवेदन है कि आप मेरे शत्रुओं का बहुत ही शीघ्र विनाश करने की मेरे ऊपर अनुकम्पा कीजिए और मेरे लिए वर-
भार्गव-चरित्र (२) । [ २६७
दान देने वाली हो जाइए । इस प्रकार से अभ्यर्थना करते हुए उस परशुराम ने पापों के विनाश कर देने वाली नर्मदा के लिए नमस्कार की थी ।७।
दूतं प्रस्थापयामास कार्त्तवीर्यार्जुनं प्रति । दूत राजा त्वया वाच्यो यदहं वच्मि तेऽनघ ॥८ न संदेहस्त्वया कार्यो दूतः क्वापि न वध्यते । यद्बलं तु समाश्रित्य जमदग्निमुनिं नृपः ॥९ तिरस्त्वं कृतवान्मूढ तत्पुत्रो योद्धुमागतः । शीघ्रं निर्गच्छ मंदात्मन्युद्धं रामाय देहि तत् ॥१० भार्गवं त्वं समासाद्य गच्छ लोकांतरं त्वरा । इत्येवमुक्त्वा राजानं श्रुत्वा तस्य वचस्तथा ॥११ शीघ्रमागच्छ भद्रं ते विलम्बो नेह शस्यते । तेनैवमुक्तो दूतस्तु गतो हैहयभूपतिम् ॥१२ रामोदितां तत्सकलं श्रावयामास संसदि । स राजात्रेयभक्तस्तु महाबलपराक्रमः ॥१३ चुक्रोध श्रुत्वा वाच्यं तद्दूतमुत्तरमावहत् । कार्त्तवीर्य उवाच— मया भुजबलेनैव दत्तदत्तेन मेदिनी ॥१४
उसके अनन्तर वहीं से एक दूत को कार्त्तवीर्यार्जुन के राजा के पास भेजा था । उन्होंने उस दूत से कहा था कि हे दूत ! तुमको वहाँ पहुँच कर उस राजा कार्त्तवीर्य से यह कहना चाहिए हे अनघ ! अर्थात् निष्पाप ! जो कुछ भी मैं इस समय में तुमको बोल रहा हूँ ।८। ऐसे कहने में तुमको डरना नहीं चाहिए और अपने लिये पाये जाने वाले किसी तरह के दण्ड का हृदय में कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि राजाओं के यहाँ पर ऐसा नियम है कि जो दूत बनकर आता है वह चाहे कैसी ही सूचना लेकर क्यों न आया हो उसका वध किसी भी दशा में कहीं पर भी नहीं किया जाता है । उस राजा से तुम कह देना कि हे नृप ! जिस बल का समाश्रय लेकर तू ने जमदग्नि महामुनि का महान् तिरस्कार किया था हे मूढ़ ! उसी मुनि का पुत्र तुझसे युद्ध करके बदला लेने के लिए समागत हुआ है । हे मन्द
२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आत्मा वाले ! अब तनिक भी बिलम्ब न करके बहुत ही शीघ्र अपनी नगरी से बाहर निकलकर आ जाओ और राम के साथ युद्ध करो ।९-१०। उस भार्गव राम के समीप में पहुँच कर शीघ्र ही दूसरे लोक को गमन कर अर्थात् मृत्यु के मुख में चला जा । इस तरह से स्पष्टतया उस राजा से कह देना और वह इसका उत्तर क्या देता है उसके वचनों का श्रवण करना ।११। हे दूत ! तुम बहुत ही शीघ्र वापिस आ जाना । तुम्हारा इसमें ही ही कल्याण होगा । इस काय में बिलम्ब बिल्कुल भी न होवे- इसी में तुम्हारी प्रशंसा है । जब इस रीति से उस दूत से कहा गया था तो वह दूत तुरन्त ही हैहय भूपति के समीप में वहाँ से चला गया था ।१२। उस राजा की सभा में उस दूत ने जैसा भी जो कुछ परशुराम के द्वारा गया था वह सब उसी प्रकार से उसने राजा को सुना दिया था । वह राजा कार्त्तवीर्य तो दत्तात्रेय महामुनि का परम भक्त था—इसका भी उसको बड़ा अभिमान था और वह महान् बल-पराक्रम से भी संयुत था ।