भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अधिक दुःख था। काना-नकटा-लूना-लँगड़ा मनुष्य जो किसी भी अपने अङ्ग से हीन हो वह शुभ कार्य के करने के समय में मार्ग में मिल जावे तो असगुन होता है। मार्ग से तात्पर्य अपने स्थान से निकलते ही मिल जाने से है। उस राजा ने इसके अतिरिक्त अन्य भी बुरे-बुरे असगुन थे। उनके नाम बताये जाते हैं—उसने गोधा (गोह)—शशक (खरगोश)—शल्य जल से रिक्त कलश और सरीसृप को देखा था ।३२। उसने फिर कपास-कच्छ-तेल-लवण-हड्डी का टुकड़ा और अपनी दाहिनी ओर भैरव शब्द करते हुए शृंगाल को देखा था ।३३। इनमें से कोई भी एक यदि मार्ग में गृह से निकलते ही देखने को मिल जाता है तो असगुन होता है जिसमें उस राजा ने इन सभी बुरे सगुनों को देखा था। फिर राजा ने पुल्कस-रोगी मनुष्य-वृष-श्येन और भल्लुक को देखा था। इन सब बुरे-बुरे असुगुनों को बार-बार देखकर भी हठ के वश वह राजा युद्ध करने के लिये चल ही दिया था क्यों-कि वह तो काल के पाश से समावृत था ।३४। राम अकृतव्रण के सहित नर्मदा नदी के उत्तर की ओर तट पर स्थित था और एक वट वृक्ष की छाया का समाश्रय ग्रहण कर रक्खा था। उस परशुराम ने इत राजा कार्त्तवीर्य को सेना सहित आया हुआ देख लिया था ।३५।

कार्त्तवीर्यं नृपवरं शतकोटिनृपान्वितम् । सहस्राक्षौहिणीयुक्तं दृष्ट्वा हृष्टो बभूव ह ॥३६

अद्य मे सिद्धिमायातं कार्यं चिरसमीहितम् । यद्दृष्टिगोचरो जातः कार्त्तवीर्यो नृपाधमः ॥३७

इत्येवमुक्त्वा चोत्थाय धृत्वा परशुमायुधम् । व्यजृम्भतारिनाशाय सिंहः क्रुद्धो यथा तथा ॥३८

दृष्ट्वा समुद्यतं रामं सैनिकानां वधाय च । चकंपिरे भृशं सर्वे मृत्योरिव शरीरिणः ॥३९

स यत्र यत्रानिलरंहसा भृगुश्चिक्षेप रोषेण युतः परश्वधम् । ततस्ततश्छिन्नभुजोरुकंधरा नागा हयाः शूरनरा निपेतुः ॥४०

यथा गजेंद्रो मदयुक्तसमंततो नलं वनं मर्दयति प्रधावन् ।

भार्गव-चरित्र (२) ] [ ३०३

तथैव रामोऽपि मनोऽनिलौजा विमर्द्दयामास नृपस्य सेनाम् ॥४१॥ दृष्ट्वा ममिस्थं प्रचरंतमोजसा रामं रणे शस्त्रभृतां वरिष्ठम् । उद्यम्य चापं महदास्थितो रथं सज्यं च कृत्वा किल मत्स्यराजः ॥४२

परशुराम ने श्रेष्ठ नृप कार्त्तवीर्यार्जुन को देखा था जो सौ करोड़ राजाओं के साथ संयुत था और सहस्र अक्षौहिणी सेनाएँ भी उसके साथ थीं—ऐसे विशाल समुदायों को देखकर परशुराम मन में बहुत ही प्रसन्न हुए थे । हर्षातिरेक का कारण यही था कि जब मेदिनी को क्षत्रियों से हीन ही करना है तो इस समय में एक ही साथ बहुत से क्षत्रिय समागत हो गये हैं ।३६। परशुराम ने अपने मन में विचार किया कि बहुत समय से चाहा हुआ मेरा कार्य आज सिद्धि को प्राप्त हुआ है कि यह महान् अधम नृप कार्त्तवीर्य मेरी दृष्टि के सामने आ गया है ।३७। अपने मन में यह कहकर वह वहाँ से उठकर खड़े हो गये थे और अपने आयुध परशु को धारण कर लिया था । फिर अपने शत्रु के विनाश करने के लिए परशुराम ने गर्जना की थी जिस तरह से क्रुद्ध हुआ सिंह गर्जा करता है ।३८। फिर समस्त है ।३८। फिर समस्त सैनिकों के वध करने के लिए समुद्यत हुए परशुराम को देखकर सभी मृत्यु से शरीर धारियों के हो समान बहुत ही अधिक काँप गये थे ।३६। उन महावीर परशुराम ने रोष से युक्त होकर जहाँ-जहाँ पर अपने परशु को फेंककर प्रहार किया था जो कि वायु के वेग के ही समान किया गया था वहाँ-वहाँ पर ही कटे हुए बाहु-वक्षःस्थल और गरदन वाले करी-अश्व और शूर वीर मनुष्य मरकर भूमि पर गिर गये थे ।४०। जिस तरह से भद्र से युक्त कोई गजेन्द्र दौड़ लगाता हुआ नाल वनका मर्दन कर दिया करता है ठीक उसी भाँति से परशुराम ने भी मन और वायु के सदृश ओज से युक्त होकर उस नृप की सेना का मर्दन कर कर दिया था ।४१। उस रणस्थल में इस रीति से अपने ओज के द्वारा प्रहार करते हुए शस्त्रधारियों में परमश्रेष्ठ परशुराम को देखकर मत्स्यराज नामक राजा ने अपने धनुष को उठाया था तथा फिर वह अपने विशाल रथ पर सजास्थित हो गया था ॥४२॥

३०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आकृष्य बाणाननलोग्रतेजसः समाकिरन्भार्गवमाससाद । दृष्ट्वा तामायांतमथो महात्मा रामो गृहीत्वा धनुषं महोग्रम् ॥४३ वायव्यमस्त्रं विदधे रुषाप्लुतो निवारयन्मंगलबाणवर्षम् । स चापि राजाऽतिबलो मनस्वी ससर्ज रामाय तु पर्वतास्त्रम् ॥४४ तस्तंभ तेनातिबलं तदस्त्रं वायव्यमिष्वस्त्रविधानदक्षः । रामोऽपि तत्रातिबलं विदित्वा तं मत्स्यराजं विविधास्त्रपूगैः ॥४५ किरंतमाजो प्रसभं मुमोच नारायणास्त्रं विधिमन्त्रयुक्तम् । नारायणास्त्रे भृगुणा प्रयुक्ते रामेण राजन्नृपतेर्वधाय ॥४६ दिशस्तु सर्वाः सुभृशं हि तेजसा प्रजज्वलुर्मत्स्यपतिश्चकंपे । रामस्तु तस्याथ विलक्ष्य कम्पं बाणैश्चतुर्भि- र्निजघान वाहान् ॥४७ शरेण चैकेन ध्वजं महात्मा चिच्छेद चापं च शरद्वयेन । बाणेन चैकेन प्रसह्य सारथिं निपात्य भूमौ रथमाईयंस्त्रिभिः ॥४८ त्यक्त्वा रथं भूमिगतं च मंगलं परश्वधेनाशु जघान मूर्द्धनि । स भिन्नशीर्षो रुधिरं वमन्मुहुर्मूर्च्छामवाप्याथ ममार च क्षणात् ॥४९ तत्सैन्यमस्त्रेण च संप्रदग्धं विनाशमायादथ भस्मसात्क्षणात् । तस्मिन्निपतिते राज्ञि चन्द्रवंशसमुद्भवे ॥५० मंगले नृपतिश्रेष्ठे रामो हर्षमुपागतः ॥५१ उस राजा मत्स्यराज ने अपने धनुष की प्रत्यञ्चा को खींचकर उसने अग्नि के समान उग्र तेज वाले बाणों की चारों ओर भली-भाँति वर्षा करते हुए भार्गव के समीप में वह प्राप्त हो गया था। इसके अनन्तर

