संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
श्रोतुं कृष्णामृतं स्तोत्रं सर्वं तत्कारणं मुनिः ।
विचार्यश्वासयामास भार्गवः स्ववचोऽमृतैः ॥५६
इस श्रीकृष्ण के मन्त्र की साधना करते हुए मुझे एक सौ वर्ष से भी अधिक काल व्यतीत हो गया है तो भी मुझे इसकी सिद्धि प्राप्त नहीं हुई है । इसका क्या कारण है । यह आप मुझे अपनी परमाधिक कृपा करके बतलाइए ।५७। श्री वसिष्ठ मुनि ने कहा—इस प्रकार का जो प्रश्न महात्मा राम ने किया था उसका श्रवण करके हे महाराज ! उस महामुनि ने एक क्षण भर कुछ ध्यान किया था और फिर जो कुछ भी उस मृग ने कहा था उसको उस समय में उन्होंने अपने ध्यान से जान लिया था ।५८। अपनी मृगी के साथ अपने आश्रम में आये हुए उस मृग को भी उन्होंने जान लिया था जो कि श्रीकृष्णमृत स्तोत्र का श्रवण करने के लिए ही वहाँ पर समागत हुआ था । मुनि ने उस सबका कारण भी समझ लिया था । इस सबका विचार करके उन महामुनि अगस्त्य जी ने उस भार्गव राम को अपने अमृत रूपी वचनों के द्वारा आश्वासन दिया था ।५६।
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन
वसिष्ठ उवाच—
अवगत्य स वै सर्वं कारणं प्रीतमानसः ।
उवाच भार्गवं राममगस्त्यः कुम्भसंभवः ॥१
अगस्त्य उवाच—
शृणु राम महाभाग कथयामि हितं तव ।
मन्त्रस्य सिद्धिं येन त्वं शीघ्रमेव समाप्नुयाः ॥२
भक्तेस्तु लक्षणं ज्ञात्वा त्रिविधाया महामते ।
यो यतेत नरस्तस्य सिद्धिर्भवति सत्वरम् ॥३
एकदाऽहमनुप्राप्तोऽनन्तदर्शनकांक्षया ।
पातालं नागराजैन्द्रैः शोभितं परया मुदा ॥४
तत्र दृष्टा महाभाग मया सिद्धाः समन्ततः ।
सनकाद्या नारदश्च गौतमो जाजलिः क्रतुः ॥५