भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अधिक दुःख था। काना-नकटा-लूना-लँगड़ा मनुष्य जो किसी भी अपने अङ्ग से हीन हो वह शुभ कार्य के करने के समय में मार्ग में मिल जावे तो असगुन होता है। मार्ग से तात्पर्य अपने स्थान से निकलते ही मिल जाने से है। उस राजा ने इसके अतिरिक्त अन्य भी बुरे-बुरे असगुन थे। उनके नाम बताये जाते हैं—उसने गोधा (गोह)—शशक (खरगोश)—शल्य जल से रिक्त कलश और सरीसृप को देखा था ।३२। उसने फिर कपास-कच्छ-तेल-लवण-हड्डी का टुकड़ा और अपनी दाहिनी ओर भैरव शब्द करते हुए शृंगाल को देखा था ।३३। इनमें से कोई भी एक यदि मार्ग में गृह से निकलते ही देखने को मिल जाता है तो असगुन होता है जिसमें उस राजा ने इन सभी बुरे सगुनों को देखा था। फिर राजा ने पुल्कस-रोगी मनुष्य-वृष-श्येन और भल्लुक को देखा था। इन सब बुरे-बुरे असुगुनों को बार-बार देखकर भी हठ के वश वह राजा युद्ध करने के लिये चल ही दिया था क्यों-कि वह तो काल के पाश से समावृत था ।३४। राम अकृतव्रण के सहित नर्मदा नदी के उत्तर की ओर तट पर स्थित था और एक वट वृक्ष की छाया का समाश्रय ग्रहण कर रक्खा था। उस परशुराम ने इत राजा कार्त्तवीर्य को सेना सहित आया हुआ देख लिया था ।३५।

कार्त्तवीर्यं नृपवरं शतकोटिनृपान्वितम् । सहस्राक्षौहिणीयुक्तं दृष्ट्वा हृष्टो बभूव ह ॥३६

अद्य मे सिद्धिमायातं कार्यं चिरसमीहितम् । यद्दृष्टिगोचरो जातः कार्त्तवीर्यो नृपाधमः ॥३७

इत्येवमुक्त्वा चोत्थाय धृत्वा परशुमायुधम् । व्यजृम्भतारिनाशाय सिंहः क्रुद्धो यथा तथा ॥३८

दृष्ट्वा समुद्यतं रामं सैनिकानां वधाय च । चकंपिरे भृशं सर्वे मृत्योरिव शरीरिणः ॥३९

स यत्र यत्रानिलरंहसा भृगुश्चिक्षेप रोषेण युतः परश्वधम् । ततस्ततश्छिन्नभुजोरुकंधरा नागा हयाः शूरनरा निपेतुः ॥४०

यथा गजेंद्रो मदयुक्तसमंततो नलं वनं मर्दयति प्रधावन् ।