३. प्रथम खण्ड — परशुरामचरित्र व सगर-आख्यान

भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०५

महात्मा परशुराम ने भी अपने ऊपर आक्रमण करके आये हुए उसको देख कर अपने महान उस धनुष को ग्रहण कर लिया था ।४३। राम ने भी क्रोध से आप्लुत होकर उस मंगल वाणों की वृष्टि का निवारण करते हुए अपने वायव्य कस्त्र का प्रयोग किया था। वह राजा मत्स्यराज भी बहुत अधिक बली था और बड़ा मनस्वी था उसने परशुराम के ऊपर पर्वतास्त्र का प्रयोग किया था अर्थात् राम के ऊपर छोड़ दिया था ।४४। वाणों और अस्त्रों के विधान में परम दक्ष उसने उस राम के अति बलशाली वायव्य अस्त्र को स्तम्भित कर दिया था अर्थात् जहाँ की तहाँ रोककर क्रियाहीन बना दिया था। परशुराम ने भी वहाँ पर उस मत्स्यराज को अत्यधिक बल-विक्रम वाला समझकर विविध भाँति के अस्त्रों के समुदायों की मत्स्यराज पर वर्षा करते हुए फिर रणभूमि में विधि के साथ मन्त्र से युक्त बलपूर्वक नारायणास्त्र को छोड़ दिया था। हे राजन् ! उस राजा के वध के लिए भृगुराम के द्वारा नारायणास्त्र का प्रयोग करने पर सर्वत्र दाह उत्पन्न हो गया था ।४५-४६। उस अस्त्र के तेज से समस्त दिशाएँ बहुत ही अधिक प्रज्वलित हो गयी थीं और वह मत्स्य देश का राजा भी उस भीषण दशा को देखकर कांप गया था। परशुराम ने जब उस राजा के कम्प को देखा तो फिर उसमें चार वाणों से उसके वाहनों का हनन किया था ।४७। उस महात्मा ने एक वाण से उसकी ध्वजा को काट दिया था और दोशरों से धनु का छेदन किया था तथा एक वाण से बल पूर्वक सारथि का निपातन करके तीन वाणों से भूमि पर रथ को चूर्ण कर दिया था ।४८। अपने रथ का त्याग करके भूमि पर स्थित मंगल के मस्तक में शीघ्र ही परशु से प्रहार करके उसका हनन कर दिया था। जब उसका शिर भग्न हो गया था तो वह रुधिर का वमन करता हुआ बार-बार मूर्च्छा प्राप्त करके एक ही क्षण में मृत्यु के मुख में चला गया था ।४९। उसकी समस्त सेना भी अस्त्र से प्रदग्ध हो गयी थी और क्षण भर में ही इसके उपरान्त भस्मसात् होकर विनाश को प्राप्त हो गयी थी। चन्द्रवंश में समुत्पन्न नृपों में श्रेष्ठ उस राजा मङ्गल के निपतित हो जाने पर राम को परम हर्ष प्राप्त हुआ ।५०-५१।

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३०६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भार्गव-चरित्र (३)

वसिष्ठ उवाच— मत्स्यराजे निपतिते राजा युद्धविशारदः । राजेन्द्रान्प्रेरयामास कार्त्तवीर्यो महाबलः ॥१ बृहद्वलः सोमदत्तो विदर्भो मिथिलेश्वरः । निषधाधिपतिश्चैव मगधाधिपतिस्तथा ॥२ आययुः समरे योद्धुं भार्गवेन्द्रेण भूपते । वर्षतः शरजालानि नानायुद्धविशारदाः ॥३ वीराभिमानिनः सर्वे हैहयस्याज्ञया तदा । पिनाकहस्तः स भृगुर्ज्वलदग्निशिखोपमः ॥४ चिक्षेप नागपाशं च अभिमंत्र्य शरोत्तमम् । तदस्त्रं भार्गवेन्द्रेण क्षिप्तं संग्राममूर्द्धनि ॥५ चकत्र्त गरुडास्त्रेण सोमदत्तो महाबलः । ततः क्रुद्धो महाभागो रामः शत्रुविदारणः ॥६ रुद्रदत्तेन शस्त्रेण सोमदत्तं जघान ह । बृहद्वलं च गदया विदर्भं मुष्टिना तथा ॥७

वसिष्ठजी ने कहा—मत्स्यराज के मर जाने पर युद्ध करने की कला के महामनीषी—महान बलशाली कार्त्तवीर्य ने फिर वहाँ रणभूमि में अन्य राजेन्द्रों को भेजा था ।१। मिथिला का स्वामी विदर्भ सोमदत्त बहुत अधिक बल वाला था। निषध देश का अधिपति और मगध देश का स्वामी—ये सब हे भूपते ! भार्गवेन्द्र परशुराम के साथ युद्ध करने के लिए समागत हो गये थे । ये सभी अनेक प्रकार के युद्ध करने में परम पण्डित थे और ये वहाँ अपने बाणों के जालों की वर्षा कर रहे थे ।२-३। ये सभी वीरता के अभिमान रखने वाले थे और उस समय में राजा हैहय की आज्ञा पाकर ही युद्ध करने के लिए आये थे । वह भृगु परशुराम अपने हाथ में धनुष ग्रहण किये थे तथा जलती हुई अग्नि के समान परम तेजस्वी थे ।४। भार्गवेन्द्र परशुराम ने नागपाश नामक एक शस्त्र था उसके उत्तम शर को अभिमन्त्रित करके

भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३०७

संग्राम में फेंका था ॥५॥ किन्तु भार्गवेन्द्र के द्वारा प्रक्षिप्त किये उस अस्त्र को महा बलवान् सोमदत्त ने काट दिया था और उसको अपने गरुड़ास्त्र से ही खण्डित कर दिया था। इसके अनन्तर महाभाग राम अत्यन्त क्रुद्ध हुए थे जो कि अपने शत्रुओं का विदारण करने वाले थे ॥६॥ इसके पश्चात् परशुराम ने भगवान रुद्र के द्वारा दिये हुए शूल में सोमदत्त का हनन कर दिया था—गदा से वृहदबल का और मुष्टि के प्रहार से विदर्भ का निपातन कर दिया था ।७।

