संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जो-जो भी भक्तगण आपके चरणाम्बुजों का इस संसार के बारम्बार जन्म-मरण के घोर श्रम से वैराग्य वाले होकर विधि के साथ स्मरण किया करते हैं—भक्ति की परम पूत भावना से नमन करते हैं और आपके चरणों का भली भाँति अर्चन किया करते हैं तथा परस्पर में एक-दूसरे सभा में इनका वर्णन किया करते हैं ।२२। उस रीति से आपके चरण कमल में एक जन्म में समुत्पन्न पङ्क के भेदन करने में प्रसक्त चित्त वाले भक्तजन स्वयं तर जाते हैं और दूसरों को तार दिया करते हैं । हे ईश ! आपका परम पुनीत नाम निश्चित रूप से इस सांसारिक रोग के दूर करने के लिए अमृत स्वरूप महौषध है ।२३। हे प्रभो ! मैं तो कुछ कामना से निबद्ध चित्त वाला वाला हूँ । मैंने परम श्रेष्ठतम आपकी विधिपूर्वक प्रबल प्रयत्नों के साथ आराधना की थी । हे नाथ ! आप तो स्वयं ही इसके अभिज्ञ हैं अर्थात् आपको सभी कुछ ज्ञात है । आपके लिए इस लोक में क्या बात विज्ञापित करने के योग्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ।२४। वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से स्तवन करते हुए अपने चरणों में आगे प्रणत होने वाले परशुराम से माया से मोहित करते हुए के समान ही अगाध वाणी से प्रभु ने कहा था ।२५। श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान् ने कहा—बड़ी ही प्रसन्नता की बात है हे राम ! आप महान् भाग्य वाले हो । आपका उत्तम कार्य सिद्ध हो गया है । इसकी सिद्धि कवच और स्तव के ही प्रभाव से हुई है—इसको मन में समझ लीजिए ।२६। बहुत ही वर्ष से युक्त मन वाले राजा कार्त्तवीर्य का हनन करके अपने पिता के साथ किये हुए कुत्सित व्यवहार के बैर का बदला लेकर इस भूमि को क्षत्रियों से रहित कर डालिए ।२७। इस धरातल में यह कार्त्तवीर्य मेरे ही चक्र का अवतार है हे मानद द्विजश्रेष्ठ ! उसको समाप्त करके आप सफल हो जाइए ।२८।
अद्य प्रभृति लोकेऽस्मिन्नंशावे शेन मे भवान् । चरिष्यति यथाकालं कर्त्ता हर्त्ता स्वयं प्रभुः ॥२६
चतुर्विंशे युगे वत्स त्रेतायां रघुवंशजः । रामो नाम भविष्यामि चतुर्व्यूहः सनातनः ॥३०
कौसल्यानन्दजनको राज्ञो दशरथादहम् । तदा कौशिकयज्ञं तु साधयित्वा सलक्ष्मणः ॥३१
गमिष्यामि महाभाग जनकस्य पुरं महत् । तत्रेशचाप निर्भज्य परिणीय विदेहजाम् ॥३२
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६५
तदा यास्यन्नयोध्यां ते हरिष्ये तेज उन्मदम् । वसिष्ठ उवाच- कृष्ण एवं समादिश्य जामदग्न्यं तपोनिधिम् । पश्यतोंऽतर्दधे तत्र रामस्य सुमहात्मनः ॥३३
आज से ही आरम्भ करके आप इस लोक में मेरे ही अंश के वेश से चरण करेंगे और यथा समय आप स्वयं ही कर्त्ता और हर्त्ता प्रभु हो जायेंगे ।२६। हे वत्स ! आगे चौबीसवें युग में जब त्रेतायुग होगा तब मैं राजा रघु के वंश में चतुर्व्यूह सनातन राम नाम वाला होऊँगा अर्थात् मेरा रामावतार होगा ।३०। मैं राजा दशरथ के वीर्य से उसकी रानी कौशल्या के गर्भ से जन्म ग्रहण कर उसके आनन्द को उत्पन्न करने वाला आत्मज होऊँगा । उस समय मैं लक्ष्मण के साथ कौशिक विश्वामित्र महर्षि के यज्ञ को पूर्ण कराकर जिसमें दानव बाधा डाल रहे थे मैं फिर हे महाभाग ! राजा जनक के महान् नगर को जाऊँगा । वहाँ पर धनुषशाला में समस्त वीर नृपों के मध्य में शिव के धनुष का भञ्जन करके विदेह की पुत्री जानकी के साथ विवाह करूँगा ।३१-३२। उस समय मैं अपनी राजधानी अयोध्यापुरी के लिये गमन करते हुए आपके उन्मदतेज का हनन कर दूँगा । वसिष्ठ जी ने कहा—इस रीति से भगवान् श्रीकृष्ण ने जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपना आदेश भली-भाँति देकर जो कि राम तप की निधि थे। वहीं पर महात्मा राम के देखते-देखते हुए ही भगवान् कृष्ण अन्तर्हित हो गये थे ।३३।
भार्गव-चरित्र (२)
वसिष्ठ उवाच- अंतर्द्धानं गते कृष्णे रामस्तु सुमहायशाः । समुद्रिक्तमथात्मानं मेने कृष्णानुभावतः ॥१ अकृतव्रणसंयुक्तः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । समायातो भार्गवोऽसौ पुरीं माहिष्मतीं प्रति ॥२ यत्र पापहरा पुण्या नर्मदा सरितां वरा । पुनाति दर्शनादेव प्राणिनः पापिनो ह्यपि ॥३
२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुरा यत्रहरेणापि निविष्टेन महात्मना ।
त्रिपुरस्य विनाशाय कृतो यत्नो महीपते ॥४
तत्र किं वर्ण्यंते पुण्यं नृणां देवस्वरूपिणाम् ।
स दृष्ट्वा नर्मदां भूप भार्गवः कुलनन्दनः ॥५
नमश्चकार सुप्रीतः शत्रुसाधनतत्परः ।
नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं हरदेहसमुद्भवे ॥६
क्षिप्रं नाशय शत्रून्मे वरदा भव शोभने ।
