संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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का समुद्भव हुआ था ।५। अब आप उसी स्थल में जाकर अनन्य बुद्धि वाले होते हुए एक मास तक इस स्तोत्र का पाठ करो और पूर्ण नियम से ही नियत तथा नियत अशन (भोजन) वाले होकर रहो ।६। आपने सिद्धि की इच्छा रखते हुए जिस कवच का पूर्व में अभ्यास किया था और अपने समस्त शत्रुओं के निग्रह करने की कामना से ही किया था वही अब आपको सिद्धि के देने वाला हो जायगा ।७।
वसिष्ठ उवाच–
एवमुक्तो ह्यगस्त्येन रामः शत्रुनिबर्हणः ।
नमस्कृत्य मुनिं शांतं निर्जगाश्रमाद्बहिः ॥८
पुनस्तेनैव मार्गेण संप्राप्तस्तत्र सत्वरम् ।
यत्रोत्तरात्पदन्यासान्निर्गता स्वर्णदी नृप ॥९
तत्र वासं प्रकल्प्यासावकृतव्रणसंयुतः ।
समभ्यस्यत्स्तवं दिव्यं कृष्णप्रेमामृताभिधम् ॥१०
नित्यं व्रतपतेस्तस्य स्तोत्रं तुष्टोऽभवद्धरिः ।
जगाम दर्शनं तस्य जामदग्न्यस्य भूपते ॥११
चतुर्व्यूहाधिपः साक्षात्कृष्णः कमललोचनः ।
किरीटेनार्कवर्णेन कुंडलाभ्यां च राजितः ॥१२
कौस्तुभोद्भासितोरस्कः पीतवासा घनप्रभः ।
मुरलीवादनपरः साक्षान्मोहनरूपधृक् ॥१३
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय जामदग्न्यो मुदान्वितः ।
प्रणम्य दंडवद्भूमौ तुष्टाव प्रयतो विभुम् ॥१४
वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से शत्रुओं के निवर्हण करने वाले राम से जब अगस्त्य मुनि के द्वारा कहा गया था तो फिर राम ने मुनि को नमस्कार करके जो महा मुनि परम शान्त स्वभाव वाले थे उस आश्रम से राम बाहिर निकलकर चला गया था ।८। हे भूप ! फिर उसी मार्ग से वह बहुत शीघ्र वहाँ पर पहुँच गया था जहाँ पर उत्तर पद के न्यास से स्वर्ग गङ्गा निकली थी ।९। उस स्थल पर उस परशुराम ने अकृतव्रण के साथ ही रहकर निवास करने का अपने मन में संकल्प किया था और श्रीकृष्ण प्रेमा-