संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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त्वमेव माता च पिता त्वमेव जगत्त्रयस्यापि नमो नमस्ते ।
वसिष्ठ उवाच—
एवं स्तुता तदा देवी भद्रकाली तपस्विनी ॥४५
उवाच भार्गवं प्रीता वरदानकृतोत्सवा ।
भद्रकाल्युवाच—
वत्स राम महाभाग प्रीतास्मि तव सांप्रतम् ॥४६
वरं वरय मत्तो यस्त्वया चाभ्यर्थितो हृदि ।
राम उवाच—
मातर्यदि वरो देयस्त्वया मे भक्तवत्सले ॥४७
तत्सुचन्द्रं जये युद्धे तवानुग्रहभाजनम् ।
इति मेऽभिहितं देवि कुरु प्रीतेन चेतसा ॥४८
आप राज्य के प्रदान करने वाली हैं—आप रमण करने के लिए परम समुत्सुक रहा करती हैं—आपकी रत्नों के सदृश प्रभा है और आप रुचिर वस्त्रों के परिधान करने वाली हैं—ऐसी आपके लिए बारम्बार मेरा नमस्कार है ॥४३॥ आपकी सेवा में मेरा सदा और सर्वत्र अनेक बार नमस्कार है । आप समस्त प्रकार के शरीर को धारण करने वाली हैं । आपकी सेवा में बारम्बार प्रणिपात है । हे देवेशि ! आप मेरे ऊपर अनुकम्पा करके प्रसन्न हो जाइए और हे भद्रकालि ! मैंने जो समग्र भूमि को क्षत्रियों से हीन कर देने की पहिले प्रतिज्ञा की है उसको परिपूर्ण करा दीजिए॥४४॥ आप ही मेरी माता-पिता हैं और मेरी ही क्या इन तीन जगतों की माता हैं और आप ही पिता हैं—ऐसी आपके चरणों में मेरा बार-बार प्रणाम निवेदित है । वसिष्ठ जी ने कहा—उस समय में परमाधिक वेगवाली भद्रकाली देवी इस प्रकार से संस्तुत की गयी थी ॥४५॥ तो वह देवी परम प्रसन्न होकर वरदान द्वारा आनन्द देने वाली होती हुई भार्गव परशुराम से बोली—भद्रकाली ने कहा—हे वत्स राम ! आप महान भाग वाले हैं । अब इस समय में मैं आपके ऊपर बहुत प्रसन्न हो गई हूँ ॥४६॥ आप मुझसे वरदान प्राप्त कर लो जो भी कुछ तुमने अपने हृदय में विचार करके मेरी प्रार्थना की है । परशुराम ने कहा—हे भक्तवत्सले ! यदि आप हे माता !