इत्येवं स नमस्कृत्य नर्मदां पापनाशिनीम् ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—भगवान् श्री कृष्ण के अन्तर्धान हो जाने पर सुमहान् यश वाले परशुराम ने इसके उपरान्त अपने आपको श्रीकृष्ण चन्द्र के अनुभाव समुद्रिक्त मान लिया था अर्थात् अपने आपको उच्चस्तरीय व्यक्ति मान लिया था ।१। अकृतव्रण से समन्वित होकर जलती हुई अग्नि के ही समान जलता हुआ यह भार्गव राम माहिष्मती नगरी की ओर आ गया था ।२। यह पुरी वहाँ पर थी जहाँ पर समस्त सरिताओं में परम श्रेष्ठ-पुण्य प्रदा और पापों का हरण करने वाली नर्मदा नाम वाली नदी बहती है । यह नदी बहती है । यह नदी केवल दर्शन मात्र ही से महापापी प्राणियों को पुनीत बना दिया करती है ।३। हे महीपते ! प्राचीन काल में त्रिपुर के हनन करने वाले भगवान् शम्भु ने भी जो कि महान् आत्मा वाले हैं यहीं पर निविष्ट होते हुए त्रिपुरासुर के विनाश के लिये यत्न किया था ।४। वहाँ पर जो भी मनुष्य हैं वे महापुण्य शाली देवों के समान स्वरूप वाले हैं । उनके महान् पुण्य का क्या वर्णन किया जावे अर्थात् उनका पुण्य तो अवर्णनीय है । उस भार्गव परशुराम ने जो अपने कुल को अभिनन्दित करने वाले थे, हे भूप ! उस पुण्यमयी परम पावनी नदी का दर्शन किया था ।५। फिर राम ने जो अपने महाशत्रु कार्त्तवीर्य के साधन करने में परायण थे परम-प्रीतिमान् होकर नर्मदा को प्रणाम किया था और सविनय प्रार्थना की थी कि हे नर्मदे ! आप तो साक्षात् भगवान् शङ्कर के देह से शरीर धारण करने वाली हैं । आपकी सेवा में मेरा प्रणिपात स्वीकार होवे ।६। हे शोभने ! मेरा यही विनम्र निवेदन है कि आप मेरे शत्रुओं का बहुत ही शीघ्र विनाश करने की मेरे ऊपर अनुकम्पा कीजिए और मेरे लिए वर-
भार्गव-चरित्र (२) । [ २६७
दान देने वाली हो जाइए । इस प्रकार से अभ्यर्थना करते हुए उस परशुराम ने पापों के विनाश कर देने वाली नर्मदा के लिए नमस्कार की थी ।७।
दूतं प्रस्थापयामास कार्त्तवीर्यार्जुनं प्रति । दूत राजा त्वया वाच्यो यदहं वच्मि तेऽनघ ॥८ न संदेहस्त्वया कार्यो दूतः क्वापि न वध्यते । यद्बलं तु समाश्रित्य जमदग्निमुनिं नृपः ॥९ तिरस्त्वं कृतवान्मूढ तत्पुत्रो योद्धुमागतः । शीघ्रं निर्गच्छ मंदात्मन्युद्धं रामाय देहि तत् ॥१० भार्गवं त्वं समासाद्य गच्छ लोकांतरं त्वरा । इत्येवमुक्त्वा राजानं श्रुत्वा तस्य वचस्तथा ॥११ शीघ्रमागच्छ भद्रं ते विलम्बो नेह शस्यते । तेनैवमुक्तो दूतस्तु गतो हैहयभूपतिम् ॥१२ रामोदितां तत्सकलं श्रावयामास संसदि । स राजात्रेयभक्तस्तु महाबलपराक्रमः ॥१३ चुक्रोध श्रुत्वा वाच्यं तद्दूतमुत्तरमावहत् । कार्त्तवीर्य उवाच— मया भुजबलेनैव दत्तदत्तेन मेदिनी ॥१४
उसके अनन्तर वहीं से एक दूत को कार्त्तवीर्यार्जुन के राजा के पास भेजा था । उन्होंने उस दूत से कहा था कि हे दूत ! तुमको वहाँ पहुँच कर उस राजा कार्त्तवीर्य से यह कहना चाहिए हे अनघ ! अर्थात् निष्पाप ! जो कुछ भी मैं इस समय में तुमको बोल रहा हूँ ।८। ऐसे कहने में तुमको डरना नहीं चाहिए और अपने लिये पाये जाने वाले किसी तरह के दण्ड का हृदय में कुछ भी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि राजाओं के यहाँ पर ऐसा नियम है कि जो दूत बनकर आता है वह चाहे कैसी ही सूचना लेकर क्यों न आया हो उसका वध किसी भी दशा में कहीं पर भी नहीं किया जाता है । उस राजा से तुम कह देना कि हे नृप ! जिस बल का समाश्रय लेकर तू ने जमदग्नि महामुनि का महान् तिरस्कार किया था हे मूढ़ ! उसी मुनि का पुत्र तुझसे युद्ध करके बदला लेने के लिए समागत हुआ है । हे मन्द
२६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आत्मा वाले ! अब तनिक भी बिलम्ब न करके बहुत ही शीघ्र अपनी नगरी से बाहर निकलकर आ जाओ और राम के साथ युद्ध करो ।९-१०। उस भार्गव राम के समीप में पहुँच कर शीघ्र ही दूसरे लोक को गमन कर अर्थात् मृत्यु के मुख में चला जा । इस तरह से स्पष्टतया उस राजा से कह देना और वह इसका उत्तर क्या देता है उसके वचनों का श्रवण करना ।११। हे दूत ! तुम बहुत ही शीघ्र वापिस आ जाना । तुम्हारा इसमें ही ही कल्याण होगा । इस काय में बिलम्ब बिल्कुल भी न होवे- इसी में तुम्हारी प्रशंसा है । जब इस रीति से उस दूत से कहा गया था तो वह दूत तुरन्त ही हैहय भूपति के समीप में वहाँ से चला गया था ।१२। उस राजा की सभा में उस दूत ने जैसा भी जो कुछ परशुराम के द्वारा गया था वह सब उसी प्रकार से उसने राजा को सुना दिया था । वह राजा कार्त्तवीर्य तो दत्तात्रेय महामुनि का परम भक्त था—इसका भी उसको बड़ा अभिमान था और वह महान् बल-पराक्रम से भी संयुत था ।१३। जब उसने दूत के द्वारा परशुराम का कहा हुआ सन्देश सुना तो उसको बहुत ही अधिक क्रोध आ गया था और उसने उस दूत को इसका उत्तर दिया था। कार्त्तवीर्य राजा ने कहा—मैंने इस सम्पूर्ण मेदिनी को दत्तात्रेय के द्वारा प्रदान किये हुए अपनी भुजाओं के ही बल-पराक्रम से अपने अधिकार में किया है ।१४।
जिता प्रसह्य भूपालाम्बद्ध्वानीय निजां पुरम् ।
तद्बलं मयि वर्त्तत युद्धं दास्ये तवाधुना ॥१५
इत्युक्त्वा विससर्जांशु दूतं हैहयभूपतिः ।
सेनाध्यक्षं समाहूय प्रोवाच वदतांवरः ॥१६
सज्जं कुरु गहाभाग सैन्यं मे वीरसंमतः ।
योत्स्ये रामेण भृगुणा विलंबो मा भवत्विति ॥१७
