भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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परशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७५

पाहि मां कृपया नाथ साधयंतं महामनुम् ।
शिवेन दत्तं कवचं मम साधयतो गुरो ॥५६॥

राम ने अगस्त्य मुनि के चरणों की सन्निधि में समुपस्थित होकर उनसे निवेदन किया था कि मैं जमदग्नि का आत्मज राम हूँ और यहाँ पर आपके दर्शन करने के लिए समागत हुआ हूँ। हे लोकों पर कृपा करने वाले मुनिवर ! मैं आपकी सेवा में प्रणिपात कर रहा हूँ उसे आप स्वीकार कीजिए ।५०। जब राम ने इस रीति से प्रार्थना की थी तो ऐसे कहने वाले राम को उन्होंने धीरे से ध्यानावस्था में मुँदे हुए नेत्रों को खोलकर देखा था और फिर आपका स्वागत है-- ऐसा उच्चारण करके उनको आसन पर उपविष्ट हो जाने की आज्ञा प्रदान की थी ।५१। उन मुनियों में परम श्रेष्ठ अगस्त्य जी ने शिष्य के द्वारा मधुपर्क मँगाकर राम को प्रदान किया था। फिर तपश्चर्या और कुल की क्षेम-कुशल उससे पूछी थी ।५२। उन मुनिवर के द्वारा जब राम से इस रीति से पूछा गया था तो उस समय में राम ने अगस्त्य मुनि से कहा था । हे ईश ! अब आपके चरणों के दर्शन से मेरा सभी प्रकार का क्षेम-कुशल है ।५३। हे विभो ! मुझे एक संशय हो गया है। उसका छेदन आप कृपा कर अपने अमृत रूपी वचनों के द्वारा कर दीजिए। मैंने एक मृग को मध्यम पुष्कर में देखा था ।५४। उस मृग ने मेरा अतीत और अनागत सम्पूर्ण वृत्त बतला दिया था । इसका श्रवण करके मैं अधिक विस्मय से आविष्ट हो गया हूँ और अब आपके चरण कमलों की शरण में समागत हुआ हूँ ।५५। अपनी स्वाभाविक अनुकम्पा से मेरा परित्राण कीजिए । और हे नाथ ! महामन्त्र की सिद्धि कराइये । हे गुरो ! भगवान् शिव ने जो कवच मुझे प्रदान किया है उसको सिद्ध कराइये । इसमें आपकी परमानुकम्पा मेरे दास के ऊपर होगी ।५६।

कृष्णस्य समतीतं तु साधिकं हि शरच्छतम् ।
न च सिद्धिमवाप्तोऽहं तन्मे त्वं कृपया वद ॥५७

वसिष्ठ उवाच-

एवं प्रश्नं समाकर्ण्य रामस्य सुमहात्मनः ।
क्षणं ध्वात्वा महाराज मृगोक्तं ज्ञातवान् हृदा ॥५८॥
मृगं चापि समायातं मृग्या सह निजाश्रमे ।