मैथिलं मुद्गरेणैव शक्त्या च निषधाधिपम् ।
मागधं चरणाघातैरस्त्रजालेन सैनिकान् ॥८
निहत्य निखिलां सेनां संहाराग्निसमीरणे ।
दुद्राव कार्त्तवीर्यं च जामदग्न्यो महाबलः ॥६
दृष्ट्वा तं योद्धुमायांतं राजानोऽन्ये महारथाः ।
कार्याकार्यविधानज्ञाः पृष्ठे कृत्वा च हैहयम् ॥१०
रामेण युयुधुश्चैव दर्शयंतश्च सौहृदम् ।
कान्यकुब्जाश्च शतशः सौराष्ट्राऽवंतयस्तथा ॥११
चक्रुश्च शरजालानि रामस्य च समंततः ।
शरजालावृतस्तेषां रामः संग्राममूर्द्धनि ॥१२
न चादृश्यत राजेंद्र तदा स त्वकृतव्रणः ।
सस्मार रामचरितं यदुक्तं हरिणेन वै ॥१३
कुशलं भार्गवेंद्रस्य याचमानो हरिं मुनिः ।
एतस्मिन्नेव काले तु रामः शस्त्रास्त्रकोविदः ॥१४

राम ने मिथिला के नृप का हनन मुद्गर के द्वारा और शक्ति से निषध देश के नृप का वध तथा मगधदेशाधिपति का निपातन चरणों के आघातों से एवं उनके सब सैनिकों का वध अपने अनेक अस्त्रों के प्रहारों से कर दिया ।८। इस रीति से परशुरामजी ने वहाँ पर स्थित सम्पूर्ण सेना को मारकर महान् बलवान् जामदग्नि के पुत्र ने उस संहार की अग्नि के समीरण में राजा कार्त्तवीर्य पर दौड़कर आक्रमण किया था ।६। उस समय में महारथी अन्य राजाओं ने जो कि कार्य और अकार्य के विधान के ज्ञाता थे जब

३०८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यह देखा कि परशुराम कार्तवीर्य से युद्ध करने के लिए आ रहे हैं तो उन सबने उस कार्तवीर्य को अपने पीठ पीछे कर दिया था।१०। और हैहय राजा के प्रति अपना सौहार्द दिखलाते हुए वे सब परशुराम के साथ युद्ध कर रहे थे। इन राजाओं में कान्य कुब्ज-सौराष्ट्र और सैकड़ों ही अवन्ति के नृप थे।११। इन सभी ने परशुराम पर सभी ओर अपने शरों के जालों की ऐसी घोर वर्षा की थी कि उस समय में परशुराम उनके बाणों से उस संग्राम भूमि में चारों ओर से ढक गये थे।१२। हे राजेन्द्र ! इस बाणों की वृष्टि से राम दिखाई नहीं दे रहे थे। तब उस अकृतव्रण ने उस श्रीराम के चरित का स्मरण किया था जो हरिण के द्वारा कहा गया था।१३। उस मुनि ने भगवान् श्रीहरि से भार्गवेन्द्र परशुराम के कुशल रहने की याचना की थी। इतने ही बीच में ऐसा हुआ कि समस्त शस्त्रों और अस्त्रों के महापण्डित परशुराम ने अपने महान् आयुधों का प्रयोग किया था।१४।

विधूय शरजालानि वायव्यास्त्रेण मंत्रवित् ।
उदतिष्ठद्रणाकांक्षी नीहारादिव भास्करः ॥१५॥
त्रिरात्रं समरे रामस्तैः सार्द्धं युयुधे बली ।
द्वादशाक्षौहिणीस्तत्र चिच्छेद लघुविक्रमः ॥१६॥
रम्भास्तम्भवनं यद्वत् परश्वधवरायुधः ।
सर्वांस्तान्नृपवर्गांश्च तदीयाश्च महाचमूः ॥१७॥
दृष्ट्वा विनिहतां तेन रामेण सुमहात्मना ।
आजगाम महावीर्यः सुचन्द्रः सूर्यवंशजः ॥१८॥
लक्षराजन्यसंयुक्तः सप्ताक्षौहिणिसंयुतः ।
तत्रानेकमहावीरा गर्जंतस्तोयदा इव ॥१९॥
कंपयंतो भुवं राजन् युयुधुर्भार्गवेण च ।
तैः प्रयुक्तानि शस्त्राणि महास्त्राणि च भूपते ॥२०॥
क्षणेन नाशयामास भार्गवेन्द्रः प्रतापवान् ।
गृहीत्वा परशुं दिव्यं कालांतकयमोपमम् ॥२१॥

मन्त्रों के परमज्ञाता राम ने अपने अस्त्र के द्वारा समस्त शरों के समुदाय को दूर करके कुहरे से निकले हुए भगवान् सूर्य देवकी भांति वहां

भागंव-चरित्र (३) ] [ ३०९

पर रण करने की इच्छा वाले उठकर खड़े हो गये थे ।१५। महान् बलवान् उन परशुराम ने उन सबके साथ तीन दिन और रात्रि पर्यन्त समराङ्गण में घोर युद्ध किया था। और परम लघु विक्रम वाले परशुराम ने वहाँ पर बारह अक्षौहिणी सेनाओं का छेदन कर दिया था अर्थात् सबको काटकर मार गिराया था ।१६। जिस तरह से केलों के वन को काटकर गिरा दिया जाया करता है उसी भाँति से परम श्रेष्ठ परशुराम ने अपने परशु से उन सब भूपों को और उनकी बड़ी भारी सेनाओं को काटकर मार दिया था। जब सूर्यवंश में समुत्पन्न महान् वीर्य वाले सुचन्द्र नामक नृप ने यह देखा था कि उस महात्मा राम ने सब सेना को मार गिराया है तो वह वहाँ पर युद्ध करने के लिए स्वयं सामने आगया था ।१८-१९। उसके साथ लाखों अन्य राजा थे और सात अक्षौहिणी सेना भी थी। उनमें बहुत से ऐसे महान् वीर थे जो घनघोर मेघों के ही समान गर्जन कर रहे थे ।१६। हे राजन् ! वे अपनी गर्जना-तर्जना से सम्पूर्ण भूमि के प्राणियों को कंपा रहे थे और उन्होंने वहाँ आकर परशुराम के साथ घोर युद्ध किया था। हे भूपते ! उन्होंने अनेक शस्त्रों और अस्त्रों का वहाँ पर प्रयोग किया था ।२०। तब एक ही क्षण में महान् प्रताप वाले परशुराम ने कालान्तक यमराज के सदृश अपने परम दिव्य परशु (फर्शा) का ग्रहण करके उस सबका विनाश कर दिया था ।२१।