एवमुक्तो महावीरः सेनाध्यक्षः प्रतापनः ।
सैन्यं सज्जं विधायाशु चतुरंगं न्यवेदयत् ॥१८
सैन्यं सज्जं समाकर्ण्य कार्त्तवीर्यो नृपो मुदा ।
सूतोपनीतं स्वरथमारुरोह विशांपते ॥१९
तस्य राज्ञः समंतात्तु सामंता मंडलेश्वराः ।
अनेकाक्षौहिणीयुक्ताः परिवार्योपतस्थिरे ॥२०
भार्गव-चरित्र (२) ] [ २६६
नागास्तु कोटिशस्तत्र हयस्यंदनपत्तयः । असंख्याता महाराज सैन्ये सागरसन्निभे ॥२१
मैंने इस समस्त भूमि को जीत लिया है और बलात् समस्त भूपालों को बाँधकर अपने पुर में मैं ले आया हूँ । वह सभी बल मुझमें विद्यमान है । एतएव अब मैं तुम्हारे साथ युद्ध अवश्य करूँगा ।१५। इतना कहकर उस हैहय पति ने उस दूत को अपने यहाँ से शीघ्र ही विदाकर दिया था । और फिर बोलने वालों में परम श्रेष्ठ ने अपनी समस्त सेना के अध्यक्ष को बुला कर उसको आदेश दिया था ।१६। हे महाभाग ! आप तो महान् वीरों के द्वारा माने हुए वीर हैं । इसी समय मेरी अपनी सब सेना को सज्जित करिए । मैं अभी भृगु राम के साथ युद्ध करूँगा अतः इस कार्य में विलम्ब न होवे ।१७। जब इस रीति से शीघ्र ही सेना के सुसज्जित करने के लिये सेनाध्यक्ष से कहा गया था तो उस प्रतापन नामक सेनाध्यक्ष ने चतुरङ्गिणी सेना को बहुत ही शीघ्र सज्जित करके राजा से निवेदन कर दिया था कि सब सेना प्रस्तुत है ।१८। हे विशांपते ! जिस समय में कार्त्तवीर्य नृप ने आनन्द से युक्त होते हुए अपनी सेना को पूर्णतया सुसज्जित सुना था तो वे सारथि के द्वारा लाये हुए अपने रथ पर समारूढ़ हो गये थे ।१६। उस राजा कार्त्तवीर्य के चारों ओर अनेक अक्षौहिणीयों से समन्वित होकर बड़े-बड़े सामन्त मंडलेश्वर उस राजा को परिवारित करके स्थित हो गये थे ।२०। हे महाराज ! वहाँ पर सेना में करोड़ों की संख्या में हाथी-अश्व-रथ ओर पैदल सैनिक थे जिनकी कोई भी संख्या नहीं थी और वह सेना एक महान् सागर के ही सदृश थी ।२१।
दृशन्ते तत्र भूपाला नानावंशसमुद्भवाः । महावीरा महाकाया नानायुद्धविशारदाः ॥२२ नानाशास्त्रस्त्रकुशला नानावाहगता नृपाः । नानालंकारसंयुक्ता मत्ता दानविभूषिताः ॥२३ महामात्रकृतोद्देशा भान्ति नागा ह्यनेकंशः । नानाजातिसमुत्पन्ना हयाः पवनरंहसः ॥२४ प्लवंतो भान्ति भूपाल सादिभिः कृतशिक्षणाः । स्यन्दनानि सुदीर्घाणि जवनाश्वयुतानि च ॥२५
३०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चक्रनिर्घोषयुक्तानि प्रावृण्मेघोपमानि च ।
पदातयस्तु राजंते खड्गचर्मधरा नृप ।।२६
अहंपूर्वमहंपूर्वमित्यहंपूर्वकान्विताः ।
यदा प्रचलितं सैन्यं कार्तवीर्यार्जुनस्य वै ।।२७
तदा प्राच्छादितं व्योम रजसा च दिशो दश ।
नानावादित्रनिर्घोषैर्हयानां ह्रेषितैस्तथा ।।२८
वहाँ पर उस सेना में अनेक वंशों में समुत्पन्न हुए भूपाल दिखलाई दे रहे थे जो परम महान् वीर-बड़े विशाल शरीर को धारण करने वाले तथा अनेक प्रकार के युद्ध करने के कौशल में विशारद थे ।२२। वे सब नृप विविध प्रकार के शस्त्रों और अस्त्रों के चलाने में प्रवीण थे और बहुत के वाहनों से युक्त थे । ये सब नृप नाना भाँति के अलङ्कारों से भूषित थे । इस सेना में बड़े मदमत्त हाथी थे जो मद से विभूषित थे ।२३। उस सेना में अनेक प्रकार के नाग शोभा दे रहे थे । जिनका उद्देश बड़े-बड़े कार्य करना ही था । विविध प्रकार की जातियों में समुत्पन्न होने वाले अश्व थे जिनकी गति का वेग वायु के ही सदृश था ।२४। हे भूपाल ! उन अश्वों को उनके साईशों के द्वारा ऐसी शिक्षा दी गयी थी कि वे प्लवन करते हुए शोभा दे रहे थे । उस सेना में बड़े-बड़े सुविशाल और लम्बे-चौड़े रथ में जिनमें ऐसे घोड़े जुड़े हुए थे जो बड़ी ही शीघ्रता से गमन किया करते थे ।२५। रथों के पहियों के चलने के समय में बड़ी जोरदार ध्वनि होती थी जो ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों वर्षा काल के मेघ गर्जते चले जा रहे होवें । हे नृप ! जो पैदल सैनिक थे वे सब ढाल और तलवार धारण करने वाले थे ।२६। वे पैदल सैनिक परस्पर में चलने के लिये—मैं आगे चलूँगा—मैं सबसे पहिले बढूँगा—इस प्रकार से सभी आगे-आगे बढ़कर सेना में युद्ध के लिये वीर भावना से समन्वित थे । इस रीति से जिस समय में राजा कार्तवीर्य की वह सुमहान् विशाल सेना युद्ध के लिए वहाँ से चल दी थी उस समय से सम्पूर्ण दशों दिशाएँ और आकाश सेना के सैनिकों और उनके वाहनों के चलने से उठकर उड़ी हुई धूलि से आच्छादित हो गये थे अर्थात् चारों ओर रज छा गयी थी । सेना के प्रस्थान के समय में अनेक तरह के बाजे बज रहे थे इनके घोष से तथा अश्वों के हिन-हिनाने से आकाश मण्डल व्याप्त हो गया था अर्थात् नभ में गूँज उठ रही थी ।२७-२८।
भार्गव-चरित्र (२) ] [ ३०१
