संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 301, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०५
महात्मा परशुराम ने भी अपने ऊपर आक्रमण करके आये हुए उसको देख कर अपने महान उस धनुष को ग्रहण कर लिया था ।४३। राम ने भी क्रोध से आप्लुत होकर उस मंगल वाणों की वृष्टि का निवारण करते हुए अपने वायव्य कस्त्र का प्रयोग किया था। वह राजा मत्स्यराज भी बहुत अधिक बली था और बड़ा मनस्वी था उसने परशुराम के ऊपर पर्वतास्त्र का प्रयोग किया था अर्थात् राम के ऊपर छोड़ दिया था ।४४। वाणों और अस्त्रों के विधान में परम दक्ष उसने उस राम के अति बलशाली वायव्य अस्त्र को स्तम्भित कर दिया था अर्थात् जहाँ की तहाँ रोककर क्रियाहीन बना दिया था। परशुराम ने भी वहाँ पर उस मत्स्यराज को अत्यधिक बल-विक्रम वाला समझकर विविध भाँति के अस्त्रों के समुदायों की मत्स्यराज पर वर्षा करते हुए फिर रणभूमि में विधि के साथ मन्त्र से युक्त बलपूर्वक नारायणास्त्र को छोड़ दिया था। हे राजन् ! उस राजा के वध के लिए भृगुराम के द्वारा नारायणास्त्र का प्रयोग करने पर सर्वत्र दाह उत्पन्न हो गया था ।४५-४६। उस अस्त्र के तेज से समस्त दिशाएँ बहुत ही अधिक प्रज्वलित हो गयी थीं और वह मत्स्य देश का राजा भी उस भीषण दशा को देखकर कांप गया था। परशुराम ने जब उस राजा के कम्प को देखा तो फिर उसमें चार वाणों से उसके वाहनों का हनन किया था ।४७। उस महात्मा ने एक वाण से उसकी ध्वजा को काट दिया था और दोशरों से धनु का छेदन किया था तथा एक वाण से बल पूर्वक सारथि का निपातन करके तीन वाणों से भूमि पर रथ को चूर्ण कर दिया था ।४८। अपने रथ का त्याग करके भूमि पर स्थित मंगल के मस्तक में शीघ्र ही परशु से प्रहार करके उसका हनन कर दिया था। जब उसका शिर भग्न हो गया था तो वह रुधिर का वमन करता हुआ बार-बार मूर्च्छा प्राप्त करके एक ही क्षण में मृत्यु के मुख में चला गया था ।४९। उसकी समस्त सेना भी अस्त्र से प्रदग्ध हो गयी थी और क्षण भर में ही इसके उपरान्त भस्मसात् होकर विनाश को प्राप्त हो गयी थी। चन्द्रवंश में समुत्पन्न नृपों में श्रेष्ठ उस राजा मङ्गल के निपतित हो जाने पर राम को परम हर्ष प्राप्त हुआ ।५०-५१।
—X—