कालयन्सकलां सेनां चिच्छेद भृगुनन्दनः ।
कर्षकस्तु यथा क्षेत्रे पक्वं धान्यं तथा तृणम् ॥२२
निःशेषयति दात्रेण तथा रामेण तत्कृतम् ।
लक्षराजन्यसैन्यं तद्दृष्ट्वा रामेण दारितम् ॥२३
सुचन्द्रः पृथिवीपालो युयुधे संगरे नृप ।
तावुभौ तत्र संक्षुब्धौ नानाशस्त्रास्त्रकोविदौ ॥२४
युयुधाते महावीरो मुनीशनृपतीश्वरौ ।
रामोऽस्मै यानि शस्त्राणि चिक्षेपास्त्राणि चापि हि ॥२५
तानि सर्वाणि चिच्छेद सुचंद्रो युद्धपंडितः ।
ततः क्रुद्धो रणे रामः सुचंद्रं पृथिवीश्वरम् ॥२६

३१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

कृतप्रतिकृताभिज्ञं ज्ञात्वोपस्पृश्य वार्यथ । नारायणास्त्रं विशिखे संदधे चानिवारितम् ॥२७ तदस्त्रं शतसूर्याभं क्षिप्तं रामेण धीमता । हृष्टोत्तीर्य रथात्सद्यः सुचंद्रः प्रणाम ह ॥२८

उस सम्पूर्ण सेना को काटते हुए भृगुनन्दन ने छिन्न-भिन्न करके मार गिराया था जिस तरह से कोई खेतिहर किसान अपने खेत में पकी हुई फसल को तथा घास फूँस को काट दिया करता है ।२२। कृषक अपनी दराँत से जैसे काट देता है वैसे ही परशुरामजी ने उस सेना को काट दिया था। जब लाखों राजाओं की सेना को राम के परशु के द्वारा विदीर्ण हुई देखा गया था ।२३। तो हे नृप ! राजा सुचन्द्र ने समर में परशुराम के साथ स्वयं ही समागत होकर युद्ध किया था। वे दोनों ही बहुत अधिक क्षुब्ध हो रहे थे और दोनों अनेक शस्त्रास्त्रों के प्रयोग करने में बहुत ही कुशल पंडित थे ।२४। वे दोनों मुनीन्द्र और राजा महान् वीर थे और और युद्ध कर रहे थे। परशुराम ने जिन-जिन शस्त्रों तथा अस्त्रों का भी उस पर प्रक्षेप किया था ।२५। युद्ध में परम प्रवीण पण्डित उस सुचन्द्र नृपने उन सभी शस्त्रास्त्रों को काट गिया था। इसके अनन्तर परशुराम को उस रण में बहुत अधिक क्रोध आ गया था और परशुराम को ऐसा ज्ञान हुआ था कि यह सुचन्द्र नृप ऐसा कुशल है कि जिसका भी इस पर प्रयोग किया जाता है उसी का प्रतिकार करना यह अच्छी तरह से जानता है तो उस समय में जल का उपस्पर्शन किया था और फिर विशिख नारायण अस्त्र का सन्धान किया था जो कि किसी भी प्रकार से निवारित नहीं हो सकता था ।२६-२७। वह नारायणास्त्र सैकड़ों सूर्यों की आभा वाला था जिसका कि प्रक्षेप बुद्धिमान् परशुराम ने सुचन्द्र पर किया था। उस समय में इस नारायणास्त्र को देख कर सुचन्द्र नृप तुरन्त ही अपने रथ से नीचे उतर गया था और उसने उस अस्त्र को प्रणाम किया था ।२८।

सर्वास्त्रपूज्यं तच्चापि नारायणविनिर्मितम् । तमेवं प्रणतं त्यक्त्वा ययौ नारायणांतिकम् ॥२६ विस्मितोऽभूत्तदा रामः समरे शत्रुसूदनः । दृष्ट्वा व्यर्थं महास्त्रं तद्भूपं स्वस्थं विलोक्य च ॥३०

भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३११

रामः शक्तिं च मुसलं तोमरं पट्टिशं तथा ।
गदां च परशुं कोपाच्चिक्षेप नृपमूर्द्ध नि ॥३१
जग्राह तानि सर्वाणि सुचंद्रो लीलयैव हि ।
चिक्षेप शिवशूलं च रामो नृपतये यदा ॥३२
बभूव पुष्पमालां च तच्छूलं नृपतेर्गले ।
ददर्श च पुरस्तस्य भद्रकालीं जगत्प्रसूम् ॥३३
वहंतीं मुंडमालां च विकटास्यां भयंकरीम् ।
सिंहस्थां च त्रिनेत्रां च त्रिशूलवरधारिणीम् ॥३४
दृष्ट्वा विहाय शस्त्रास्त्रं नमस्कृत्य समैडत ।
राम उवाच-
नमोस्तु ते शंकरवल्लभायै जगत्सवित्र्यै समलंकृतायै ॥३५

और वह अस्त्र भी समस्त अस्त्रों में परम पूज्य था क्योंकि साक्षात् भगवान् नारायण ने ही उसका निर्माण किया था । जब उस सुचन्द्र को इस भाँति से प्रणाम करते हुए देखा तो वह अस्त्र उसको छोड़कर भगवान् नारायण के ही समीप में चला गया था ।२६। अपने शत्रुओं के विनाश करने वाले परशुराम को उस समय में समर स्थल में बहुत ही अधिक विस्मय हो गया था जबकि उन्होंने यह देखा था कि उनके द्वारा प्रयोग किया हुआ वह महान् अस्त्र भी व्यर्थ हो गया था और कुछ भी शत्रु का न करके उसी रूप में स्वस्थ वह बना रहा था ।३०। फिर राम ने अनेक शक्ति-मुसल-तोमर-पट्टिश-गदा और परशु आदि का उस सुचन्द्र पर प्रक्षेप बड़े ही क्रोध पूर्वक किया था ।३१। किन्तु इन सबका कुछ भी प्रभाव उस पर नहीं हुआ था और उसने उन सबको यों ही लीला से ही ग्रहण कर लिया था । जिस समय में परशुराम ने उस सुचन्द्र पर शिवशूल का प्रक्षेप दिया था ।३२। तो वह शिव शूल भी आकर उस राजा के गले में पुष्पों की माला होकर गिर गया था । उस समय में परशुराम ने यह देखा था कि उसके आगे समस्त जगत् की जननी भद्रकाली संस्थित हो रही है ।३३। वह भद्रकाली देवी नरमुण्डों की माला कण्ठ में पहिने हुई थीं तथा उसका मुख बहुत ही भीषण था और सबको भय देने वाली थी । वह एक सिंह के ऊपर सवार रही थी—तीन उसके नेत्र थे और हाथों में त्रिशूल धारण कर रही थी

३१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

।२४। ऐसी भगवती भद्रकाली का दर्शन करके परशुराम जी ने अपने सभी शस्त्र-अस्त्रों का परित्याग कर दिया था और देवी के चरणों में प्रणाम करके फिर उसकी भली भाँति स्तुति की थी। परशुराम ने कहा—आप तो भगवान् शङ्कर की प्रियवल्लभा हैं और इस सम्पूर्ण जगत् को जन्म देने वाली हैं। आपके लिए मेरा नमस्कार है। ३५।