गजानां बृंहितै राजन्व्याप्तं गगनमंडलम् । मार्गे ददर्श राजेंद्रो विपरीतानि भूपते ॥२६ शकुनानि रणे तस्य मृत्युदौत्यकराणि च । मुक्तकेशां छिन्ननासां रुदतीं च दिगंबराम् ॥३० कृष्णवस्त्रपरीधानां वनितां स ददर्श ह । कुचेलं पतितं भग्नं नग्नं काषायवाससम् ॥३१ अंगहीनं ददर्शासौ नरं दुःखितमानसम् । गोधां च शशकं शल्यं रिक्तकुम्भं सरीसृपम् ॥३२ कार्पासं कच्छपं तैलं लवणं चास्थिखंडकम् । स्वदक्षिणे शृगालं च कुर्वतं भैरवं रवम् ॥३३ रोगिणं पुल्कसं चैव वृषं च श्येनभल्लुकौ । दृष्ट्वापि प्रययौ योद्धुं कालपाशावृतो हठात् ॥३४ नर्मदोत्तरतीरस्थो ह्यकृतव्रणसंयुतः । वटच्छायासमासीनो रामोऽपश्यदुपागतम् ॥३५
हे राजन् ! हाथियों की चिघाड़ों से सम्पूर्ण गगन मण्डल भर कर गूँज गया था । हे भूपते ! जिस समय वह राजेन्द्र अपनी महती सेना को लेकर परशुराम से युद्ध करने के लिए गमन कर रहा था उस समय में मार्ग में विपरीत बहुत से शकुन देखे थे जो कि रण स्थल में मृत्यु के होने की सूचना देने वाले दूतों के ही समान थे । यहाँ से आगे उन बुरे असगुनों के विषय में बतलाया जाता है जो-जो उस राजा ने मार्ग में देखे थे-उस राजा ने एक ऐसी नारी को देखा था जो अपने शिर के केशों को खोले हुई थी-वह रुदन कर रही थी और बिल्कुल नग्न थी ।२६-३०। वह काले वर्ण का परिधान की हुई थी । इसका तात्पर्य यह है कि ऐसी स्त्री मार्ग में मिले तो बड़ा ही बुरा सगुन है । ऐसा पुरुष भी यदि मिल जाये तो वह भी बुरा सगुन है जैसा उस कार्त्तवीर्य ने देखा था । उसे एक ऐसा पुरुष दिखाई दिया था जो बहुत ही मैले-कुचैले वस्त्र पहिने हुए था-भूमि पप पड़ा था-उनका शरीर जीर्ण-शीर्ण था और काषाय (गेरुआ) रङ्ग के वस्त्र धारण किये हुए था ।३१। वह पुरुष अङ्गों से हीन था और उनके मन में बड़ा ही
३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अधिक दुःख था। काना-नकटा-लूना-लँगड़ा मनुष्य जो किसी भी अपने अङ्ग से हीन हो वह शुभ कार्य के करने के समय में मार्ग में मिल जावे तो असगुन होता है। मार्ग से तात्पर्य अपने स्थान से निकलते ही मिल जाने से है। उस राजा ने इसके अतिरिक्त अन्य भी बुरे-बुरे असगुन थे। उनके नाम बताये जाते हैं—उसने गोधा (गोह)—शशक (खरगोश)—शल्य जल से रिक्त कलश और सरीसृप को देखा था ।३२। उसने फिर कपास-कच्छ-तेल-लवण-हड्डी का टुकड़ा और अपनी दाहिनी ओर भैरव शब्द करते हुए शृंगाल को देखा था ।३३। इनमें से कोई भी एक यदि मार्ग में गृह से निकलते ही देखने को मिल जाता है तो असगुन होता है जिसमें उस राजा ने इन सभी बुरे सगुनों को देखा था। फिर राजा ने पुल्कस-रोगी मनुष्य-वृष-श्येन और भल्लुक को देखा था। इन सब बुरे-बुरे असुगुनों को बार-बार देखकर भी हठ के वश वह राजा युद्ध करने के लिये चल ही दिया था क्यों-कि वह तो काल के पाश से समावृत था ।३४। राम अकृतव्रण के सहित नर्मदा नदी के उत्तर की ओर तट पर स्थित था और एक वट वृक्ष की छाया का समाश्रय ग्रहण कर रक्खा था। उस परशुराम ने इत राजा कार्त्तवीर्य को सेना सहित आया हुआ देख लिया था ।३५।
कार्त्तवीर्यं नृपवरं शतकोटिनृपान्वितम् । सहस्राक्षौहिणीयुक्तं दृष्ट्वा हृष्टो बभूव ह ॥३६
अद्य मे सिद्धिमायातं कार्यं चिरसमीहितम् । यद्दृष्टिगोचरो जातः कार्त्तवीर्यो नृपाधमः ॥३७
इत्येवमुक्त्वा चोत्थाय धृत्वा परशुमायुधम् । व्यजृम्भतारिनाशाय सिंहः क्रुद्धो यथा तथा ॥३८
दृष्ट्वा समुद्यतं रामं सैनिकानां वधाय च । चकंपिरे भृशं सर्वे मृत्योरिव शरीरिणः ॥३९
स यत्र यत्रानिलरंहसा भृगुश्चिक्षेप रोषेण युतः परश्वधम् । ततस्ततश्छिन्नभुजोरुकंधरा नागा हयाः शूरनरा निपेतुः ॥४०
यथा गजेंद्रो मदयुक्तसमंततो नलं वनं मर्दयति प्रधावन् ।
भार्गव-चरित्र (२) ] [ ३०३
तथैव रामोऽपि मनोऽनिलौजा विमर्द्दयामास नृपस्य सेनाम् ॥४१॥ दृष्ट्वा ममिस्थं प्रचरंतमोजसा रामं रणे शस्त्रभृतां वरिष्ठम् । उद्यम्य चापं महदास्थितो रथं सज्यं च कृत्वा किल मत्स्यराजः ॥४२
परशुराम ने श्रेष्ठ नृप कार्त्तवीर्यार्जुन को देखा था जो सौ करोड़ राजाओं के साथ संयुत था और सहस्र अक्षौहिणी सेनाएँ भी उसके साथ थीं—ऐसे विशाल समुदायों को देखकर परशुराम मन में बहुत ही प्रसन्न हुए थे । हर्षातिरेक का कारण यही था कि जब मेदिनी को क्षत्रियों से हीन ही करना है तो इस समय में एक ही साथ बहुत से क्षत्रिय समागत हो गये हैं ।३६। परशुराम ने अपने मन में विचार किया कि बहुत समय से चाहा हुआ मेरा कार्य आज सिद्धि को प्राप्त हुआ है कि यह महान् अधम नृप कार्त्तवीर्य मेरी दृष्टि के सामने आ गया है ।३७। अपने मन में यह कहकर वह वहाँ से उठकर खड़े हो गये थे और अपने आयुध परशु को धारण कर लिया था । फिर अपने शत्रु के विनाश करने के लिए परशुराम ने गर्जना की थी जिस तरह से क्रुद्ध हुआ सिंह गर्जा करता है ।३८। फिर समस्त है ।३८। फिर समस्त सैनिकों के वध करने के लिए समुद्यत हुए परशुराम को देखकर सभी मृत्यु से शरीर धारियों के हो समान बहुत ही अधिक काँप गये थे ।३६। उन महावीर परशुराम ने रोष से युक्त होकर जहाँ-जहाँ पर अपने परशु को फेंककर प्रहार किया था जो कि वायु के वेग के ही समान किया गया था वहाँ-वहाँ पर ही कटे हुए बाहु-वक्षःस्थल और गरदन वाले करी-अश्व और शूर वीर मनुष्य मरकर भूमि पर गिर गये थे ।४०। जिस तरह से भद्र से युक्त कोई गजेन्द्र दौड़ लगाता हुआ नाल वनका मर्दन कर दिया करता है ठीक उसी भाँति से परशुराम ने भी मन और वायु के सदृश ओज से युक्त होकर उस नृप की सेना का मर्दन कर कर दिया था ।४१। उस रणस्थल में इस रीति से अपने ओज के द्वारा प्रहार करते हुए शस्त्रधारियों में परमश्रेष्ठ परशुराम को देखकर मत्स्यराज नामक राजा ने अपने धनुष को उठाया था तथा फिर वह अपने विशाल रथ पर सजास्थित हो गया था ॥४२॥