१३। जब उसने दूत के द्वारा परशुराम का कहा हुआ सन्देश सुना तो उसको बहुत ही अधिक क्रोध आ गया था और उसने उस दूत को इसका उत्तर दिया था। कार्त्तवीर्य राजा ने कहा—मैंने इस सम्पूर्ण मेदिनी को दत्तात्रेय के द्वारा प्रदान किये हुए अपनी भुजाओं के ही बल-पराक्रम से अपने अधिकार में किया है ।१४।
जिता प्रसह्य भूपालाम्बद्ध्वानीय निजां पुरम् ।
तद्बलं मयि वर्त्तत युद्धं दास्ये तवाधुना ॥१५
इत्युक्त्वा विससर्जांशु दूतं हैहयभूपतिः ।
सेनाध्यक्षं समाहूय प्रोवाच वदतांवरः ॥१६
सज्जं कुरु गहाभाग सैन्यं मे वीरसंमतः ।
योत्स्ये रामेण भृगुणा विलंबो मा भवत्विति ॥१७
एवमुक्तो महावीरः सेनाध्यक्षः प्रतापनः ।
सैन्यं सज्जं विधायाशु चतुरंगं न्यवेदयत् ॥१८
सैन्यं सज्जं समाकर्ण्य कार्त्तवीर्यो नृपो मुदा ।
सूतोपनीतं स्वरथमारुरोह विशांपते ॥१९
तस्य राज्ञः समंतात्तु सामंता मंडलेश्वराः ।
अनेकाक्षौहिणीयुक्ताः परिवार्योपतस्थिरे ॥२०
भार्गव-चरित्र (२) ] [ २६६
नागास्तु कोटिशस्तत्र हयस्यंदनपत्तयः । असंख्याता महाराज सैन्ये सागरसन्निभे ॥२१
मैंने इस समस्त भूमि को जीत लिया है और बलात् समस्त भूपालों को बाँधकर अपने पुर में मैं ले आया हूँ । वह सभी बल मुझमें विद्यमान है । एतएव अब मैं तुम्हारे साथ युद्ध अवश्य करूँगा ।१५। इतना कहकर उस हैहय पति ने उस दूत को अपने यहाँ से शीघ्र ही विदाकर दिया था । और फिर बोलने वालों में परम श्रेष्ठ ने अपनी समस्त सेना के अध्यक्ष को बुला कर उसको आदेश दिया था ।१६। हे महाभाग ! आप तो महान् वीरों के द्वारा माने हुए वीर हैं । इसी समय मेरी अपनी सब सेना को सज्जित करिए । मैं अभी भृगु राम के साथ युद्ध करूँगा अतः इस कार्य में विलम्ब न होवे ।१७। जब इस रीति से शीघ्र ही सेना के सुसज्जित करने के लिये सेनाध्यक्ष से कहा गया था तो उस प्रतापन नामक सेनाध्यक्ष ने चतुरङ्गिणी सेना को बहुत ही शीघ्र सज्जित करके राजा से निवेदन कर दिया था कि सब सेना प्रस्तुत है ।१८। हे विशांपते ! जिस समय में कार्त्तवीर्य नृप ने आनन्द से युक्त होते हुए अपनी सेना को पूर्णतया सुसज्जित सुना था तो वे सारथि के द्वारा लाये हुए अपने रथ पर समारूढ़ हो गये थे ।१६। उस राजा कार्त्तवीर्य के चारों ओर अनेक अक्षौहिणीयों से समन्वित होकर बड़े-बड़े सामन्त मंडलेश्वर उस राजा को परिवारित करके स्थित हो गये थे ।२०। हे महाराज ! वहाँ पर सेना में करोड़ों की संख्या में हाथी-अश्व-रथ ओर पैदल सैनिक थे जिनकी कोई भी संख्या नहीं थी और वह सेना एक महान् सागर के ही सदृश थी ।२१।
दृशन्ते तत्र भूपाला नानावंशसमुद्भवाः । महावीरा महाकाया नानायुद्धविशारदाः ॥२२ नानाशास्त्रस्त्रकुशला नानावाहगता नृपाः । नानालंकारसंयुक्ता मत्ता दानविभूषिताः ॥२३ महामात्रकृतोद्देशा भान्ति नागा ह्यनेकंशः । नानाजातिसमुत्पन्ना हयाः पवनरंहसः ॥२४ प्लवंतो भान्ति भूपाल सादिभिः कृतशिक्षणाः । स्यन्दनानि सुदीर्घाणि जवनाश्वयुतानि च ॥२५
