भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

गताः स्वरूपं निखिलं विहाय ते देहस्त्र्यपत्यार्थम- मत्वमीश्वर ॥१९॥ तं देवदेवं भजतामभीप्सितप्रदं निरीहं गुणवर्जितं च । अचिंत्यमव्यक्तमघौघनाशनं प्राप्तोऽरणं प्रेमनिधानमादरात् ॥२०॥ तर्पंति तापैर्विविधैः स्वदेहमन्ये तु यज्ञैर्विविधैर्यजंति । स्वप्नेऽपि ते रूपमलौकिकं विभो पश्यन्ति नैवार्थनिबद्धवासनाः ॥२१॥

परशुराम ने कहा—भक्तों की सुरक्षा करने के कारणों से शरीर धारण करने वाले—अपनी शरणागति में सम्प्राप्त जनों का प्रतिपालन करने वाले और सुरगणों की पीड़ा का हरण करने वाले आपके लिए मेरा बार-म्बार नमस्कार है । ब्रह्मा-शिव-विष्णु और इन्द्र जिनमें प्रमुख हैं ऐसे समस्त देवगणों के द्वारा जिनका स्तवन किया गया है ऐसे परमेश्वर प्रभु के लिए मैं नित्य ही प्रणाम निवेदन करने वाला हूँ ।१५। शिव आदि प्रमुख देव भी अनेक प्रकार के वेदों के वादों के द्वारा जिनके स्वरूप का निर्णय करने में समर्थ नहीं हुआ करते हैं उन निर्देशन करने के योग्य-अजन्मा-पुराण पुरुष तथा अनन्त प्रभु का मैं स्तवन करता हूँ । आप मेरे ऊपर दया में परायण हो जाइए ।१६। जो एक ही ईश हैं और नित्य ही अपने भक्तों के मनोवाञ्छितों को प्रदान करने वाले हैं वे आप इस भूमि के भार को उतारने के लिए लोकों में विहार और उनकी रक्षा करने के वास्ते अनेक प्रकार के देव-मनुष्य-तिर्यग् तथा जल जीवों में शरीर धारण करके अवतार ग्रहण किया करते हैं ।१७। ऐसे उन प्रभु आपको मैं स्वयं साक्षात् देख रहा हूँ जो अपने ही भक्तों में अनुराग रखने वाले हैं और इन्दिरा आदि में भी अत्यन्त विरक्त रहते हैं तथा व्यभिचार से दुष्ट चित्त वालियों में भी प्रेम से निबद्ध मन वाले हैं ।१८। हे ईश्वर ! जिन आपके स्वरूप की प्राप्ति परम प्रसन्न होते हुए सम्पूर्ण अपने देह-स्त्री-सन्तति और वैभव की ममता का त्यागकर असुर-सुर-नर-किन्नर-और तिर्यग् योनि वाले भी कर चुके हैं ।१९। उन्हीं देवों के भी देव-भजन करने वालों के लिये अभीप्सित प्रदान करने वाले-निरीह गुणों से रहित अर्थात् रजोगुणादि से रहित-न चिन्तन करने के योग्य-अव्यक्त और अघों के समुदायों के विनाश करने वाले-अरण तथा प्रेम के निधान