संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र (३) ] [ ३११
रामः शक्तिं च मुसलं तोमरं पट्टिशं तथा ।
गदां च परशुं कोपाच्चिक्षेप नृपमूर्द्ध नि ॥३१
जग्राह तानि सर्वाणि सुचंद्रो लीलयैव हि ।
चिक्षेप शिवशूलं च रामो नृपतये यदा ॥३२
बभूव पुष्पमालां च तच्छूलं नृपतेर्गले ।
ददर्श च पुरस्तस्य भद्रकालीं जगत्प्रसूम् ॥३३
वहंतीं मुंडमालां च विकटास्यां भयंकरीम् ।
सिंहस्थां च त्रिनेत्रां च त्रिशूलवरधारिणीम् ॥३४
दृष्ट्वा विहाय शस्त्रास्त्रं नमस्कृत्य समैडत ।
राम उवाच-
नमोस्तु ते शंकरवल्लभायै जगत्सवित्र्यै समलंकृतायै ॥३५
और वह अस्त्र भी समस्त अस्त्रों में परम पूज्य था क्योंकि साक्षात् भगवान् नारायण ने ही उसका निर्माण किया था । जब उस सुचन्द्र को इस भाँति से प्रणाम करते हुए देखा तो वह अस्त्र उसको छोड़कर भगवान् नारायण के ही समीप में चला गया था ।२६। अपने शत्रुओं के विनाश करने वाले परशुराम को उस समय में समर स्थल में बहुत ही अधिक विस्मय हो गया था जबकि उन्होंने यह देखा था कि उनके द्वारा प्रयोग किया हुआ वह महान् अस्त्र भी व्यर्थ हो गया था और कुछ भी शत्रु का न करके उसी रूप में स्वस्थ वह बना रहा था ।३०। फिर राम ने अनेक शक्ति-मुसल-तोमर-पट्टिश-गदा और परशु आदि का उस सुचन्द्र पर प्रक्षेप बड़े ही क्रोध पूर्वक किया था ।३१। किन्तु इन सबका कुछ भी प्रभाव उस पर नहीं हुआ था और उसने उन सबको यों ही लीला से ही ग्रहण कर लिया था । जिस समय में परशुराम ने उस सुचन्द्र पर शिवशूल का प्रक्षेप दिया था ।३२। तो वह शिव शूल भी आकर उस राजा के गले में पुष्पों की माला होकर गिर गया था । उस समय में परशुराम ने यह देखा था कि उसके आगे समस्त जगत् की जननी भद्रकाली संस्थित हो रही है ।३३। वह भद्रकाली देवी नरमुण्डों की माला कण्ठ में पहिने हुई थीं तथा उसका मुख बहुत ही भीषण था और सबको भय देने वाली थी । वह एक सिंह के ऊपर सवार रही थी—तीन उसके नेत्र थे और हाथों में त्रिशूल धारण कर रही थी