संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र (१) ] [ २६५
तदा यास्यन्नयोध्यां ते हरिष्ये तेज उन्मदम् । वसिष्ठ उवाच- कृष्ण एवं समादिश्य जामदग्न्यं तपोनिधिम् । पश्यतोंऽतर्दधे तत्र रामस्य सुमहात्मनः ॥३३
आज से ही आरम्भ करके आप इस लोक में मेरे ही अंश के वेश से चरण करेंगे और यथा समय आप स्वयं ही कर्त्ता और हर्त्ता प्रभु हो जायेंगे ।२६। हे वत्स ! आगे चौबीसवें युग में जब त्रेतायुग होगा तब मैं राजा रघु के वंश में चतुर्व्यूह सनातन राम नाम वाला होऊँगा अर्थात् मेरा रामावतार होगा ।३०। मैं राजा दशरथ के वीर्य से उसकी रानी कौशल्या के गर्भ से जन्म ग्रहण कर उसके आनन्द को उत्पन्न करने वाला आत्मज होऊँगा । उस समय मैं लक्ष्मण के साथ कौशिक विश्वामित्र महर्षि के यज्ञ को पूर्ण कराकर जिसमें दानव बाधा डाल रहे थे मैं फिर हे महाभाग ! राजा जनक के महान् नगर को जाऊँगा । वहाँ पर धनुषशाला में समस्त वीर नृपों के मध्य में शिव के धनुष का भञ्जन करके विदेह की पुत्री जानकी के साथ विवाह करूँगा ।३१-३२। उस समय मैं अपनी राजधानी अयोध्यापुरी के लिये गमन करते हुए आपके उन्मदतेज का हनन कर दूँगा । वसिष्ठ जी ने कहा—इस रीति से भगवान् श्रीकृष्ण ने जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपना आदेश भली-भाँति देकर जो कि राम तप की निधि थे। वहीं पर महात्मा राम के देखते-देखते हुए ही भगवान् कृष्ण अन्तर्हित हो गये थे ।३३।
भार्गव-चरित्र (२)
वसिष्ठ उवाच- अंतर्द्धानं गते कृष्णे रामस्तु सुमहायशाः । समुद्रिक्तमथात्मानं मेने कृष्णानुभावतः ॥१ अकृतव्रणसंयुक्तः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । समायातो भार्गवोऽसौ पुरीं माहिष्मतीं प्रति ॥२ यत्र पापहरा पुण्या नर्मदा सरितां वरा । पुनाति दर्शनादेव प्राणिनः पापिनो ह्यपि ॥३