३०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चक्रनिर्घोषयुक्तानि प्रावृण्मेघोपमानि च ।
पदातयस्तु राजंते खड्गचर्मधरा नृप ।।२६
अहंपूर्वमहंपूर्वमित्यहंपूर्वकान्विताः ।
यदा प्रचलितं सैन्यं कार्तवीर्यार्जुनस्य वै ।।२७
तदा प्राच्छादितं व्योम रजसा च दिशो दश ।
नानावादित्रनिर्घोषैर्हयानां ह्रेषितैस्तथा ।।२८
वहाँ पर उस सेना में अनेक वंशों में समुत्पन्न हुए भूपाल दिखलाई दे रहे थे जो परम महान् वीर-बड़े विशाल शरीर को धारण करने वाले तथा अनेक प्रकार के युद्ध करने के कौशल में विशारद थे ।२२। वे सब नृप विविध प्रकार के शस्त्रों और अस्त्रों के चलाने में प्रवीण थे और बहुत के वाहनों से युक्त थे । ये सब नृप नाना भाँति के अलङ्कारों से भूषित थे । इस सेना में बड़े मदमत्त हाथी थे जो मद से विभूषित थे ।२३। उस सेना में अनेक प्रकार के नाग शोभा दे रहे थे । जिनका उद्देश बड़े-बड़े कार्य करना ही था । विविध प्रकार की जातियों में समुत्पन्न होने वाले अश्व थे जिनकी गति का वेग वायु के ही सदृश था ।२४। हे भूपाल ! उन अश्वों को उनके साईशों के द्वारा ऐसी शिक्षा दी गयी थी कि वे प्लवन करते हुए शोभा दे रहे थे । उस सेना में बड़े-बड़े सुविशाल और लम्बे-चौड़े रथ में जिनमें ऐसे घोड़े जुड़े हुए थे जो बड़ी ही शीघ्रता से गमन किया करते थे ।२५। रथों के पहियों के चलने के समय में बड़ी जोरदार ध्वनि होती थी जो ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों वर्षा काल के मेघ गर्जते चले जा रहे होवें । हे नृप ! जो पैदल सैनिक थे वे सब ढाल और तलवार धारण करने वाले थे ।२६। वे पैदल सैनिक परस्पर में चलने के लिये—मैं आगे चलूँगा—मैं सबसे पहिले बढूँगा—इस प्रकार से सभी आगे-आगे बढ़कर सेना में युद्ध के लिये वीर भावना से समन्वित थे । इस रीति से जिस समय में राजा कार्तवीर्य की वह सुमहान् विशाल सेना युद्ध के लिए वहाँ से चल दी थी उस समय से सम्पूर्ण दशों दिशाएँ और आकाश सेना के सैनिकों और उनके वाहनों के चलने से उठकर उड़ी हुई धूलि से आच्छादित हो गये थे अर्थात् चारों ओर रज छा गयी थी । सेना के प्रस्थान के समय में अनेक तरह के बाजे बज रहे थे इनके घोष से तथा अश्वों के हिन-हिनाने से आकाश मण्डल व्याप्त हो गया था अर्थात् नभ में गूँज उठ रही थी ।२७-२८।
भार्गव-चरित्र (२) ] [ ३०१
गजानां बृंहितै राजन्व्याप्तं गगनमंडलम् । मार्गे ददर्श राजेंद्रो विपरीतानि भूपते ॥२६ शकुनानि रणे तस्य मृत्युदौत्यकराणि च । मुक्तकेशां छिन्ननासां रुदतीं च दिगंबराम् ॥३० कृष्णवस्त्रपरीधानां वनितां स ददर्श ह । कुचेलं पतितं भग्नं नग्नं काषायवाससम् ॥३१ अंगहीनं ददर्शासौ नरं दुःखितमानसम् । गोधां च शशकं शल्यं रिक्तकुम्भं सरीसृपम् ॥३२ कार्पासं कच्छपं तैलं लवणं चास्थिखंडकम् । स्वदक्षिणे शृगालं च कुर्वतं भैरवं रवम् ॥३३ रोगिणं पुल्कसं चैव वृषं च श्येनभल्लुकौ । दृष्ट्वापि प्रययौ योद्धुं कालपाशावृतो हठात् ॥३४ नर्मदोत्तरतीरस्थो ह्यकृतव्रणसंयुतः । वटच्छायासमासीनो रामोऽपश्यदुपागतम् ॥३५