३०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
आकृष्य बाणाननलोग्रतेजसः समाकिरन्भार्गवमाससाद । दृष्ट्वा तामायांतमथो महात्मा रामो गृहीत्वा धनुषं महोग्रम् ॥४३ वायव्यमस्त्रं विदधे रुषाप्लुतो निवारयन्मंगलबाणवर्षम् । स चापि राजाऽतिबलो मनस्वी ससर्ज रामाय तु पर्वतास्त्रम् ॥४४ तस्तंभ तेनातिबलं तदस्त्रं वायव्यमिष्वस्त्रविधानदक्षः । रामोऽपि तत्रातिबलं विदित्वा तं मत्स्यराजं विविधास्त्रपूगैः ॥४५ किरंतमाजो प्रसभं मुमोच नारायणास्त्रं विधिमन्त्रयुक्तम् । नारायणास्त्रे भृगुणा प्रयुक्ते रामेण राजन्नृपतेर्वधाय ॥४६ दिशस्तु सर्वाः सुभृशं हि तेजसा प्रजज्वलुर्मत्स्यपतिश्चकंपे । रामस्तु तस्याथ विलक्ष्य कम्पं बाणैश्चतुर्भि- र्निजघान वाहान् ॥४७ शरेण चैकेन ध्वजं महात्मा चिच्छेद चापं च शरद्वयेन । बाणेन चैकेन प्रसह्य सारथिं निपात्य भूमौ रथमाईयंस्त्रिभिः ॥४८ त्यक्त्वा रथं भूमिगतं च मंगलं परश्वधेनाशु जघान मूर्द्धनि । स भिन्नशीर्षो रुधिरं वमन्मुहुर्मूर्च्छामवाप्याथ ममार च क्षणात् ॥४९ तत्सैन्यमस्त्रेण च संप्रदग्धं विनाशमायादथ भस्मसात्क्षणात् । तस्मिन्निपतिते राज्ञि चन्द्रवंशसमुद्भवे ॥५० मंगले नृपतिश्रेष्ठे रामो हर्षमुपागतः ॥५१ उस राजा मत्स्यराज ने अपने धनुष की प्रत्यञ्चा को खींचकर उसने अग्नि के समान उग्र तेज वाले बाणों की चारों ओर भली-भाँति वर्षा करते हुए भार्गव के समीप में वह प्राप्त हो गया था। इसके अनन्तर
३. प्रथम खण्ड — परशुरामचरित्र व सगर-आख्यान
भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०५
महात्मा परशुराम ने भी अपने ऊपर आक्रमण करके आये हुए उसको देख कर अपने महान उस धनुष को ग्रहण कर लिया था ।४३। राम ने भी क्रोध से आप्लुत होकर उस मंगल वाणों की वृष्टि का निवारण करते हुए अपने वायव्य कस्त्र का प्रयोग किया था। वह राजा मत्स्यराज भी बहुत अधिक बली था और बड़ा मनस्वी था उसने परशुराम के ऊपर पर्वतास्त्र का प्रयोग किया था अर्थात् राम के ऊपर छोड़ दिया था ।४४। वाणों और अस्त्रों के विधान में परम दक्ष उसने उस राम के अति बलशाली वायव्य अस्त्र को स्तम्भित कर दिया था अर्थात् जहाँ की तहाँ रोककर क्रियाहीन बना दिया था। परशुराम ने भी वहाँ पर उस मत्स्यराज को अत्यधिक बल-विक्रम वाला समझकर विविध भाँति के अस्त्रों के समुदायों की मत्स्यराज पर वर्षा करते हुए फिर रणभूमि में विधि के साथ मन्त्र से युक्त बलपूर्वक नारायणास्त्र को छोड़ दिया था। हे राजन् ! उस राजा के वध के लिए भृगुराम के द्वारा नारायणास्त्र का प्रयोग करने पर सर्वत्र दाह उत्पन्न हो गया था ।४५-४६। उस अस्त्र के तेज से समस्त दिशाएँ बहुत ही अधिक प्रज्वलित हो गयी थीं और वह मत्स्य देश का राजा भी उस भीषण दशा को देखकर कांप गया था। परशुराम ने जब उस राजा के कम्प को देखा तो फिर उसमें चार वाणों से उसके वाहनों का हनन किया था ।४७। उस महात्मा ने एक वाण से उसकी ध्वजा को काट दिया था और दोशरों से धनु का छेदन किया था तथा एक वाण से बल पूर्वक सारथि का निपातन करके तीन वाणों से भूमि पर रथ को चूर्ण कर दिया था ।४८। अपने रथ का त्याग करके भूमि पर स्थित मंगल के मस्तक में शीघ्र ही परशु से प्रहार करके उसका हनन कर दिया था। जब उसका शिर भग्न हो गया था तो वह रुधिर का वमन करता हुआ बार-बार मूर्च्छा प्राप्त करके एक ही क्षण में मृत्यु के मुख में चला गया था ।४९। उसकी समस्त सेना भी अस्त्र से प्रदग्ध हो गयी थी और क्षण भर में ही इसके उपरान्त भस्मसात् होकर विनाश को प्राप्त हो गयी थी। चन्द्रवंश में समुत्पन्न नृपों में श्रेष्ठ उस राजा मङ्गल के निपतित हो जाने पर राम को परम हर्ष प्राप्त हुआ ।५०-५१।
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३०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भार्गव-चरित्र (३)
वसिष्ठ उवाच— मत्स्यराजे निपतिते राजा युद्धविशारदः । राजेन्द्रान्प्रेरयामास कार्त्तवीर्यो महाबलः ॥१ बृहद्वलः सोमदत्तो विदर्भो मिथिलेश्वरः । निषधाधिपतिश्चैव मगधाधिपतिस्तथा ॥२ आययुः समरे योद्धुं भार्गवेन्द्रेण भूपते । वर्षतः शरजालानि नानायुद्धविशारदाः ॥३ वीराभिमानिनः सर्वे हैहयस्याज्ञया तदा । पिनाकहस्तः स भृगुर्ज्वलदग्निशिखोपमः ॥४ चिक्षेप नागपाशं च अभिमंत्र्य शरोत्तमम् । तदस्त्रं भार्गवेन्द्रेण क्षिप्तं संग्राममूर्द्धनि ॥५ चकत्र्त गरुडास्त्रेण सोमदत्तो महाबलः । ततः क्रुद्धो महाभागो रामः शत्रुविदारणः ॥६ रुद्रदत्तेन शस्त्रेण सोमदत्तं जघान ह । बृहद्वलं च गदया विदर्भं मुष्टिना तथा ॥७
