भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

जो-जो भी भक्तगण आपके चरणाम्बुजों का इस संसार के बारम्बार जन्म-मरण के घोर श्रम से वैराग्य वाले होकर विधि के साथ स्मरण किया करते हैं—भक्ति की परम पूत भावना से नमन करते हैं और आपके चरणों का भली भाँति अर्चन किया करते हैं तथा परस्पर में एक-दूसरे सभा में इनका वर्णन किया करते हैं ।२२। उस रीति से आपके चरण कमल में एक जन्म में समुत्पन्न पङ्क के भेदन करने में प्रसक्त चित्त वाले भक्तजन स्वयं तर जाते हैं और दूसरों को तार दिया करते हैं । हे ईश ! आपका परम पुनीत नाम निश्चित रूप से इस सांसारिक रोग के दूर करने के लिए अमृत स्वरूप महौषध है ।२३। हे प्रभो ! मैं तो कुछ कामना से निबद्ध चित्त वाला वाला हूँ । मैंने परम श्रेष्ठतम आपकी विधिपूर्वक प्रबल प्रयत्नों के साथ आराधना की थी । हे नाथ ! आप तो स्वयं ही इसके अभिज्ञ हैं अर्थात् आपको सभी कुछ ज्ञात है । आपके लिए इस लोक में क्या बात विज्ञापित करने के योग्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ।२४। वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से स्तवन करते हुए अपने चरणों में आगे प्रणत होने वाले परशुराम से माया से मोहित करते हुए के समान ही अगाध वाणी से प्रभु ने कहा था ।२५। श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान् ने कहा—बड़ी ही प्रसन्नता की बात है हे राम ! आप महान् भाग्य वाले हो । आपका उत्तम कार्य सिद्ध हो गया है । इसकी सिद्धि कवच और स्तव के ही प्रभाव से हुई है—इसको मन में समझ लीजिए ।२६। बहुत ही वर्ष से युक्त मन वाले राजा कार्त्तवीर्य का हनन करके अपने पिता के साथ किये हुए कुत्सित व्यवहार के बैर का बदला लेकर इस भूमि को क्षत्रियों से रहित कर डालिए ।२७। इस धरातल में यह कार्त्तवीर्य मेरे ही चक्र का अवतार है हे मानद द्विजश्रेष्ठ ! उसको समाप्त करके आप सफल हो जाइए ।२८।

अद्य प्रभृति लोकेऽस्मिन्नंशावे शेन मे भवान् । चरिष्यति यथाकालं कर्त्ता हर्त्ता स्वयं प्रभुः ॥२६

चतुर्विंशे युगे वत्स त्रेतायां रघुवंशजः । रामो नाम भविष्यामि चतुर्व्यूहः सनातनः ॥३०

कौसल्यानन्दजनको राज्ञो दशरथादहम् । तदा कौशिकयज्ञं तु साधयित्वा सलक्ष्मणः ॥३१

गमिष्यामि महाभाग जनकस्य पुरं महत् । तत्रेशचाप निर्भज्य परिणीय विदेहजाम् ॥३२