हे राजन् ! हाथियों की चिघाड़ों से सम्पूर्ण गगन मण्डल भर कर गूँज गया था । हे भूपते ! जिस समय वह राजेन्द्र अपनी महती सेना को लेकर परशुराम से युद्ध करने के लिए गमन कर रहा था उस समय में मार्ग में विपरीत बहुत से शकुन देखे थे जो कि रण स्थल में मृत्यु के होने की सूचना देने वाले दूतों के ही समान थे । यहाँ से आगे उन बुरे असगुनों के विषय में बतलाया जाता है जो-जो उस राजा ने मार्ग में देखे थे-उस राजा ने एक ऐसी नारी को देखा था जो अपने शिर के केशों को खोले हुई थी-वह रुदन कर रही थी और बिल्कुल नग्न थी ।२६-३०। वह काले वर्ण का परिधान की हुई थी । इसका तात्पर्य यह है कि ऐसी स्त्री मार्ग में मिले तो बड़ा ही बुरा सगुन है । ऐसा पुरुष भी यदि मिल जाये तो वह भी बुरा सगुन है जैसा उस कार्त्तवीर्य ने देखा था । उसे एक ऐसा पुरुष दिखाई दिया था जो बहुत ही मैले-कुचैले वस्त्र पहिने हुए था-भूमि पप पड़ा था-उनका शरीर जीर्ण-शीर्ण था और काषाय (गेरुआ) रङ्ग के वस्त्र धारण किये हुए था ।३१। वह पुरुष अङ्गों से हीन था और उनके मन में बड़ा ही
३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अधिक दुःख था। काना-नकटा-लूना-लँगड़ा मनुष्य जो किसी भी अपने अङ्ग से हीन हो वह शुभ कार्य के करने के समय में मार्ग में मिल जावे तो असगुन होता है। मार्ग से तात्पर्य अपने स्थान से निकलते ही मिल जाने से है। उस राजा ने इसके अतिरिक्त अन्य भी बुरे-बुरे असगुन थे। उनके नाम बताये जाते हैं—उसने गोधा (गोह)—शशक (खरगोश)—शल्य जल से रिक्त कलश और सरीसृप को देखा था ।३२। उसने फिर कपास-कच्छ-तेल-लवण-हड्डी का टुकड़ा और अपनी दाहिनी ओर भैरव शब्द करते हुए शृंगाल को देखा था ।३३। इनमें से कोई भी एक यदि मार्ग में गृह से निकलते ही देखने को मिल जाता है तो असगुन होता है जिसमें उस राजा ने इन सभी बुरे सगुनों को देखा था। फिर राजा ने पुल्कस-रोगी मनुष्य-वृष-श्येन और भल्लुक को देखा था। इन सब बुरे-बुरे असुगुनों को बार-बार देखकर भी हठ के वश वह राजा युद्ध करने के लिये चल ही दिया था क्यों-कि वह तो काल के पाश से समावृत था ।३४। राम अकृतव्रण के सहित नर्मदा नदी के उत्तर की ओर तट पर स्थित था और एक वट वृक्ष की छाया का समाश्रय ग्रहण कर रक्खा था। उस परशुराम ने इत राजा कार्त्तवीर्य को सेना सहित आया हुआ देख लिया था ।३५।
कार्त्तवीर्यं नृपवरं शतकोटिनृपान्वितम् । सहस्राक्षौहिणीयुक्तं दृष्ट्वा हृष्टो बभूव ह ॥३६
अद्य मे सिद्धिमायातं कार्यं चिरसमीहितम् । यद्दृष्टिगोचरो जातः कार्त्तवीर्यो नृपाधमः ॥३७
