संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभागंव-चरित्र (३) ] [ ३०९
पर रण करने की इच्छा वाले उठकर खड़े हो गये थे ।१५। महान् बलवान् उन परशुराम ने उन सबके साथ तीन दिन और रात्रि पर्यन्त समराङ्गण में घोर युद्ध किया था। और परम लघु विक्रम वाले परशुराम ने वहाँ पर बारह अक्षौहिणी सेनाओं का छेदन कर दिया था अर्थात् सबको काटकर मार गिराया था ।१६। जिस तरह से केलों के वन को काटकर गिरा दिया जाया करता है उसी भाँति से परम श्रेष्ठ परशुराम ने अपने परशु से उन सब भूपों को और उनकी बड़ी भारी सेनाओं को काटकर मार दिया था। जब सूर्यवंश में समुत्पन्न महान् वीर्य वाले सुचन्द्र नामक नृप ने यह देखा था कि उस महात्मा राम ने सब सेना को मार गिराया है तो वह वहाँ पर युद्ध करने के लिए स्वयं सामने आगया था ।१८-१९। उसके साथ लाखों अन्य राजा थे और सात अक्षौहिणी सेना भी थी। उनमें बहुत से ऐसे महान् वीर थे जो घनघोर मेघों के ही समान गर्जन कर रहे थे ।१६। हे राजन् ! वे अपनी गर्जना-तर्जना से सम्पूर्ण भूमि के प्राणियों को कंपा रहे थे और उन्होंने वहाँ आकर परशुराम के साथ घोर युद्ध किया था। हे भूपते ! उन्होंने अनेक शस्त्रों और अस्त्रों का वहाँ पर प्रयोग किया था ।२०। तब एक ही क्षण में महान् प्रताप वाले परशुराम ने कालान्तक यमराज के सदृश अपने परम दिव्य परशु (फर्शा) का ग्रहण करके उस सबका विनाश कर दिया था ।२१।
कालयन्सकलां सेनां चिच्छेद भृगुनन्दनः ।
कर्षकस्तु यथा क्षेत्रे पक्वं धान्यं तथा तृणम् ॥२२
निःशेषयति दात्रेण तथा रामेण तत्कृतम् ।
लक्षराजन्यसैन्यं तद्दृष्ट्वा रामेण दारितम् ॥२३
सुचन्द्रः पृथिवीपालो युयुधे संगरे नृप ।
तावुभौ तत्र संक्षुब्धौ नानाशस्त्रास्त्रकोविदौ ॥२४
युयुधाते महावीरो मुनीशनृपतीश्वरौ ।
रामोऽस्मै यानि शस्त्राणि चिक्षेपास्त्राणि चापि हि ॥२५
तानि सर्वाणि चिच्छेद सुचंद्रो युद्धपंडितः ।
ततः क्रुद्धो रणे रामः सुचंद्रं पृथिवीश्वरम् ॥२६