भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कृतप्रतिकृताभिज्ञं ज्ञात्वोपस्पृश्य वार्यथ । नारायणास्त्रं विशिखे संदधे चानिवारितम् ॥२७ तदस्त्रं शतसूर्याभं क्षिप्तं रामेण धीमता । हृष्टोत्तीर्य रथात्सद्यः सुचंद्रः प्रणाम ह ॥२८

उस सम्पूर्ण सेना को काटते हुए भृगुनन्दन ने छिन्न-भिन्न करके मार गिराया था जिस तरह से कोई खेतिहर किसान अपने खेत में पकी हुई फसल को तथा घास फूँस को काट दिया करता है ।२२। कृषक अपनी दराँत से जैसे काट देता है वैसे ही परशुरामजी ने उस सेना को काट दिया था। जब लाखों राजाओं की सेना को राम के परशु के द्वारा विदीर्ण हुई देखा गया था ।२३। तो हे नृप ! राजा सुचन्द्र ने समर में परशुराम के साथ स्वयं ही समागत होकर युद्ध किया था। वे दोनों ही बहुत अधिक क्षुब्ध हो रहे थे और दोनों अनेक शस्त्रास्त्रों के प्रयोग करने में बहुत ही कुशल पंडित थे ।२४। वे दोनों मुनीन्द्र और राजा महान् वीर थे और और युद्ध कर रहे थे। परशुराम ने जिन-जिन शस्त्रों तथा अस्त्रों का भी उस पर प्रक्षेप किया था ।२५। युद्ध में परम प्रवीण पण्डित उस सुचन्द्र नृपने उन सभी शस्त्रास्त्रों को काट गिया था। इसके अनन्तर परशुराम को उस रण में बहुत अधिक क्रोध आ गया था और परशुराम को ऐसा ज्ञान हुआ था कि यह सुचन्द्र नृप ऐसा कुशल है कि जिसका भी इस पर प्रयोग किया जाता है उसी का प्रतिकार करना यह अच्छी तरह से जानता है तो उस समय में जल का उपस्पर्शन किया था और फिर विशिख नारायण अस्त्र का सन्धान किया था जो कि किसी भी प्रकार से निवारित नहीं हो सकता था ।२६-२७। वह नारायणास्त्र सैकड़ों सूर्यों की आभा वाला था जिसका कि प्रक्षेप बुद्धिमान् परशुराम ने सुचन्द्र पर किया था। उस समय में इस नारायणास्त्र को देख कर सुचन्द्र नृप तुरन्त ही अपने रथ से नीचे उतर गया था और उसने उस अस्त्र को प्रणाम किया था ।२८।

सर्वास्त्रपूज्यं तच्चापि नारायणविनिर्मितम् । तमेवं प्रणतं त्यक्त्वा ययौ नारायणांतिकम् ॥२६ विस्मितोऽभूत्तदा रामः समरे शत्रुसूदनः । दृष्ट्वा व्यर्थं महास्त्रं तद्भूपं स्वस्थं विलोक्य च ॥३०