इत्येवमुक्त्वा चोत्थाय धृत्वा परशुमायुधम् । व्यजृम्भतारिनाशाय सिंहः क्रुद्धो यथा तथा ॥३८
दृष्ट्वा समुद्यतं रामं सैनिकानां वधाय च । चकंपिरे भृशं सर्वे मृत्योरिव शरीरिणः ॥३९
स यत्र यत्रानिलरंहसा भृगुश्चिक्षेप रोषेण युतः परश्वधम् । ततस्ततश्छिन्नभुजोरुकंधरा नागा हयाः शूरनरा निपेतुः ॥४०
यथा गजेंद्रो मदयुक्तसमंततो नलं वनं मर्दयति प्रधावन् ।
भार्गव-चरित्र (२) ] [ ३०३
तथैव रामोऽपि मनोऽनिलौजा विमर्द्दयामास नृपस्य सेनाम् ॥४१॥ दृष्ट्वा ममिस्थं प्रचरंतमोजसा रामं रणे शस्त्रभृतां वरिष्ठम् । उद्यम्य चापं महदास्थितो रथं सज्यं च कृत्वा किल मत्स्यराजः ॥४२
परशुराम ने श्रेष्ठ नृप कार्त्तवीर्यार्जुन को देखा था जो सौ करोड़ राजाओं के साथ संयुत था और सहस्र अक्षौहिणी सेनाएँ भी उसके साथ थीं—ऐसे विशाल समुदायों को देखकर परशुराम मन में बहुत ही प्रसन्न हुए थे । हर्षातिरेक का कारण यही था कि जब मेदिनी को क्षत्रियों से हीन ही करना है तो इस समय में एक ही साथ बहुत से क्षत्रिय समागत हो गये हैं ।३६। परशुराम ने अपने मन में विचार किया कि बहुत समय से चाहा हुआ मेरा कार्य आज सिद्धि को प्राप्त हुआ है कि यह महान् अधम नृप कार्त्तवीर्य मेरी दृष्टि के सामने आ गया है ।३७। अपने मन में यह कहकर वह वहाँ से उठकर खड़े हो गये थे और अपने आयुध परशु को धारण कर लिया था । फिर अपने शत्रु के विनाश करने के लिए परशुराम ने गर्जना की थी जिस तरह से क्रुद्ध हुआ सिंह गर्जा करता है ।३८। फिर समस्त है ।३८। फिर समस्त सैनिकों के वध करने के लिए समुद्यत हुए परशुराम को देखकर सभी मृत्यु से शरीर धारियों के हो समान बहुत ही अधिक काँप गये थे ।३६। उन महावीर परशुराम ने रोष से युक्त होकर जहाँ-जहाँ पर अपने परशु को फेंककर प्रहार किया था जो कि वायु के वेग के ही समान किया गया था वहाँ-वहाँ पर ही कटे हुए बाहु-वक्षःस्थल और गरदन वाले करी-अश्व और शूर वीर मनुष्य मरकर भूमि पर गिर गये थे ।४०। जिस तरह से भद्र से युक्त कोई गजेन्द्र दौड़ लगाता हुआ नाल वनका मर्दन कर दिया करता है ठीक उसी भाँति से परशुराम ने भी मन और वायु के सदृश ओज से युक्त होकर उस नृप की सेना का मर्दन कर कर दिया था ।४१। उस रणस्थल में इस रीति से अपने ओज के द्वारा प्रहार करते हुए शस्त्रधारियों में परमश्रेष्ठ परशुराम को देखकर मत्स्यराज नामक राजा ने अपने धनुष को उठाया था तथा फिर वह अपने विशाल रथ पर सजास्थित हो गया था ॥४२॥
३०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आकृष्य बाणाननलोग्रतेजसः समाकिरन्भार्गवमाससाद । दृष्ट्वा तामायांतमथो महात्मा रामो गृहीत्वा धनुषं महोग्रम् ॥४३ वायव्यमस्त्रं विदधे रुषाप्लुतो निवारयन्मंगलबाणवर्षम् । स चापि राजाऽतिबलो मनस्वी ससर्ज रामाय तु पर्वतास्त्रम् ॥४४ तस्तंभ तेनातिबलं तदस्त्रं वायव्यमिष्वस्त्रविधानदक्षः । रामोऽपि तत्रातिबलं विदित्वा तं मत्स्यराजं विविधास्त्रपूगैः ॥