भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 273

अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७७

ऋभुर्हंसोऽरुणिश्चैव वाल्मीकिः शक्तिरासुरिः ।
एतेऽन्ये च महासिद्धा वात्स्यायनमुखा द्विज ॥६
उपासत ह्युपासीना ज्ञानार्थं फणिनायकम् ।
तं नमस्कृत्य नागेन्द्रैः सह सिद्धैर्महात्मभिः ॥७

महामुनि वसिष्ठ जी ने कहा—उस सम्पूर्ण कारण को भली भाँति समझ कर कुम्भ से समुत्पन्न अगस्त्य मुनि ने अपने मन परम प्रीति करके भार्गव राम से कहा था ।१। अगस्त्य मुनि ने कहा—हे परशुराम ! आप तो महान् भाग वाले हैं । मैं अब आपके हित की बात कहता हूँ उसका आप श्रवण कीजिए । जिनके द्वारा आप बहुत ही शीघ्र इस महामन्त्र की सिद्धि की प्राप्ति कर लेंगे ।२। हे महती मति वाले ! यह भक्ति तीन प्रकार की होती है । उस भक्ति के तीनों प्रकारों के लक्षणों का ज्ञान प्राप्त करके जो मनुष्य फिर यत्न किया करता है वह बहुत ही शीघ्र पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लिया करता है ।३। एक बार मैं स्वयं भगवान् अनन्त देव के दर्शन प्राप्त करने की आकांक्षा से पाताल लोक में गया था जो कि परमानन्द के साथ बड़े-बड़े नाग राजों से सुशोभित था ।४। हे महाभाग ! यहाँ पर मैंने देखा था कि चारों ओर बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुष विराजमान थे । वहाँ सनकादिक चारों महासिद्ध-देवर्षि नारद-गौतम-जाजलि-क्रतु-ऋभु-हंस-अरुणि-वाल्मीकि-शक्ति-आसुरि प्रभृति सभी मुनीन्द्रगण और ऋषियों के समुदाय विद्यमान थे । हे द्विज ! ये सब और अन्य भी वात्स्यायन जिनमें प्रमुख थे महान् सिद्धगण वहाँ पर बैठे हुए थे ।५-६। ये सभी वहाँ पर बैठे हुए ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति के लिये फणि नायक शेषराज की उपासना कर रहे थे । वहाँ पर बड़े-बड़े नागेन्द्र और महान् आत्मा वाले सिद्ध सभी विराजमान थे उन सबके साथ फणीन्द्र नायक शेष महाराज की सेवा में मैंने बड़े आदर के साथ प्रणिपात किया था ।७।

उपविष्टः कथास्तत्र शृण्वानो वैष्णवीर्मुदा ।
येयं भूमिर्महाभाग भूतधात्रीस्वरूपिणी ॥८
निविष्टा पुरतस्तस्य शृण्वती ताः कथाः सदा ।
यद्यत्पृच्छति सा भूमिः शेषं साक्षान्महीधरम् ॥९
शृण्वन्ति ऋषयः सर्वे तत्रस्थाः तदनुग्रहात् ।
मया तत्र श्रुतं वत्स कृष्णप्रेमामृतं शुभम् ॥१०