संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चक्रनिर्घोषयुक्तानि प्रावृण्मेघोपमानि च ।
पदातयस्तु राजंते खड्गचर्मधरा नृप ।।२६
अहंपूर्वमहंपूर्वमित्यहंपूर्वकान्विताः ।
यदा प्रचलितं सैन्यं कार्तवीर्यार्जुनस्य वै ।।२७
तदा प्राच्छादितं व्योम रजसा च दिशो दश ।
नानावादित्रनिर्घोषैर्हयानां ह्रेषितैस्तथा ।।२८
वहाँ पर उस सेना में अनेक वंशों में समुत्पन्न हुए भूपाल दिखलाई दे रहे थे जो परम महान् वीर-बड़े विशाल शरीर को धारण करने वाले तथा अनेक प्रकार के युद्ध करने के कौशल में विशारद थे ।२२। वे सब नृप विविध प्रकार के शस्त्रों और अस्त्रों के चलाने में प्रवीण थे और बहुत के वाहनों से युक्त थे । ये सब नृप नाना भाँति के अलङ्कारों से भूषित थे । इस सेना में बड़े मदमत्त हाथी थे जो मद से विभूषित थे ।२३। उस सेना में अनेक प्रकार के नाग शोभा दे रहे थे । जिनका उद्देश बड़े-बड़े कार्य करना ही था । विविध प्रकार की जातियों में समुत्पन्न होने वाले अश्व थे जिनकी गति का वेग वायु के ही सदृश था ।२४। हे भूपाल ! उन अश्वों को उनके साईशों के द्वारा ऐसी शिक्षा दी गयी थी कि वे प्लवन करते हुए शोभा दे रहे थे । उस सेना में बड़े-बड़े सुविशाल और लम्बे-चौड़े रथ में जिनमें ऐसे घोड़े जुड़े हुए थे जो बड़ी ही शीघ्रता से गमन किया करते थे ।२५। रथों के पहियों के चलने के समय में बड़ी जोरदार ध्वनि होती थी जो ऐसे ही प्रतीत हो रहे थे मानों वर्षा काल के मेघ गर्जते चले जा रहे होवें । हे नृप ! जो पैदल सैनिक थे वे सब ढाल और तलवार धारण करने वाले थे ।२६। वे पैदल सैनिक परस्पर में चलने के लिये—मैं आगे चलूँगा—मैं सबसे पहिले बढूँगा—इस प्रकार से सभी आगे-आगे बढ़कर सेना में युद्ध के लिये वीर भावना से समन्वित थे । इस रीति से जिस समय में राजा कार्तवीर्य की वह सुमहान् विशाल सेना युद्ध के लिए वहाँ से चल दी थी उस समय से सम्पूर्ण दशों दिशाएँ और आकाश सेना के सैनिकों और उनके वाहनों के चलने से उठकर उड़ी हुई धूलि से आच्छादित हो गये थे अर्थात् चारों ओर रज छा गयी थी । सेना के प्रस्थान के समय में अनेक तरह के बाजे बज रहे थे इनके घोष से तथा अश्वों के हिन-हिनाने से आकाश मण्डल व्याप्त हो गया था अर्थात् नभ में गूँज उठ रही थी ।२७-२८।