४५ किरंतमाजो प्रसभं मुमोच नारायणास्त्रं विधिमन्त्रयुक्तम् । नारायणास्त्रे भृगुणा प्रयुक्ते रामेण राजन्नृपतेर्वधाय ॥४६ दिशस्तु सर्वाः सुभृशं हि तेजसा प्रजज्वलुर्मत्स्यपतिश्चकंपे । रामस्तु तस्याथ विलक्ष्य कम्पं बाणैश्चतुर्भि- र्निजघान वाहान् ॥४७ शरेण चैकेन ध्वजं महात्मा चिच्छेद चापं च शरद्वयेन । बाणेन चैकेन प्रसह्य सारथिं निपात्य भूमौ रथमाईयंस्त्रिभिः ॥४८ त्यक्त्वा रथं भूमिगतं च मंगलं परश्वधेनाशु जघान मूर्द्धनि । स भिन्नशीर्षो रुधिरं वमन्मुहुर्मूर्च्छामवाप्याथ ममार च क्षणात् ॥४९ तत्सैन्यमस्त्रेण च संप्रदग्धं विनाशमायादथ भस्मसात्क्षणात् । तस्मिन्निपतिते राज्ञि चन्द्रवंशसमुद्भवे ॥५० मंगले नृपतिश्रेष्ठे रामो हर्षमुपागतः ॥५१ उस राजा मत्स्यराज ने अपने धनुष की प्रत्यञ्चा को खींचकर उसने अग्नि के समान उग्र तेज वाले बाणों की चारों ओर भली-भाँति वर्षा करते हुए भार्गव के समीप में वह प्राप्त हो गया था। इसके अनन्तर
३. प्रथम खण्ड — परशुरामचरित्र व सगर-आख्यान
भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०५
महात्मा परशुराम ने भी अपने ऊपर आक्रमण करके आये हुए उसको देख कर अपने महान उस धनुष को ग्रहण कर लिया था ।४३। राम ने भी क्रोध से आप्लुत होकर उस मंगल वाणों की वृष्टि का निवारण करते हुए अपने वायव्य कस्त्र का प्रयोग किया था। वह राजा मत्स्यराज भी बहुत अधिक बली था और बड़ा मनस्वी था उसने परशुराम के ऊपर पर्वतास्त्र का प्रयोग किया था अर्थात् राम के ऊपर छोड़ दिया था ।४४। वाणों और अस्त्रों के विधान में परम दक्ष उसने उस राम के अति बलशाली वायव्य अस्त्र को स्तम्भित कर दिया था अर्थात् जहाँ की तहाँ रोककर क्रियाहीन बना दिया था। परशुराम ने भी वहाँ पर उस मत्स्यराज को अत्यधिक बल-विक्रम वाला समझकर विविध भाँति के अस्त्रों के समुदायों की मत्स्यराज पर वर्षा करते हुए फिर रणभूमि में विधि के साथ मन्त्र से युक्त बलपूर्वक नारायणास्त्र को छोड़ दिया था। हे राजन् ! उस राजा के वध के लिए भृगुराम के द्वारा नारायणास्त्र का प्रयोग करने पर सर्वत्र दाह उत्पन्न हो गया था ।४५-४६। उस अस्त्र के तेज से समस्त दिशाएँ बहुत ही अधिक प्रज्वलित हो गयी थीं और वह मत्स्य देश का राजा भी उस भीषण दशा को देखकर कांप गया था। परशुराम ने जब उस राजा के कम्प को देखा तो फिर उसमें चार वाणों से उसके वाहनों का हनन किया था ।४७। उस महात्मा ने एक वाण से उसकी ध्वजा को काट दिया था और दोशरों से धनु का छेदन किया था तथा एक वाण से बल पूर्वक सारथि का निपातन करके तीन वाणों से भूमि पर रथ को चूर्ण कर दिया था ।४८। अपने रथ का त्याग करके भूमि पर स्थित मंगल के मस्तक में शीघ्र ही परशु से प्रहार करके उसका हनन कर दिया था। जब उसका शिर भग्न हो गया था तो वह रुधिर का वमन करता हुआ बार-बार मूर्च्छा प्राप्त करके एक ही क्षण में मृत्यु के मुख में चला गया था ।४९। उसकी समस्त सेना भी अस्त्र से प्रदग्ध हो गयी थी और क्षण भर में ही इसके उपरान्त भस्मसात् होकर विनाश को प्राप्त हो गयी थी। चन्द्रवंश में समुत्पन्न नृपों में श्रेष्ठ उस राजा मङ्गल के निपतित हो जाने पर राम को परम हर्ष प्राप्त हुआ ।५०-५१।