वसिष्ठजी ने कहा—मत्स्यराज के मर जाने पर युद्ध करने की कला के महामनीषी—महान बलशाली कार्त्तवीर्य ने फिर वहाँ रणभूमि में अन्य राजेन्द्रों को भेजा था ।१। मिथिला का स्वामी विदर्भ सोमदत्त बहुत अधिक बल वाला था। निषध देश का अधिपति और मगध देश का स्वामी—ये सब हे भूपते ! भार्गवेन्द्र परशुराम के साथ युद्ध करने के लिए समागत हो गये थे । ये सभी अनेक प्रकार के युद्ध करने में परम पण्डित थे और ये वहाँ अपने बाणों के जालों की वर्षा कर रहे थे ।२-३। ये सभी वीरता के अभिमान रखने वाले थे और उस समय में राजा हैहय की आज्ञा पाकर ही युद्ध करने के लिए आये थे । वह भृगु परशुराम अपने हाथ में धनुष ग्रहण किये थे तथा जलती हुई अग्नि के समान परम तेजस्वी थे ।४। भार्गवेन्द्र परशुराम ने नागपाश नामक एक शस्त्र था उसके उत्तम शर को अभिमन्त्रित करके
भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०७
संग्राम में फेंका था ॥५॥ किन्तु भार्गवेन्द्र के द्वारा प्रक्षिप्त किये उस अस्त्र को महा बलवान् सोमदत्त ने काट दिया था और उसको अपने गरुड़ास्त्र से ही खण्डित कर दिया था। इसके अनन्तर महाभाग राम अत्यन्त क्रुद्ध हुए थे जो कि अपने शत्रुओं का विदारण करने वाले थे ॥६॥ इसके पश्चात् परशुराम ने भगवान रुद्र के द्वारा दिये हुए शूल में सोमदत्त का हनन कर दिया था—गदा से वृहदबल का और मुष्टि के प्रहार से विदर्भ का निपातन कर दिया था ।७।
मैथिलं मुद्गरेणैव शक्त्या च निषधाधिपम् ।
मागधं चरणाघातैरस्त्रजालेन सैनिकान् ॥८
निहत्य निखिलां सेनां संहाराग्निसमीरणे ।
दुद्राव कार्त्तवीर्यं च जामदग्न्यो महाबलः ॥६
दृष्ट्वा तं योद्धुमायांतं राजानोऽन्ये महारथाः ।
कार्याकार्यविधानज्ञाः पृष्ठे कृत्वा च हैहयम् ॥१०
रामेण युयुधुश्चैव दर्शयंतश्च सौहृदम् ।
कान्यकुब्जाश्च शतशः सौराष्ट्राऽवंतयस्तथा ॥११
चक्रुश्च शरजालानि रामस्य च समंततः ।
शरजालावृतस्तेषां रामः संग्राममूर्द्धनि ॥१२
न चादृश्यत राजेंद्र तदा स त्वकृतव्रणः ।
सस्मार रामचरितं यदुक्तं हरिणेन वै ॥१३
कुशलं भार्गवेंद्रस्य याचमानो हरिं मुनिः ।
एतस्मिन्नेव काले तु रामः शस्त्रास्त्रकोविदः ॥१४
राम ने मिथिला के नृप का हनन मुद्गर के द्वारा और शक्ति से निषध देश के नृप का वध तथा मगधदेशाधिपति का निपातन चरणों के आघातों से एवं उनके सब सैनिकों का वध अपने अनेक अस्त्रों के प्रहारों से कर दिया ।८। इस रीति से परशुरामजी ने वहाँ पर स्थित सम्पूर्ण सेना को मारकर महान् बलवान् जामदग्नि के पुत्र ने उस संहार की अग्नि के समीरण में राजा कार्त्तवीर्य पर दौड़कर आक्रमण किया था ।६। उस समय में महारथी अन्य राजाओं ने जो कि कार्य और अकार्य के विधान के ज्ञाता थे जब
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यह देखा कि परशुराम कार्तवीर्य से युद्ध करने के लिए आ रहे हैं तो उन सबने उस कार्तवीर्य को अपने पीठ पीछे कर दिया था।१०। और हैहय राजा के प्रति अपना सौहार्द दिखलाते हुए वे सब परशुराम के साथ युद्ध कर रहे थे। इन राजाओं में कान्य कुब्ज-सौराष्ट्र और सैकड़ों ही अवन्ति के नृप थे।११। इन सभी ने परशुराम पर सभी ओर अपने शरों के जालों की ऐसी घोर वर्षा की थी कि उस समय में परशुराम उनके बाणों से उस संग्राम भूमि में चारों ओर से ढक गये थे।१२। हे राजेन्द्र ! इस बाणों की वृष्टि से राम दिखाई नहीं दे रहे थे। तब उस अकृतव्रण ने उस श्रीराम के चरित का स्मरण किया था जो हरिण के द्वारा कहा गया था।१३। उस मुनि ने भगवान् श्रीहरि से भार्गवेन्द्र परशुराम के कुशल रहने की याचना की थी। इतने ही बीच में ऐसा हुआ कि समस्त शस्त्रों और अस्त्रों के महापण्डित परशुराम ने अपने महान् आयुधों का प्रयोग किया था।१४।
विधूय शरजालानि वायव्यास्त्रेण मंत्रवित् ।
उदतिष्ठद्रणाकांक्षी नीहारादिव भास्करः ॥१५॥
त्रिरात्रं समरे रामस्तैः सार्द्धं युयुधे बली ।
द्वादशाक्षौहिणीस्तत्र चिच्छेद लघुविक्रमः ॥१६॥
रम्भास्तम्भवनं यद्वत् परश्वधवरायुधः ।
सर्वांस्तान्नृपवर्गांश्च तदीयाश्च महाचमूः ॥१७॥
दृष्ट्वा विनिहतां तेन रामेण सुमहात्मना ।
आजगाम महावीर्यः सुचन्द्रः सूर्यवंशजः ॥१८॥
लक्षराजन्यसंयुक्तः सप्ताक्षौहिणिसंयुतः ।
तत्रानेकमहावीरा गर्जंतस्तोयदा इव ॥१९॥
कंपयंतो भुवं राजन् युयुधुर्भार्गवेण च ।
तैः प्रयुक्तानि शस्त्राणि महास्त्राणि च भूपते ॥२०॥
क्षणेन नाशयामास भार्गवेन्द्रः प्रतापवान् ।
गृहीत्वा परशुं दिव्यं कालांतकयमोपमम् ॥२१॥
मन्त्रों के परमज्ञाता राम ने अपने अस्त्र के द्वारा समस्त शरों के समुदाय को दूर करके कुहरे से निकले हुए भगवान् सूर्य देवकी भांति वहां
भागंव-चरित्र (३) ] [ ३०९
