संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भार्गव-चरित्र (३)
वसिष्ठ उवाच— मत्स्यराजे निपतिते राजा युद्धविशारदः । राजेन्द्रान्प्रेरयामास कार्त्तवीर्यो महाबलः ॥१ बृहद्वलः सोमदत्तो विदर्भो मिथिलेश्वरः । निषधाधिपतिश्चैव मगधाधिपतिस्तथा ॥२ आययुः समरे योद्धुं भार्गवेन्द्रेण भूपते । वर्षतः शरजालानि नानायुद्धविशारदाः ॥३ वीराभिमानिनः सर्वे हैहयस्याज्ञया तदा । पिनाकहस्तः स भृगुर्ज्वलदग्निशिखोपमः ॥४ चिक्षेप नागपाशं च अभिमंत्र्य शरोत्तमम् । तदस्त्रं भार्गवेन्द्रेण क्षिप्तं संग्राममूर्द्धनि ॥५ चकत्र्त गरुडास्त्रेण सोमदत्तो महाबलः । ततः क्रुद्धो महाभागो रामः शत्रुविदारणः ॥६ रुद्रदत्तेन शस्त्रेण सोमदत्तं जघान ह । बृहद्वलं च गदया विदर्भं मुष्टिना तथा ॥७
वसिष्ठजी ने कहा—मत्स्यराज के मर जाने पर युद्ध करने की कला के महामनीषी—महान बलशाली कार्त्तवीर्य ने फिर वहाँ रणभूमि में अन्य राजेन्द्रों को भेजा था ।१। मिथिला का स्वामी विदर्भ सोमदत्त बहुत अधिक बल वाला था। निषध देश का अधिपति और मगध देश का स्वामी—ये सब हे भूपते ! भार्गवेन्द्र परशुराम के साथ युद्ध करने के लिए समागत हो गये थे । ये सभी अनेक प्रकार के युद्ध करने में परम पण्डित थे और ये वहाँ अपने बाणों के जालों की वर्षा कर रहे थे ।२-३। ये सभी वीरता के अभिमान रखने वाले थे और उस समय में राजा हैहय की आज्ञा पाकर ही युद्ध करने के लिए आये थे । वह भृगु परशुराम अपने हाथ में धनुष ग्रहण किये थे तथा जलती हुई अग्नि के समान परम तेजस्वी थे ।४। भार्गवेन्द्र परशुराम ने नागपाश नामक एक शस्त्र था उसके उत्तम शर को अभिमन्त्रित करके