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३०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भार्गव-चरित्र (३)
वसिष्ठ उवाच— मत्स्यराजे निपतिते राजा युद्धविशारदः । राजेन्द्रान्प्रेरयामास कार्त्तवीर्यो महाबलः ॥१ बृहद्वलः सोमदत्तो विदर्भो मिथिलेश्वरः । निषधाधिपतिश्चैव मगधाधिपतिस्तथा ॥२ आययुः समरे योद्धुं भार्गवेन्द्रेण भूपते । वर्षतः शरजालानि नानायुद्धविशारदाः ॥३ वीराभिमानिनः सर्वे हैहयस्याज्ञया तदा । पिनाकहस्तः स भृगुर्ज्वलदग्निशिखोपमः ॥४ चिक्षेप नागपाशं च अभिमंत्र्य शरोत्तमम् । तदस्त्रं भार्गवेन्द्रेण क्षिप्तं संग्राममूर्द्धनि ॥५ चकत्र्त गरुडास्त्रेण सोमदत्तो महाबलः । ततः क्रुद्धो महाभागो रामः शत्रुविदारणः ॥६ रुद्रदत्तेन शस्त्रेण सोमदत्तं जघान ह । बृहद्वलं च गदया विदर्भं मुष्टिना तथा ॥७
वसिष्ठजी ने कहा—मत्स्यराज के मर जाने पर युद्ध करने की कला के महामनीषी—महान बलशाली कार्त्तवीर्य ने फिर वहाँ रणभूमि में अन्य राजेन्द्रों को भेजा था ।१। मिथिला का स्वामी विदर्भ सोमदत्त बहुत अधिक बल वाला था। निषध देश का अधिपति और मगध देश का स्वामी—ये सब हे भूपते ! भार्गवेन्द्र परशुराम के साथ युद्ध करने के लिए समागत हो गये थे । ये सभी अनेक प्रकार के युद्ध करने में परम पण्डित थे और ये वहाँ अपने बाणों के जालों की वर्षा कर रहे थे ।२-३। ये सभी वीरता के अभिमान रखने वाले थे और उस समय में राजा हैहय की आज्ञा पाकर ही युद्ध करने के लिए आये थे । वह भृगु परशुराम अपने हाथ में धनुष ग्रहण किये थे तथा जलती हुई अग्नि के समान परम तेजस्वी थे ।४। भार्गवेन्द्र परशुराम ने नागपाश नामक एक शस्त्र था उसके उत्तम शर को अभिमन्त्रित करके
भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०७
संग्राम में फेंका था ॥५॥ किन्तु भार्गवेन्द्र के द्वारा प्रक्षिप्त किये उस अस्त्र को महा बलवान् सोमदत्त ने काट दिया था और उसको अपने गरुड़ास्त्र से ही खण्डित कर दिया था। इसके अनन्तर महाभाग राम अत्यन्त क्रुद्ध हुए थे जो कि अपने शत्रुओं का विदारण करने वाले थे ॥६॥ इसके पश्चात् परशुराम ने भगवान रुद्र के द्वारा दिये हुए शूल में सोमदत्त का हनन कर दिया था—गदा से वृहदबल का और मुष्टि के प्रहार से विदर्भ का निपातन कर दिया था ।७।
मैथिलं मुद्गरेणैव शक्त्या च निषधाधिपम् ।
मागधं चरणाघातैरस्त्रजालेन सैनिकान् ॥८
निहत्य निखिलां सेनां संहाराग्निसमीरणे ।
दुद्राव कार्त्तवीर्यं च जामदग्न्यो महाबलः ॥६
दृष्ट्वा तं योद्धुमायांतं राजानोऽन्ये महारथाः ।
