संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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की हुई वह जगत की आदि कर्त्री भद्रकाली देवी वहाँ पर अन्तर्हित हो गयी थी और परशुराम उस रण स्थल में भूप के वध की आकांक्षा वाला होकर स्थित हो गये थे ।५२-५३।
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परशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध
वसिष्ठ उवाच– सुचंद्रे पतिते राजन् राजेंद्राणां शिरोमणौ । तत्पुत्रः पुष्कगक्षस्तु रामं योद्धुमथागतः ॥१ स रथस्थो महावीर्यः सर्वशस्त्रास्त्रकोविदः । अभिवीक्ष्य रणेत्युग्रं रामं कालांतकोपमम् ॥२ चकार शरजालं च भार्गवेंद्रस्य सर्वतः । मुहूर्त्तं जामदग्न्योऽपि बाणैः संछादितोऽभवत् ॥३ ततो निष्क्रम्य सहसा भार्गवेंद्रो महाबलः । शरबंधान्महाराज समुदैक्षत सर्वतः ॥४ दृष्ट्वा तं पुष्कराक्षं तु सुचंद्रतनयं तदा । क्रोधमाहारयामास दिधक्षन्निव पावकः ॥५ स क्रोधेन समाविष्टो वारुणं समवासृजत् । ततो मेघाः समुत्पन्ना गर्जंतो भैरवानुरवान् ॥६ ववृषुर्जंलधाराभिः प्लावयंतो धरां नृप । पुष्कराक्षो महावीर्यो वायव्यास्त्रमवासृजत् ॥७
श्री वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन् ! अब राजा सुचन्द्र का निपातन हो गया था जो कि सभी राजेन्द्रों को शिरोमणि था तब उसका पुत्र पुष्कराक्ष परशुरामजी से युद्ध करने के लिए वहाँ पर आगया था ।१। वह महान बल वीर्य वाला था और अपने रथ पर संस्थित था और सभी प्रकार के शस्त्राशस्त्रों के प्रयोग करने में बहुत बड़ा पण्डित था तथापि उसकी दृष्टि में परशुराम रण में अतीव उग्र और कालान्तक यम के समान दिखाई दिये थे ।२। उस पुष्कराक्ष ने ऐसी बाणों की वृष्टि उनके सभी ओर की थी एक