नानाविभूषाभिरिभारिगायै प्रपन्नरक्षाविहितोद्यमायै । दक्षप्रसूत्यै हिमवद्भव्यायै महेश्वरार्द्धांगसमास्थितायै ।।३६ काल्यै कलानाथकलाधरायै भक्तप्रियायै भुवनाधिपायै । ताराभिधायै शिवतत्परायै गणेश्वरा राधितपादुकायै ।।३७ परात्परायै परमेष्ठिदायै तापत्रयोन्मूलनर्चितनायै । जगद्धितायास्तपुरत्रयायै बालादिकायै त्रिपुराभिधायै ।।३८ समस्तविद्यासुविलासदायै जगज्जनन्यै निहिताहितायै । बकाननायै बहुसौख्यदायै विध्वस्तनानासुरदानवायै ।।३६ वराभयालंकृतदोर्लतायै समस्तगीर्वाणनमस्कृतायै । पीतांबरायै पवनाशुगायै शुभप्रदायै शिवसंस्तुतायै ।।४० नागारिगायै नवखण्डपायै नीलाचलाभांगलसत्प्रभायै । लघुक्रमायै ललिताभिधायै लेखाधिपायै लवणाकरायै ।।४१ लोलेक्षणायै लयवर्जितायै लाक्षारसालंकृतपंकजायै । रमाभिधायै रतिसुप्रियायै रोगापहायै रचिताखिलायै ।।४२

आप विविध प्रकार के आभूषणों से समलंकृता हैं और इभारि के द्वारा गान की गयीं हैं। आपकी शरणागति में प्रपन्न हो जाते हैं उनकी सुरक्षा के लिये आप उद्यम करने वाली हैं। आपने प्रजापति दक्ष के घर में जन्म धारण किया है और हिमवान् के यहाँ भी आप समुत्पन्न हुई हैं। आप साक्षात् महेश्वर की पाणिपरिणीता प्रिय पत्नी बनकर उनके अर्द्धाङ्ग में समास्थित हुई हैं। ३६। आप कला नाथ की कला के धारण करने वाली हैं—अपने भक्तों की प्रिय काली हैं और समस्त भुवनों की स्वामिनी हैं। तारा नाम वाली हैं—भगवान् शिव की सेवा में सर्वदा तत्पर रहा करती हैं

भार्गव-चरित्र (३) ] [ ३१३

और विश्वेश्वर गणेश आपकी पादुकाओं का समाराधन किया करते हैं ।३७। आप पर से भी परा हैं—परमेष्ठी के पद को प्रदान करने वाली हैं और आध्यात्मिक-आधिदैविक-आधिभौतिक—इन तीनों प्रकार के तापों का उन्मूलन करने वाला आपका चिन्तन हुआ करता है—इस जगत् के हित के लिए ही आपने त्रिपुरासुर को निहत किया था। बाला से आदि लेकर अनेक आपके शुभ नाम हैं तथा आपका परम शुभ त्रिपुरा—यह भी नाम है। ऐसी आपके लिये मेरा प्रणाम है ।३८। आप समस्त विद्याओं के सुविलास के प्रदान करने वाली हैं—इस सम्पूर्ण जगत् के जनन देने वाली जननी हैं—आप अहित करने वाले शत्रुओं को निहत कर देने वाली हैं—आप बकानना हैं अर्थात् बगुलामुखी हैं—आपने अनेक असुरों और दानवों का निहनन किया है और अत्यधिक सौख्य प्रदान किया है ।३९। आपके कर कमलों में वरदान और अभयदान रहते हैं और इनसे आपकी भुजलताएँ भूषित रहा करती हैं—समस्त देवगणों के द्वारा आपके चरण कमल वन्दित हैं—आप पीताम्बरा अर्थात् पीतवर्ण के वस्त्र धारण करने वाली हैं—आप पवन के ही समान अपने भक्तों की पीड़ा दूर करने के लिये शीघ्र गमन करने वाली हैं—आपका संस्तवन भगवान् शङ्कर भी किया करते हैं तथा आप आप सबको शुभ प्रदान करने वाली हैं—ऐसी आपकी चरण सेवा में मेरा अनेक बार प्रणिपात है ।४०। आप नागरि के द्वारा गान की गयी हैं—नव खण्डों वाले विश्व का पालन एवं रक्षण करने वाली हैं तथा नीलाचल की आभा वाले अंगों की प्रभा से शोभित हैं। आप लघुक्रमा-ललिता नाम धारिणी-लेखाधिपा और लवणाकारा हैं—।४१। आपके नेत्र परमाधिक चञ्चल हैं-आप लय से वर्जित हैं और आपके चरणों में लाक्षारस लगा हुआ है जिससे आपके चरण कमल समलंकृत हैं। आपका शुभ नाम रमा है—आप सुरति से प्यार करने वाली हैं—आप सभी रोगों का अपहरण करने वाली हैं और आपने ही सबकी रचना की है—ऐसी आपके लिए मेरा प्रणाम निवेदित है ।४२।

राज्यप्रदायै रमणोत्सुकायै रत्नप्रभायै रुचिरांबरायै। नमो नमस्ते परतः पुरस्तात् पार्श्वाधरोर्ध्वं च नमो नमस्ते ॥४३

सदा च सर्वत्र नमो नमस्ते नमो नमस्तेऽखिलविग्रहायै। प्रसीद देवेशि मम प्रतिज्ञां पुरां कृतां पालय भद्रकालि ॥४४

३१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

त्वमेव माता च पिता त्वमेव जगत्त्रयस्यापि नमो नमस्ते ।
वसिष्ठ उवाच—
एवं स्तुता तदा देवी भद्रकाली तपस्विनी ॥४५
उवाच भार्गवं प्रीता वरदानकृतोत्सवा ।
भद्रकाल्युवाच—
वत्स राम महाभाग प्रीतास्मि तव सांप्रतम् ॥४६
वरं वरय मत्तो यस्त्वया चाभ्यर्थितो हृदि ।
राम उवाच—
मातर्यदि वरो देयस्त्वया मे भक्तवत्सले ॥४७
तत्सुचन्द्रं जये युद्धे तवानुग्रहभाजनम् ।
इति मेऽभिहितं देवि कुरु प्रीतेन चेतसा ॥४८