कार्याकार्यविधानज्ञाः पृष्ठे कृत्वा च हैहयम् ॥१०
रामेण युयुधुश्चैव दर्शयंतश्च सौहृदम् ।
कान्यकुब्जाश्च शतशः सौराष्ट्राऽवंतयस्तथा ॥११
चक्रुश्च शरजालानि रामस्य च समंततः ।
शरजालावृतस्तेषां रामः संग्राममूर्द्धनि ॥१२
न चादृश्यत राजेंद्र तदा स त्वकृतव्रणः ।
सस्मार रामचरितं यदुक्तं हरिणेन वै ॥१३
कुशलं भार्गवेंद्रस्य याचमानो हरिं मुनिः ।
एतस्मिन्नेव काले तु रामः शस्त्रास्त्रकोविदः ॥१४
राम ने मिथिला के नृप का हनन मुद्गर के द्वारा और शक्ति से निषध देश के नृप का वध तथा मगधदेशाधिपति का निपातन चरणों के आघातों से एवं उनके सब सैनिकों का वध अपने अनेक अस्त्रों के प्रहारों से कर दिया ।८। इस रीति से परशुरामजी ने वहाँ पर स्थित सम्पूर्ण सेना को मारकर महान् बलवान् जामदग्नि के पुत्र ने उस संहार की अग्नि के समीरण में राजा कार्त्तवीर्य पर दौड़कर आक्रमण किया था ।६। उस समय में महारथी अन्य राजाओं ने जो कि कार्य और अकार्य के विधान के ज्ञाता थे जब
३०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
यह देखा कि परशुराम कार्तवीर्य से युद्ध करने के लिए आ रहे हैं तो उन सबने उस कार्तवीर्य को अपने पीठ पीछे कर दिया था।१०। और हैहय राजा के प्रति अपना सौहार्द दिखलाते हुए वे सब परशुराम के साथ युद्ध कर रहे थे। इन राजाओं में कान्य कुब्ज-सौराष्ट्र और सैकड़ों ही अवन्ति के नृप थे।११। इन सभी ने परशुराम पर सभी ओर अपने शरों के जालों की ऐसी घोर वर्षा की थी कि उस समय में परशुराम उनके बाणों से उस संग्राम भूमि में चारों ओर से ढक गये थे।१२। हे राजेन्द्र ! इस बाणों की वृष्टि से राम दिखाई नहीं दे रहे थे। तब उस अकृतव्रण ने उस श्रीराम के चरित का स्मरण किया था जो हरिण के द्वारा कहा गया था।१३। उस मुनि ने भगवान् श्रीहरि से भार्गवेन्द्र परशुराम के कुशल रहने की याचना की थी। इतने ही बीच में ऐसा हुआ कि समस्त शस्त्रों और अस्त्रों के महापण्डित परशुराम ने अपने महान् आयुधों का प्रयोग किया था।१४।
विधूय शरजालानि वायव्यास्त्रेण मंत्रवित् ।
उदतिष्ठद्रणाकांक्षी नीहारादिव भास्करः ॥१५॥
त्रिरात्रं समरे रामस्तैः सार्द्धं युयुधे बली ।
द्वादशाक्षौहिणीस्तत्र चिच्छेद लघुविक्रमः ॥१६॥
रम्भास्तम्भवनं यद्वत् परश्वधवरायुधः ।
सर्वांस्तान्नृपवर्गांश्च तदीयाश्च महाचमूः ॥१७॥
दृष्ट्वा विनिहतां तेन रामेण सुमहात्मना ।
आजगाम महावीर्यः सुचन्द्रः सूर्यवंशजः ॥१८॥
लक्षराजन्यसंयुक्तः सप्ताक्षौहिणिसंयुतः ।
तत्रानेकमहावीरा गर्जंतस्तोयदा इव ॥१९॥
कंपयंतो भुवं राजन् युयुधुर्भार्गवेण च ।
तैः प्रयुक्तानि शस्त्राणि महास्त्राणि च भूपते ॥२०॥
क्षणेन नाशयामास भार्गवेन्द्रः प्रतापवान् ।
गृहीत्वा परशुं दिव्यं कालांतकयमोपमम् ॥२१॥
मन्त्रों के परमज्ञाता राम ने अपने अस्त्र के द्वारा समस्त शरों के समुदाय को दूर करके कुहरे से निकले हुए भगवान् सूर्य देवकी भांति वहां