पर रण करने की इच्छा वाले उठकर खड़े हो गये थे ।१५। महान् बलवान् उन परशुराम ने उन सबके साथ तीन दिन और रात्रि पर्यन्त समराङ्गण में घोर युद्ध किया था। और परम लघु विक्रम वाले परशुराम ने वहाँ पर बारह अक्षौहिणी सेनाओं का छेदन कर दिया था अर्थात् सबको काटकर मार गिराया था ।१६। जिस तरह से केलों के वन को काटकर गिरा दिया जाया करता है उसी भाँति से परम श्रेष्ठ परशुराम ने अपने परशु से उन सब भूपों को और उनकी बड़ी भारी सेनाओं को काटकर मार दिया था। जब सूर्यवंश में समुत्पन्न महान् वीर्य वाले सुचन्द्र नामक नृप ने यह देखा था कि उस महात्मा राम ने सब सेना को मार गिराया है तो वह वहाँ पर युद्ध करने के लिए स्वयं सामने आगया था ।१८-१९। उसके साथ लाखों अन्य राजा थे और सात अक्षौहिणी सेना भी थी। उनमें बहुत से ऐसे महान् वीर थे जो घनघोर मेघों के ही समान गर्जन कर रहे थे ।१६। हे राजन् ! वे अपनी गर्जना-तर्जना से सम्पूर्ण भूमि के प्राणियों को कंपा रहे थे और उन्होंने वहाँ आकर परशुराम के साथ घोर युद्ध किया था। हे भूपते ! उन्होंने अनेक शस्त्रों और अस्त्रों का वहाँ पर प्रयोग किया था ।२०। तब एक ही क्षण में महान् प्रताप वाले परशुराम ने कालान्तक यमराज के सदृश अपने परम दिव्य परशु (फर्शा) का ग्रहण करके उस सबका विनाश कर दिया था ।२१।
कालयन्सकलां सेनां चिच्छेद भृगुनन्दनः ।
कर्षकस्तु यथा क्षेत्रे पक्वं धान्यं तथा तृणम् ॥२२
निःशेषयति दात्रेण तथा रामेण तत्कृतम् ।
लक्षराजन्यसैन्यं तद्दृष्ट्वा रामेण दारितम् ॥२३
सुचन्द्रः पृथिवीपालो युयुधे संगरे नृप ।
तावुभौ तत्र संक्षुब्धौ नानाशस्त्रास्त्रकोविदौ ॥२४
युयुधाते महावीरो मुनीशनृपतीश्वरौ ।
रामोऽस्मै यानि शस्त्राणि चिक्षेपास्त्राणि चापि हि ॥२५
तानि सर्वाणि चिच्छेद सुचंद्रो युद्धपंडितः ।
ततः क्रुद्धो रणे रामः सुचंद्रं पृथिवीश्वरम् ॥२६
३१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
कृतप्रतिकृताभिज्ञं ज्ञात्वोपस्पृश्य वार्यथ । नारायणास्त्रं विशिखे संदधे चानिवारितम् ॥२७ तदस्त्रं शतसूर्याभं क्षिप्तं रामेण धीमता । हृष्टोत्तीर्य रथात्सद्यः सुचंद्रः प्रणाम ह ॥२८
उस सम्पूर्ण सेना को काटते हुए भृगुनन्दन ने छिन्न-भिन्न करके मार गिराया था जिस तरह से कोई खेतिहर किसान अपने खेत में पकी हुई फसल को तथा घास फूँस को काट दिया करता है ।२२। कृषक अपनी दराँत से जैसे काट देता है वैसे ही परशुरामजी ने उस सेना को काट दिया था। जब लाखों राजाओं की सेना को राम के परशु के द्वारा विदीर्ण हुई देखा गया था ।२३। तो हे नृप ! राजा सुचन्द्र ने समर में परशुराम के साथ स्वयं ही समागत होकर युद्ध किया था। वे दोनों ही बहुत अधिक क्षुब्ध हो रहे थे और दोनों अनेक शस्त्रास्त्रों के प्रयोग करने में बहुत ही कुशल पंडित थे ।२४। वे दोनों मुनीन्द्र और राजा महान् वीर थे और और युद्ध कर रहे थे। परशुराम ने जिन-जिन शस्त्रों तथा अस्त्रों का भी उस पर प्रक्षेप किया था ।२५। युद्ध में परम प्रवीण पण्डित उस सुचन्द्र नृपने उन सभी शस्त्रास्त्रों को काट गिया था। इसके अनन्तर परशुराम को उस रण में बहुत अधिक क्रोध आ गया था और परशुराम को ऐसा ज्ञान हुआ था कि यह सुचन्द्र नृप ऐसा कुशल है कि जिसका भी इस पर प्रयोग किया जाता है उसी का प्रतिकार करना यह अच्छी तरह से जानता है तो उस समय में जल का उपस्पर्शन किया था और फिर विशिख नारायण अस्त्र का सन्धान किया था जो कि किसी भी प्रकार से निवारित नहीं हो सकता था ।२६-२७। वह नारायणास्त्र सैकड़ों सूर्यों की आभा वाला था जिसका कि प्रक्षेप बुद्धिमान् परशुराम ने सुचन्द्र पर किया था। उस समय में इस नारायणास्त्र को देख कर सुचन्द्र नृप तुरन्त ही अपने रथ से नीचे उतर गया था और उसने उस अस्त्र को प्रणाम किया था ।२८।
सर्वास्त्रपूज्यं तच्चापि नारायणविनिर्मितम् । तमेवं प्रणतं त्यक्त्वा ययौ नारायणांतिकम् ॥२६ विस्मितोऽभूत्तदा रामः समरे शत्रुसूदनः । दृष्ट्वा व्यर्थं महास्त्रं तद्भूपं स्वस्थं विलोक्य च ॥३०
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रामः शक्तिं च मुसलं तोमरं पट्टिशं तथा ।
गदां च परशुं कोपाच्चिक्षेप नृपमूर्द्ध नि ॥३१
जग्राह तानि सर्वाणि सुचंद्रो लीलयैव हि ।
चिक्षेप शिवशूलं च रामो नृपतये यदा ॥३२
बभूव पुष्पमालां च तच्छूलं नृपतेर्गले ।
ददर्श च पुरस्तस्य भद्रकालीं जगत्प्रसूम् ॥३३
वहंतीं मुंडमालां च विकटास्यां भयंकरीम् ।
सिंहस्थां च त्रिनेत्रां च त्रिशूलवरधारिणीम् ॥३४
दृष्ट्वा विहाय शस्त्रास्त्रं नमस्कृत्य समैडत ।
राम उवाच-
नमोस्तु ते शंकरवल्लभायै जगत्सवित्र्यै समलंकृतायै ॥३५
