संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३१७
घड़ी के लिए परशुरामजी को शरों के जाल से भली भाँति ढक दिया था ।३। इसके अनन्तर भार्गवेन्द्र जो महान बल से समन्वित थे उस बाणों के जाल से सहसा बाहिर निकल आये और हे महाराज ! उसने शरों के बन्धों को सभी ओर देखा था ।४। उस समय में परशुराम ने सुचन्द्र के पुत्र पुष्क- राक्ष के ऊपर अपनी दृष्टि डाली थी और उनको बड़ा भारी क्रोध उत्पन्न हो गया था । उस समय में क्रोध से वे जलती हुई अग्नि के ही समान दिखाई दे रहे थे ।५। उस काल में क्रोध से समाविष्ट होकर वारुण अस्त्र को छोड़ा था । इसके अस्त्र के प्रभाव से सभी ओर से महान भैरव गर्जना करते हुए मेघ समुत्पन्न हो गये थे ।६। हे नृप ! उन मेघों ने जल के धारा सम्पात से इस पृथ्वी को प्लावित करते हुए बड़ी घोर वृष्टि की थी । पुष्कराक्ष महान वीर्य वाला था उसने भी उस समय में वायव्य अस्त्र को छोड़ दिया था ।७।
तेन तेऽदर्शनं नीताः सद्य एव बलाहकाः ।
अथ रामो भृशं क्रुद्धो ब्राह्मं तत्राभिसंदधे ॥८
पुष्कराक्षोऽपि तेनैव विचकर्ष महाबलः ।
ब्राह्मं सोऽप्याहितं दृष्ट्वा दंडाहत इवोरगः ॥९
घोरं परशुमादाय निःश्वसंस्तमधावत ।
रामस्याधावतस्तत्र पुष्कराक्षो धनुर्धरः ॥१०
संदधे पंचविशिखान्दीप्तास्यानुरगानिव ।
एकैकेन च बाणेन हृदि शीर्षे भुजद्वये ॥११
शिखायां च क्रमाद्वित्त्वा तस्तंभ भृशमातुरम् ।
स चैवं पीडितो रामः पुष्कराक्षेण संयुगे ॥१२
क्षणं स्थित्वा भृशं धावन्परशुं मूर्द्ध्न्यपातयत् ।
शिखामारभ्य पादातं पुष्कराक्षं द्विधाऽकरोत् ॥१३
पतिते शकले भूमौ तत्कालं पश्यतां नृणाम् ।
आश्चर्यं सुमहज्जातं दिवि चैव दिवौकसाम् ॥१४
उसने वायव्य अस्त्र के द्वारा उन सभी मेघों को तितर-बितर करके तुरन्त ही दूर भगा दिया था जो कि वहाँ बिल्कुल भी दिखाई न दे रहे थे ।