आप राज्य के प्रदान करने वाली हैं—आप रमण करने के लिए परम समुत्सुक रहा करती हैं—आपकी रत्नों के सदृश प्रभा है और आप रुचिर वस्त्रों के परिधान करने वाली हैं—ऐसी आपके लिए बारम्बार मेरा नमस्कार है ॥४३॥ आपकी सेवा में मेरा सदा और सर्वत्र अनेक बार नमस्कार है । आप समस्त प्रकार के शरीर को धारण करने वाली हैं । आपकी सेवा में बारम्बार प्रणिपात है । हे देवेशि ! आप मेरे ऊपर अनुकम्पा करके प्रसन्न हो जाइए और हे भद्रकालि ! मैंने जो समग्र भूमि को क्षत्रियों से हीन कर देने की पहिले प्रतिज्ञा की है उसको परिपूर्ण करा दीजिए॥४४॥ आप ही मेरी माता-पिता हैं और मेरी ही क्या इन तीन जगतों की माता हैं और आप ही पिता हैं—ऐसी आपके चरणों में मेरा बार-बार प्रणाम निवेदित है । वसिष्ठ जी ने कहा—उस समय में परमाधिक वेगवाली भद्रकाली देवी इस प्रकार से संस्तुत की गयी थी ॥४५॥ तो वह देवी परम प्रसन्न होकर वरदान द्वारा आनन्द देने वाली होती हुई भार्गव परशुराम से बोली—भद्रकाली ने कहा—हे वत्स राम ! आप महान भाग वाले हैं । अब इस समय में मैं आपके ऊपर बहुत प्रसन्न हो गई हूँ ॥४६॥ आप मुझसे वरदान प्राप्त कर लो जो भी कुछ तुमने अपने हृदय में विचार करके मेरी प्रार्थना की है । परशुराम ने कहा—हे भक्तवत्सले ! यदि आप हे माता !

भार्गव-चरित्र (३) ] | ३१५

मुझे कोई वरदान ही देना चाहती हैं तो मैं यही वरदान चाहता हूँ कि यह राजा सुचन्द्र से इस युद्ध में मेरा जय हो जावे तभी मैं आपकी अनुकम्पा का पात्र होऊँगा । हे देवि ! यही मेरा निवेदन आपकी सेवा में मैंने किया है सो आप परम प्रसन्न चित्त से हो कर दीजिए ।४७-४८।

येन केनाप्युपायेन जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ।
भद्रकाल्युवाच–
आग्नेयास्त्रेण राजेंद्रं सुचंद्रं नय मद्गृहम् ॥४६॥
ममातिप्रियमद्यैव पार्षदो मे भवत्वयम् ।
वसिष्ठ उवाच–
इत्युक्तमाकर्ण्य स सार्गवेंद्रो देव्याः प्रियं
कर्तुं मथोद्यतोऽभूत् ॥५०॥
प्राणान्नियम्याचमनं च कृत्वा सुचंद्रमुद्दिश्य च तत्समादधे ।
अस्त्रं प्रयुक्तं नृपतेर्वधाय रामेण राजन् प्रसभं तदा तत् ॥५१॥
दग्ध्वा वपुर्भूत मयं तदीयं निनाय लोकं परदेवतायाः ।
ततस्तु रामेण कृतप्रणामा सा भद्रकाली जगदादिकर्त्री ॥५२॥
अंतर्हिताभूदथ जामदग्न्यस्तस्थौ रणे भूपवधाभिकांक्षी ॥५३॥

हे जगत् की माता ! जिस किसी भी उपाय से मेरा विजय हो जावे यही मेरी इच्छा है । मेरा आपके लिए नमस्कार है । भद्रकाली देवी ने कहा–राजेन्द्र सुचन्द्र को तुम आग्नेयास्त्र द्वारा ही मेरे स्थान में पहुँचा दो ।४६। यह मेरा अत्यधिक प्रिय भक्त है सो आज ही यह मेरे गृह में पहुँचकर मेरा पार्षद हो जावेगा । वसिष्ठ जी ने कहा–उस भार्गव परशुराम जी ने यह इतना ही देवी के द्वारा कहा हुआ श्रवण करके इसके अनन्तर वह देवी का प्रिय कार्य करने के लिए समुद्यत हो गया था ।५०। फिर परशुराम जी ने प्राणों का आयाम करके आचमन किया था और फिर राजा सुचन्द्र को उद्दिष्ट करके वह अस्त्र धारण किया था उस अस्त्र का हे राजन् ! राम ने नृप के वध के लिए बलपूर्वक उस समय में प्रयोग किया था ।५१। उसके उस भौतिक शरीर को अपने अस्त्र से भस्मीभूत करके उसको फिर पर देवता के लोक को पहुँचा दिया था । इसके अनन्तर परशुराम के द्वारा प्रणिपात

३१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

की हुई वह जगत की आदि कर्त्री भद्रकाली देवी वहाँ पर अन्तर्हित हो गयी थी और परशुराम उस रण स्थल में भूप के वध की आकांक्षा वाला होकर स्थित हो गये थे ।५२-५३।

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परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध

वसिष्ठ उवाच– सुचंद्रे पतिते राजन् राजेंद्राणां शिरोमणौ । तत्पुत्रः पुष्कगक्षस्तु रामं योद्धुमथागतः ॥१ स रथस्थो महावीर्यः सर्वशस्त्रास्त्रकोविदः । अभिवीक्ष्य रणेत्युग्रं रामं कालांतकोपमम् ॥२ चकार शरजालं च भार्गवेंद्रस्य सर्वतः । मुहूर्त्तं जामदग्न्योऽपि बाणैः संछादितोऽभवत् ॥३ ततो निष्क्रम्य सहसा भार्गवेंद्रो महाबलः । शरबंधान्महाराज समुदैक्षत सर्वतः ॥४ दृष्ट्वा तं पुष्कराक्षं तु सुचंद्रतनयं तदा । क्रोधमाहारयामास दिधक्षन्निव पावकः ॥५ स क्रोधेन समाविष्टो वारुणं समवासृजत् । ततो मेघाः समुत्पन्ना गर्जंतो भैरवानुरवान् ॥६ ववृषुर्जंलधाराभिः प्लावयंतो धरां नृप । पुष्कराक्षो महावीर्यो वायव्यास्त्रमवासृजत् ॥७

श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! अब राजा सुचन्द्र का निपातन हो गया था जो कि सभी राजेन्द्रों को शिरोमणि था तब उसका पुत्र पुष्कराक्ष परशुरामजी से युद्ध करने के लिए वहाँ पर आगया था ।१। वह महान बल वीर्य वाला था और अपने रथ पर संस्थित था और सभी प्रकार के शस्त्राशस्त्रों के प्रयोग करने में बहुत बड़ा पण्डित था तथापि उसकी दृष्टि में परशुराम रण में अतीव उग्र और कालान्तक यम के समान दिखाई दिये थे ।२। उस पुष्कराक्ष ने ऐसी बाणों की वृष्टि उनके सभी ओर की थी एक

परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३१७

घड़ी के लिए परशुरामजी को शरों के जाल से भली भाँति ढक दिया था ।३। इसके अनन्तर भार्गवेन्द्र जो महान बल से समन्वित थे उस बाणों के जाल से सहसा बाहिर निकल आये और हे महाराज ! उसने शरों के बन्धों को सभी ओर देखा था ।४। उस समय में परशुराम ने सुचन्द्र के पुत्र पुष्क- राक्ष के ऊपर अपनी दृष्टि डाली थी और उनको बड़ा भारी क्रोध उत्पन्न हो गया था । उस समय में क्रोध से वे जलती हुई अग्नि के ही समान दिखाई दे रहे थे ।५। उस काल में क्रोध से समाविष्ट होकर वारुण अस्त्र को छोड़ा था । इसके अस्त्र के प्रभाव से सभी ओर से महान भैरव गर्जना करते हुए मेघ समुत्पन्न हो गये थे ।६। हे नृप ! उन मेघों ने जल के धारा सम्पात से इस पृथ्वी को प्लावित करते हुए बड़ी घोर वृष्टि की थी । पुष्कराक्ष महान वीर्य वाला था उसने भी उस समय में वायव्य अस्त्र को छोड़ दिया था ।७।

तेन तेऽदर्शनं नीताः सद्य एव बलाहकाः ।
अथ रामो भृशं क्रुद्धो ब्राह्मं तत्राभिसंदधे ॥८
पुष्कराक्षोऽपि तेनैव विचकर्ष महाबलः ।
ब्राह्मं सोऽप्याहितं दृष्ट्वा दंडाहत इवोरगः ॥९
घोरं परशुमादाय निःश्वसंस्तमधावत ।
रामस्याधावतस्तत्र पुष्कराक्षो धनुर्धरः ॥१०
संदधे पंचविशिखान्दीप्तास्यानुरगानिव ।
एकैकेन च बाणेन हृदि शीर्षे भुजद्वये ॥११
शिखायां च क्रमाद्वित्त्वा तस्तंभ भृशमातुरम् ।
स चैवं पीडितो रामः पुष्कराक्षेण संयुगे ॥१२
क्षणं स्थित्वा भृशं धावन्परशुं मूर्द्ध्न्यपातयत् ।
शिखामारभ्य पादातं पुष्कराक्षं द्विधाऽकरोत् ॥१३
पतिते शकले भूमौ तत्कालं पश्यतां नृणाम् ।
आश्चर्यं सुमहज्जातं दिवि चैव दिवौकसाम् ॥१४

उसने वायव्य अस्त्र के द्वारा उन सभी मेघों को तितर-बितर करके तुरन्त ही दूर भगा दिया था जो कि वहाँ बिल्कुल भी दिखाई न दे रहे थे ।

३१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

इसके अनन्तर परमाधिक क्रुद्ध हुए और उन्होंने ब्रह्मास्त्र अभिसन्धान किया था ।८। महान बली पुष्कराक्ष ने भी उसी समय में ब्रह्म अस्त्र का ही प्रयोग करके उसको निकृष्ट कर दिया था। तब वह इतना क्रोधित हो गया था जैसे दण्ड से आहत सर्प हो जाया करता है ऐसा जब परशुराम ने उसको देखा था ।६। फिर उष्ण श्वास लेते हुए राम ने अपना महान घोर परशु ले लिया था और उसकी ओर दौड़े थे। धनुर्धारी पुष्कराक्ष ने वहाँ पर दौड़ते हुए परशुराम के ऊपर पाँच बाण छोड़े थे जो परम दीप्त उरगों के ही समान थे। उसने एक-एक बाण से परशुराम के शरीर का वेधन किया था और एक हृदय में—एक शिर में दो भुजाओं में और एक शिखा में मारकर इनका भेदन कर दिया था तथा बहुत ही आतुर करके स्तम्भित कर दिया था। वह राम इस प्रकार से प्रपीड़ित हो गये थे और युद्ध स्थल में पुष्कराक्ष ने उनको जहाँ तहाँ रोक दिया था ।१०-१२। पर क्षण भर स्थित रहकर बहुत ही बहुत अधिक बल से दौड़कर उन्होंने फिर उस पुष्कराक्ष के मस्तक में अपने परशु का प्रहार किया था और चोटी से लेकर पैरों तक उसके दो टुकड़े कर दिये थे ।१३। दो खण्डों में कटकर उसके भूमि पर निपतित हो जाने पर जो भी मनुष्य वहाँ पर देख रहे थे उनको तथा देवलोक में देवों को बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ था कि इतने बड़े बलशाली को किस तरह से टुकड़े कर मार गिराया है ।१४।

विदार्य रामस्तं क्रोधात्पुष्कराक्षं महाबलम् ।
तत्सैन्यमदहत्क्रुद्धः पावको विपिनं यथा ॥१५
यतो यतो धावति भार्गवेन्द्रो मनोऽनिलौजाः प्रहरन्परश्वधम् ।
ततस्ततो वाजिरथेभमानवा निकृत्तगात्राः शतशो निपेतुः ॥१६
रामेण तत्रातिबलेन संगरे निहन्यमानास्तु परश्वधेन ।
हा तात मातस्त्वति जल्पमाना भस्मीबभूवुः
सुविचूर्णितास्तदा ॥१७
मुहूर्त्तमात्रेण च भार्गवेण तत्पुष्कराक्षस्य बलं समग्रम् ।
अनेकराजन्यकुलं हतेश्वरं हतं नवाक्षौहिणिकं भृशातुरम् ॥१८
पतिते पुष्कराक्षे तु कार्त्तवीर्यार्जुनः स्वयम् ।
आजगाम महावीर्यः सुवर्णरथमास्थितः ॥१६

परशुराम द्वारा कार्त्तवीर्य-वध ] [ ३१६

नानाशस्त्रसमाकीर्णं नानारत्नपरिच्छदम् ।
दशनल्वप्रमाणं च शतवाजियुतं नृपः ॥२०
युते बाहुसहस्रेण नानायुधधरेण च ।
बभौ स्वर्लोकमारोक्ष्यन्देहांते सुकृती यथा ॥२१

परशुराम ने क्रोध करके उस महाबली पुष्कराक्ष को विदीर्ण करके फिर क्रुद्ध होकर उसकी जो परम विशाल सेना थी उसको भी भस्मीभूत करके जला दिया जिस तरह से दावाग्नि बड़े भारी वन को जला दिया करता है ।१५। मन और वायु के सदृश ओज वाले परशुराम जहां-जहां पर भी दौड़कर जाते थे और अपने फरशा से प्रहार कर रहे थे वहीं-वहीं पर अश्व-रथ-हाथी और मानव सैनिक कट-कटकर छिन्न भिन्न शरीर वाले सैकड़ों ही गिर गये थे ।१६। अत्यन्त बल वाले राम ने वहां युद्ध भूमि में अपने परशु से जिनको मारकर गिरा दिया था अथवा अधमरे होकर गिर गये थे वे उस समय में मूर्च्छित होकर पड़े हुए चीत्कार कर रहे थे और हे तात ! हे माता ! हम मर रहे हैं—यह कहते हुए भस्मीभूत हो गये थे ।१७। मुहूर्त्त मात्र में ही अर्थात् दो घड़ियों के समय में भार्गव ने उस पुष्कराक्ष की सम्पूर्ण सेना को तथा बहुत से राजाओं के समुदाय को जिनके स्वामी निहत सो गये हैं एवं अत्यन्त आतुर नौ अक्षौहिणी सैन्य को निहत कर दिया था ।१८। जब यह देखा गया था कि पुष्कराक्ष जैसा महाबली मर गया तो कार्त्तवीर्यार्जुन जिसका महान बल-वीर्य था स्वयं एक सुवर्ण से निर्मित रथ पर समास्थित होकर वहाँ पर युद्ध करने के लिए समागत हो गया था ।१९। उसका वह ऐसा रथ था जिसमें अनेक भाँति के शस्त्र भरे हुए थे और विविध भाँति के रत्नों का परिच्छद था। उसका प्रमाण दशनल्व था और उसमें सौ अश्व लगे हुए थे ।२०। वह राजा भी अनेक आयुध धारी सहस्र बाहुओं से युक्त था। उसकी उस समय में ऐसी शोभा हो रही थी जैसे कोई पुण्यात्मा देह के अन्त समय में स्वर्गलोक को जा रहा होवे ।२१।

