संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र (१) ] [ २६१
मृत नामक दिव्य स्तव का भली-भांति अभ्यास किया था ।१०। हे भूपते ! ब्रज के स्वामी उन भगवान श्रीकृष्ण उस पर परम प्रसन्न हो गये थे और उन्होंने जमदग्नि के पुत्र के लिए अपना दर्शन दिया था ।११। अब भगवान के स्वरूप का वर्णन किया जाता है जिस रूप से राम को उन्होंने दर्शन दिया था—उनके नेत्र कमलों के समान परम सुन्दर थे—भगवान कृष्ण साक्षात् चतुर्व्यूहों के अधिप थे—सूर्य के वर्ण के सदृश जाज्वल्यमान किरीट और दोनों कानों में कुण्डलों की शोभा से समन्वित थे ।१२। वक्षःस्थल में कौस्तुभ महामणि धारण किये हुए थे जिसकी प्रभा से उनका उरःस्थल समु- द्भासित हो रहा था—पीताम्बर का परिधान करने वाले नील जलद के समान प्रभा वाले थे । उनके करकमलों में वंशी थी जिसका वादन वे कर रहे थे तथा वे साक्षात् मोहन करने वाले स्वरूप को धारण करने वाले थे । ।१३। ऐसे उन भगवान् श्री कृष्ण के दर्शन करके जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने तुरन्त ही अपने आसन से उठकर गात्रोत्थान दिया था और वह बहुत ही हर्ष के समन्वित हो गये थे । उस राम ने उनके सामने चरणों में दण्ड की भांति गिरकर उन विभु को प्रणाम किया था और फिर बहुत ही प्रणत होकर उनकी स्तुति की थी ।१४।
परशुराम उवाच— नमो नमः कारणविग्रहाय प्रपन्नपालाय सुरार्त्तिहारिणे । ब्रह्मेशविष्णुद्रमुखस्तुताय ततोऽस्मि नित्यं परमेश्वराय ॥१५
यं वेदवादैर्विविधप्रकारैर्निर्णोतुमीशानमुखा न शक्नुयुः । तं त्वामनिर्देश्यमजं पुराणमनंतमीडे भव मे दयापरः ॥१६
यस्त्वेक ईशो निजवांछितप्रदो धत्ते तनूर्लोकविहाररक्षणे । नानाविधा देवमनुष्यतिर्यंग्यादःसु भूमेर्भरवारणाय ॥१७
तं त्वामहं भक्तजनानुरक्तं विरक्तमत्यंतमपींदिरादिषु । स्वयं समक्षं व्यभिचारदुष्टचित्तास्वपि प्रेमनिबद्धमानसम् ॥१८
यं वै प्रसन्ना असुराः सुरा नराः सकिन्नरास्तिर्यंग्योतयोऽपि हि ।