संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
दक्षे पंचशतं बाणान्वामे पंचशतं धनुः । जग्राह भार्गवेंद्रस्य समरे जेतुमुद्यतः ॥२४ बाणवर्षं चकाराथ रामस्योपरि भूपते । यथा बलाहको वीर पर्वतोपरि वर्षति ॥२५ बाणवर्षेण तेनाजौ सत्कृतो भृगुनन्दनः । जग्राह स्वधनुर्दिव्यं बाणवर्षं तथाऽकरोत् ॥२६ तावुभौ रणसंहृप्तौ तदा भार्गवहहयौ । चक्रतुर्युद्धमतुलं तुमुलं लोमहर्षणम् ॥२७ ब्रह्मास्त्रं च स भूपालः संदधे रणमूर्द्धनि । वधाय भार्गवेंद्रस्य सर्वशस्त्रास्त्रधृग्बली ॥२८
उस कार्त्तवीर्य के पुत्र भी सो थे जो महान वीर्य वाले थे और युद्ध करने की विद्या में महान पण्डित थे । वे भी सब अपने पिता की आज्ञा से सेनाओं का संग्रह करके संग्राम में समवस्थित हो गये थे ।२२। उस बलवान कार्त्तवीर्य ने रणभूमि में जब परशुराम को देखा था उसको उनका स्वरूप ऐसा प्रतीत होता था मानों वह कालान्तक यम ही होवें फिर भी वह युद्ध करने को प्रस्तुत हो गया था ।२३। भार्गव को युद्ध में जीतने के लिए उसके दाहिनी ओर पाँच सौ बाण थे और वामभाग में पाँच सौ धनुष थे ।२४। हे भूपते ! उस सहस्रार्जुन ने परशुराम के ऊपर बाणों का प्रक्षेप ऐसा किया था जैसे मेघ वृष्टि कर रहे होवें । जिस प्रकार बलाहक मेघ किसी पर्वत पर धुआंधार जल की वर्षा किया करते हैं ।२५। उसने बाणों की वर्षा के द्वारा ही उस रणभूमि में भृगुनन्दन का सत्कार किया था । उसने अपना दिव्य धनुष ग्रहण किया था । और उसी भाँति से बाणों की थी ।२६। वे दोनों ही कार्त्तवीर्य और भार्गव राम उस समय में रण करके के दर्प वाले थे और उन दोनों ने अनुपम युद्ध किया था जो बड़ा ही तुमुल और रोम हर्षण था उस रण के प्राङ्गण में उस राजा ने ब्रह्मास्त्र का सन्धान किया था । वह राजा सभी शस्त्रों और अस्त्रों के धारण करने वाला और बलवान था जिसने के वध के ही लिए इस अस्त्र का प्रयोग किया था ।२८।
रामोऽपि वायुं पस्पृश्य ब्राह्मं ब्राह्माय संदधे । ततो व्योम्नि सदा सक्त द्वे चाप्यस्त्रे नराधिप ॥२६