पुत्रास्तस्य महावीर्या शतं युद्धविशारदाः ।
सेनाः संव्यूह्य संतस्थुः संग्रामे पितुराज्ञया ॥२२
कार्त्तवीर्यस्तु बलवान्रामं दृष्ट्वा रणाजिरे ।
कालांतकयमप्रख्यं योद्धुं समुपचक्रमे ॥२३

३२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दक्षे पंचशतं बाणान्वामे पंचशतं धनुः । जग्राह भार्गवेंद्रस्य समरे जेतुमुद्यतः ॥२४ बाणवर्षं चकाराथ रामस्योपरि भूपते । यथा बलाहको वीर पर्वतोपरि वर्षति ॥२५ बाणवर्षेण तेनाजौ सत्कृतो भृगुनन्दनः । जग्राह स्वधनुर्दिव्यं बाणवर्षं तथाऽकरोत् ॥२६ तावुभौ रणसंहृप्तौ तदा भार्गवहहयौ । चक्रतुर्युद्धमतुलं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥२७ ब्रह्मास्त्रं च स भूपालः संदधे रणमूर्द्धनि । वधाय भार्गवेंद्रस्य सर्वशस्त्रास्त्रधृग्बली ॥२८

उस कार्त्तवीर्य के पुत्र भी सो थे जो महान वीर्य वाले थे और युद्ध करने की विद्या में महान पण्डित थे । वे भी सब अपने पिता की आज्ञा से सेनाओं का संग्रह करके संग्राम में समवस्थित हो गये थे ।२२। उस बलवान कार्त्तवीर्य ने रणभूमि में जब परशुराम को देखा था उसको उनका स्वरूप ऐसा प्रतीत होता था मानों वह कालान्तक यम ही होवें फिर भी वह युद्ध करने को प्रस्तुत हो गया था ।२३। भार्गव को युद्ध में जीतने के लिए उसके दाहिनी ओर पाँच सौ बाण थे और वामभाग में पाँच सौ धनुष थे ।२४। हे भूपते ! उस सहस्रार्जुन ने परशुराम के ऊपर बाणों का प्रक्षेप ऐसा किया था जैसे मेघ वृष्टि कर रहे होवें । जिस प्रकार बलाहक मेघ किसी पर्वत पर धुआंधार जल की वर्षा किया करते हैं ।२५। उसने बाणों की वर्षा के द्वारा ही उस रणभूमि में भृगुनन्दन का सत्कार किया था । उसने अपना दिव्य धनुष ग्रहण किया था । और उसी भाँति से बाणों की थी ।२६। वे दोनों ही कार्त्तवीर्य और भार्गव राम उस समय में रण करके के दर्प वाले थे और उन दोनों ने अनुपम युद्ध किया था जो बड़ा ही तुमुल और रोम हर्षण था उस रण के प्राङ्गण में उस राजा ने ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया था । वह राजा सभी शस्त्रों और अस्त्रों के धारण करने वाला और बलवान था जिसने के वध के ही लिए इस अस्त्र का प्रयोग किया था ।२८।

रामोऽपि वायुं पस्पृश्य ब्राह्मं ब्राह्माय संदधे । ततो व्योम्नि सदा सक्त द्वे चाप्यस्त्रे नराधिप ॥२६

परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३२१

ववृधाते जगत्प्रान्ते तेजसा ज्वलनार्कवत् ।
त्रयो लोकाः सपाताला दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥३०
ज्वलदस्त्रयुगं तप्ता मेनिरेऽस्योपसंयमम् ।
रामस्तदा वीक्ष्य जगत्प्रणाशं जगन्निवासोक्त-
मथास्मरत्तदा ॥३१
रक्षा विधेयाऽद्य मयाऽस्य संयमो निवारणीयः
परमांशधारिणा ।
इति व्यवस्य प्रभुरुग्रतेजा नेत्रद्वयेनाथ तदस्त्रयुग्मम् ॥३२
पीत्वातिरामं जगदाकलय्य तस्थौ क्षणं ध्यानगतो महात्मा ।
ध्यानप्रभावेण ततस्तु तस्य ब्रह्मास्त्रयुग्मं विगतप्रभावम् ॥३३
पपात भूमौ सहसाऽथ यत्क्षणं सर्वं जगत्स्वास्थ्यमुपाजगाम ।
स जामदग्न्यो महतां महीयान्स्रष्टुं तथा
पालयितुं निहंतुम् ॥३४
विभुस्तथापीह निजं प्रभावं गोपायितुं लोकविधिं चकार ।
धनुर्द्धरः शूरतमो महस्वान्सदग्रणीः संसदि तथ्यवक्ता ॥३५

इधर परशुराम जी ने भी जल का उपस्पर्शन करके ब्रह्मास्त्र के निराकरण करने के लिए ब्रह्मास्त्र का ही सन्धान किया था । हे नराधिप ! उस समय में वे दोनों अस्त्र सदा ही अन्तरिक्ष में प्रसक्त हो गये थे ।२६। वे दोनों ही तेज से जाज्वल्यमान सूर्यों के समान जगत्प्रान्त में विशेष रूप से बढ़ रहे थे । उस समय में पाताल के सहित तीनों लोक इस महान अद्भुत अस्त्रों के पारस्परिक संघर्ष को देख रहे थे ।३०। वे दोनों ब्रह्मास्त्र जाज्वल्य-मान थे और सभी लोग उनके तेज से संतप्त हो रहे थे । उस समय में इसका उपसंयम सभी ने माना था । परशुराम ने भी तब सम्पूर्ण जगत का प्रकृष्ट नाश देखकर उसी समय में जगन्निवास के कथन का स्मरण किया था ।२१। आज मेरे द्वारा किसी भी रीति से सुरक्षा करनी चाहिए और इसका संयम करके निवारण करना ही चाहिए क्योंकि मैं तो परमांश का अर्थात् प्रभु के ही अंश का धारण करने वाला हूँ जिसकी यह सृष्टि है । यह निश्चय करके अतीव उग्र तेज वाले प्रभु ने अपने दोनों नेत्रों से उन दोनों