संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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ब्रह्माजी की पुत्री सरस्वती विधि के अग्निहोत्र के तीनों कुण्डों को पूरित करने के लिए समायात हुई थी ।४४। वहां पर उसी सरस्वती के तत्पर परम पुनीत और शुभ तथा महाश्चर्य से युक्त कुम्भज ऋषि के आश्रम को भार्गव ने देखा था जो अनेक मुनिगणों के द्वारा निषेवित था ।४५। वह आश्रम परम शान्त था और उसमें मृग और सिंह अपना स्वाभाविक वैर त्याग कर परम शान्त मन वाले एक ही साथ रहा करते थे । ऐसे सभी पशुओं का वहाँ पर निवास था । उस आश्रम में अनेक प्रकार के परम सुन्दर तरुवर लगे हुए थे जिनमें कुटर-अर्जुन-विम्ब-पारिभद्र-धव-इङ्गुद-खदिरासन-खर्जूर और बदरी आदि के अकृत व्रण से संयुत होकर प्रवेश किया था ।४५-४६-४७। प्रवेश करके राम ने विराजमान और परमशान्त मन वाले मुनिवर अगस्त्यजी का दर्शन प्राप्त किया था जो सर्वथा एकदम रुके हुए शान्त जल से भरे हुए सरोवर के ही समान थे तथा शाश्वत ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे ।४८। वहाँ पर लताओं और द्रुमों के पत्तों से एक उटज (झोंपड़ी) बनी हुई थी उस उटज में अगस्त्य मुनि कौश्य—वृष्य तथा मृग चर्म को परिधान किये हुए विराजमान थे । हे महाराज ! वहाँ पर भार्गव राम ने अपने नाम का उच्चारण करते हुए अगस्त्य मुनि के चरणों में प्रणि-पात किया था ।४६।
रामोऽस्मि जामदग्न्योऽहं भवतं द्रष्टुमागतः । तद्विद्धि प्रणिपातेन नमस्ते लोकभावन ॥५० इत्युक्तवन्तं रामं तु उन्मील्य नयने शनैः । दृष्ट्वा स्वागतमुच्चार्य तस्मायासनमादिशत् ॥५१ मधुपर्कं समानीय शिष्येण मुनिपुंगवः । ददौ पप्रच्छ कुशलं तपसश्च कुलस्य च ॥५२ स पृष्टस्तेन वै रामो घटोद्भवमुवाच ह । भवत्सन्दर्शनादीश कुशलं मम सर्वतः ॥५३ किं त्वेकं संशयं जातं छिन्धि स्ववचनामृतैः । मृगश्चैको मया दृष्टो मध्यमे पुष्करे विभो ॥५४ तेनोक्तमखिलं वृत्तं मम भूतमनार्गतम् । तच्छ्रुत्वा विस्मयाविष्टो भवच्छरणमागतः ॥५५