संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 311, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र (३) ] | ३१५
मुझे कोई वरदान ही देना चाहती हैं तो मैं यही वरदान चाहता हूँ कि यह राजा सुचन्द्र से इस युद्ध में मेरा जय हो जावे तभी मैं आपकी अनुकम्पा का पात्र होऊँगा । हे देवि ! यही मेरा निवेदन आपकी सेवा में मैंने किया है सो आप परम प्रसन्न चित्त से हो कर दीजिए ।४७-४८।
येन केनाप्युपायेन जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ।
भद्रकाल्युवाच–
आग्नेयास्त्रेण राजेंद्रं सुचंद्रं नय मद्गृहम् ॥४६॥
ममातिप्रियमद्यैव पार्षदो मे भवत्वयम् ।
वसिष्ठ उवाच–
इत्युक्तमाकर्ण्य स सार्गवेंद्रो देव्याः प्रियं
कर्तुं मथोद्यतोऽभूत् ॥५०॥
प्राणान्नियम्याचमनं च कृत्वा सुचंद्रमुद्दिश्य च तत्समादधे ।
अस्त्रं प्रयुक्तं नृपतेर्वधाय रामेण राजन् प्रसभं तदा तत् ॥५१॥
दग्ध्वा वपुर्भूत मयं तदीयं निनाय लोकं परदेवतायाः ।
ततस्तु रामेण कृतप्रणामा सा भद्रकाली जगदादिकर्त्री ॥५२॥
अंतर्हिताभूदथ जामदग्न्यस्तस्थौ रणे भूपवधाभिकांक्षी ॥५३॥
हे जगत् की माता ! जिस किसी भी उपाय से मेरा विजय हो जावे यही मेरी इच्छा है । मेरा आपके लिए नमस्कार है । भद्रकाली देवी ने कहा–राजेन्द्र सुचन्द्र को तुम आग्नेयास्त्र द्वारा ही मेरे स्थान में पहुँचा दो ।४६। यह मेरा अत्यधिक प्रिय भक्त है सो आज ही यह मेरे गृह में पहुँचकर मेरा पार्षद हो जावेगा । वसिष्ठ जी ने कहा–उस भार्गव परशुराम जी ने यह इतना ही देवी के द्वारा कहा हुआ श्रवण करके इसके अनन्तर वह देवी का प्रिय कार्य करने के लिए समुद्यत हो गया था ।५०। फिर परशुराम जी ने प्राणों का आयाम करके आचमन किया था और फिर राजा सुचन्द्र को उद्दिष्ट करके वह अस्त्र धारण किया था उस अस्त्र का हे राजन् ! राम ने नृप के वध के लिए बलपूर्वक उस समय में प्रयोग किया था ।५१। उसके उस भौतिक शरीर को अपने अस्त्र से भस्मीभूत करके उसको फिर पर देवता के लोक को पहुँचा दिया था । इसके अनन्तर परशुराम के द्वारा प्रणिपात