संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा कार्तवीर्य-वध ] [ ३२१
ववृधाते जगत्प्रान्ते तेजसा ज्वलनार्कवत् ।
त्रयो लोकाः सपाताला दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ॥३०
ज्वलदस्त्रयुगं तप्ता मेनिरेऽस्योपसंयमम् ।
रामस्तदा वीक्ष्य जगत्प्रणाशं जगन्निवासोक्त-
मथास्मरत्तदा ॥३१
रक्षा विधेयाऽद्य मयाऽस्य संयमो निवारणीयः
परमांशधारिणा ।
इति व्यवस्य प्रभुरुग्रतेजा नेत्रद्वयेनाथ तदस्त्रयुग्मम् ॥३२
पीत्वातिरामं जगदाकलय्य तस्थौ क्षणं ध्यानगतो महात्मा ।
ध्यानप्रभावेण ततस्तु तस्य ब्रह्मास्त्रयुग्मं विगतप्रभावम् ॥३३
पपात भूमौ सहसाऽथ यत्क्षणं सर्वं जगत्स्वास्थ्यमुपाजगाम ।
स जामदग्न्यो महतां महीयान्स्रष्टुं तथा
पालयितुं निहंतुम् ॥३४
विभुस्तथापीह निजं प्रभावं गोपायितुं लोकविधिं चकार ।
धनुर्द्धरः शूरतमो महस्वान्सदग्रणीः संसदि तथ्यवक्ता ॥३५
इधर परशुराम जी ने भी जल का उपस्पर्शन करके ब्रह्मास्त्र के निराकरण करने के लिए ब्रह्मास्त्र का ही सन्धान किया था । हे नराधिप ! उस समय में वे दोनों अस्त्र सदा ही अन्तरिक्ष में प्रसक्त हो गये थे ।२६। वे दोनों ही तेज से जाज्वल्यमान सूर्यों के समान जगत्प्रान्त में विशेष रूप से बढ़ रहे थे । उस समय में पाताल के सहित तीनों लोक इस महान अद्भुत अस्त्रों के पारस्परिक संघर्ष को देख रहे थे ।३०। वे दोनों ब्रह्मास्त्र जाज्वल्य-मान थे और सभी लोग उनके तेज से संतप्त हो रहे थे । उस समय में इसका उपसंयम सभी ने माना था । परशुराम ने भी तब सम्पूर्ण जगत का प्रकृष्ट नाश देखकर उसी समय में जगन्निवास के कथन का स्मरण किया था ।२१। आज मेरे द्वारा किसी भी रीति से सुरक्षा करनी चाहिए और इसका संयम करके निवारण करना ही चाहिए क्योंकि मैं तो परमांश का अर्थात् प्रभु के ही अंश का धारण करने वाला हूँ जिसकी यह सृष्टि है । यह निश्चय करके अतीव उग्र तेज वाले प्रभु ने अपने दोनों नेत्रों से उन दोनों