भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६३

आपको मैंने आदर से इस समय साक्षात् प्राप्त कर लिया है। २०। अन्य जन तो नाना भाँति के तपश्चर्या जनित तापों से अपने देह को संतप्त किया करते हैं और विविध यज्ञों के द्वारा आपका यजन किया करते हैं। हे विभो ! इस प्रकार के परम क्लिष्ट विधानों के करते हुए भी वे सब किसी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए निबद्ध वासना वाले आपके इस अलौकिक स्वरूप का दर्शन स्वप्न में भी नेत्रों से नहीं किया करते हैं । २१।

ये वै त्वदीयं चरणं भवश्रमान्निर्विण्णचित्ता
विधिवत्स्मरंति ।
नमन्ति भक्त्याऽथ समर्च्चयन्ति वै परस्परं संसदि
वर्णयंति ॥२२
तेनेकजन्मोद्भवपंकभेदमप्रसक्तचित्ता भवतोंऽघ्रिपद्मे ।
तरंति चान्यानपि तारयंति हि भवौषधं नाम
मुद्या तवेज ॥२३
अहं प्रभो कामनिबद्धचित्तो भवंतमार्यं विविधप्रयत्नैः ।
आराधये नाथ भवानभिज्ञः किं ते ह
विज्ञाप्यमिहास्ति लोके ॥२४

वसिष्ठ उवाच—

इत्येवं जामदग्न्यं तु स्तुवंतं प्रणतं पुरः ।
उवाचागाधया वाचा मोहयन्निव मायया ॥२५

कृष्ण उवाच—

हंत राम महाभाग सिद्धं ते कार्यमुत्तमम् ।
कवचस्य स्तवस्यापि प्रभावादवधारय ॥२६
हत्वा तं कार्त्तवीर्यं हि राजानं दृप्तमानसम् ।
साधयित्वा पितुर्वैरं कुरु निःक्षत्रियां महीम् ॥२७
मम चक्रावतारो हि कार्त्तवीर्यो धरातले ।
कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ तं समापय मानद ॥२८