और वह अस्त्र भी समस्त अस्त्रों में परम पूज्य था क्योंकि साक्षात् भगवान् नारायण ने ही उसका निर्माण किया था । जब उस सुचन्द्र को इस भाँति से प्रणाम करते हुए देखा तो वह अस्त्र उसको छोड़कर भगवान् नारायण के ही समीप में चला गया था ।२६। अपने शत्रुओं के विनाश करने वाले परशुराम को उस समय में समर स्थल में बहुत ही अधिक विस्मय हो गया था जबकि उन्होंने यह देखा था कि उनके द्वारा प्रयोग किया हुआ वह महान् अस्त्र भी व्यर्थ हो गया था और कुछ भी शत्रु का न करके उसी रूप में स्वस्थ वह बना रहा था ।३०। फिर राम ने अनेक शक्ति-मुसल-तोमर-पट्टिश-गदा और परशु आदि का उस सुचन्द्र पर प्रक्षेप बड़े ही क्रोध पूर्वक किया था ।३१। किन्तु इन सबका कुछ भी प्रभाव उस पर नहीं हुआ था और उसने उन सबको यों ही लीला से ही ग्रहण कर लिया था । जिस समय में परशुराम ने उस सुचन्द्र पर शिवशूल का प्रक्षेप दिया था ।३२। तो वह शिव शूल भी आकर उस राजा के गले में पुष्पों की माला होकर गिर गया था । उस समय में परशुराम ने यह देखा था कि उसके आगे समस्त जगत् की जननी भद्रकाली संस्थित हो रही है ।३३। वह भद्रकाली देवी नरमुण्डों की माला कण्ठ में पहिने हुई थीं तथा उसका मुख बहुत ही भीषण था और सबको भय देने वाली थी । वह एक सिंह के ऊपर सवार रही थी—तीन उसके नेत्र थे और हाथों में त्रिशूल धारण कर रही थी
३१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।२४। ऐसी भगवती भद्रकाली का दर्शन करके परशुराम जी ने अपने सभी शस्त्र-अस्त्रों का परित्याग कर दिया था और देवी के चरणों में प्रणाम करके फिर उसकी भली भाँति स्तुति की थी। परशुराम ने कहा—आप तो भगवान् शङ्कर की प्रियवल्लभा हैं और इस सम्पूर्ण जगत् को जन्म देने वाली हैं। आपके लिए मेरा नमस्कार है। ३५।
नानाविभूषाभिरिभारिगायै प्रपन्नरक्षाविहितोद्यमायै । दक्षप्रसूत्यै हिमवद्भव्यायै महेश्वरार्द्धांगसमास्थितायै ।।३६ काल्यै कलानाथकलाधरायै भक्तप्रियायै भुवनाधिपायै । ताराभिधायै शिवतत्परायै गणेश्वरा राधितपादुकायै ।।३७ परात्परायै परमेष्ठिदायै तापत्रयोन्मूलनर्चितनायै । जगद्धितायास्तपुरत्रयायै बालादिकायै त्रिपुराभिधायै ।।३८ समस्तविद्यासुविलासदायै जगज्जनन्यै निहिताहितायै । बकाननायै बहुसौख्यदायै विध्वस्तनानासुरदानवायै ।।३६ वराभयालंकृतदोर्लतायै समस्तगीर्वाणनमस्कृतायै । पीतांबरायै पवनाशुगायै शुभप्रदायै शिवसंस्तुतायै ।।४० नागारिगायै नवखण्डपायै नीलाचलाभांगलसत्प्रभायै । लघुक्रमायै ललिताभिधायै लेखाधिपायै लवणाकरायै ।।४१ लोलेक्षणायै लयवर्जितायै लाक्षारसालंकृतपंकजायै । रमाभिधायै रतिसुप्रियायै रोगापहायै रचिताखिलायै ।।४२
आप विविध प्रकार के आभूषणों से समलंकृता हैं और इभारि के द्वारा गान की गयीं हैं। आपकी शरणागति में प्रपन्न हो जाते हैं उनकी सुरक्षा के लिये आप उद्यम करने वाली हैं। आपने प्रजापति दक्ष के घर में जन्म धारण किया है और हिमवान् के यहाँ भी आप समुत्पन्न हुई हैं। आप साक्षात् महेश्वर की पाणिपरिणीता प्रिय पत्नी बनकर उनके अर्द्धाङ्ग में समास्थित हुई हैं। ३६। आप कला नाथ की कला के धारण करने वाली हैं—अपने भक्तों की प्रिय काली हैं और समस्त भुवनों की स्वामिनी हैं। तारा नाम वाली हैं—भगवान् शिव की सेवा में सर्वदा तत्पर रहा करती हैं
भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३१३
और विश्वेश्वर गणेश आपकी पादुकाओं का समाराधन किया करते हैं ।३७। आप पर से भी परा हैं—परमेष्ठी के पद को प्रदान करने वाली हैं और आध्यात्मिक-आधिदैविक-आधिभौतिक—इन तीनों प्रकार के तापों का उन्मूलन करने वाला आपका चिन्तन हुआ करता है—इस जगत् के हित के लिए ही आपने त्रिपुरासुर को निहत किया था। बाला से आदि लेकर अनेक आपके शुभ नाम हैं तथा आपका परम शुभ त्रिपुरा—यह भी नाम है। ऐसी आपके लिये मेरा प्रणाम है ।३८। आप समस्त विद्याओं के सुविलास के प्रदान करने वाली हैं—इस सम्पूर्ण जगत् के जनन देने वाली जननी हैं—आप अहित करने वाले शत्रुओं को निहत कर देने वाली हैं—आप बकानना हैं अर्थात् बगुलामुखी हैं—आपने अनेक असुरों और दानवों का निहनन किया है और अत्यधिक सौख्य प्रदान किया है ।३९। आपके कर कमलों में वरदान और अभयदान रहते हैं और इनसे आपकी भुजलताएँ भूषित रहा करती हैं—समस्त देवगणों के द्वारा आपके चरण कमल वन्दित हैं—आप पीताम्बरा अर्थात् पीतवर्ण के वस्त्र धारण करने वाली हैं—आप पवन के ही समान अपने भक्तों की पीड़ा दूर करने के लिये शीघ्र गमन करने वाली हैं—आपका संस्तवन भगवान् शङ्कर भी किया करते हैं तथा आप आप सबको शुभ प्रदान करने वाली हैं—ऐसी आपकी चरण सेवा में मेरा अनेक बार प्रणिपात है ।४०। आप नागरि के द्वारा गान की गयी हैं—नव खण्डों वाले विश्व का पालन एवं रक्षण करने वाली हैं तथा नीलाचल की आभा वाले अंगों की प्रभा से शोभित हैं। आप लघुक्रमा-ललिता नाम धारिणी-लेखाधिपा और लवणाकारा हैं—।४१। आपके नेत्र परमाधिक चञ्चल हैं-आप लय से वर्जित हैं और आपके चरणों में लाक्षारस लगा हुआ है जिससे आपके चरण कमल समलंकृत हैं। आपका शुभ नाम रमा है—आप सुरति से प्यार करने वाली हैं—आप सभी रोगों का अपहरण करने वाली हैं और आपने ही सबकी रचना की है—ऐसी आपके लिए मेरा प्रणाम निवेदित है ।४२।
राज्यप्रदायै रमणोत्सुकायै रत्नप्रभायै रुचिरांबरायै। नमो नमस्ते परतः पुरस्तात् पार्श्वाधरोर्ध्वं च नमो नमस्ते ॥४३
सदा च सर्वत्र नमो नमस्ते नमो नमस्तेऽखिलविग्रहायै। प्रसीद देवेशि मम प्रतिज्ञां पुरां कृतां पालय भद्रकालि ॥४४