संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७७
ऋभुर्हंसोऽरुणिश्चैव वाल्मीकिः शक्तिरासुरिः ।
एतेऽन्ये च महासिद्धा वात्स्यायनमुखा द्विज ॥६
उपासत ह्युपासीना ज्ञानार्थं फणिनायकम् ।
तं नमस्कृत्य नागेन्द्रैः सह सिद्धैर्महात्मभिः ॥७
महामुनि वसिष्ठ जी ने कहा—उस सम्पूर्ण कारण को भली भाँति समझ कर कुम्भ से समुत्पन्न अगस्त्य मुनि ने अपने मन परम प्रीति करके भार्गव राम से कहा था ।१। अगस्त्य मुनि ने कहा—हे परशुराम ! आप तो महान् भाग वाले हैं । मैं अब आपके हित की बात कहता हूँ उसका आप श्रवण कीजिए । जिनके द्वारा आप बहुत ही शीघ्र इस महामन्त्र की सिद्धि की प्राप्ति कर लेंगे ।२। हे महती मति वाले ! यह भक्ति तीन प्रकार की होती है । उस भक्ति के तीनों प्रकारों के लक्षणों का ज्ञान प्राप्त करके जो मनुष्य फिर यत्न किया करता है वह बहुत ही शीघ्र पूर्ण सिद्धि प्राप्त कर लिया करता है ।३। एक बार मैं स्वयं भगवान् अनन्त देव के दर्शन प्राप्त करने की आकांक्षा से पाताल लोक में गया था जो कि परमानन्द के साथ बड़े-बड़े नाग राजों से सुशोभित था ।४। हे महाभाग ! यहाँ पर मैंने देखा था कि चारों ओर बड़े-बड़े सिद्ध महापुरुष विराजमान थे । वहाँ सनकादिक चारों महासिद्ध-देवर्षि नारद-गौतम-जाजलि-क्रतु-ऋभु-हंस-अरुणि-वाल्मीकि-शक्ति-आसुरि प्रभृति सभी मुनीन्द्रगण और ऋषियों के समुदाय विद्यमान थे । हे द्विज ! ये सब और अन्य भी वात्स्यायन जिनमें प्रमुख थे महान् सिद्धगण वहाँ पर बैठे हुए थे ।५-६। ये सभी वहाँ पर बैठे हुए ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति के लिये फणि नायक शेषराज की उपासना कर रहे थे । वहाँ पर बड़े-बड़े नागेन्द्र और महान् आत्मा वाले सिद्ध सभी विराजमान थे उन सबके साथ फणीन्द्र नायक शेष महाराज की सेवा में मैंने बड़े आदर के साथ प्रणिपात किया था ।७।
उपविष्टः कथास्तत्र शृण्वानो वैष्णवीर्मुदा ।
येयं भूमिर्महाभाग भूतधात्रीस्वरूपिणी ॥८
निविष्टा पुरतस्तस्य शृण्वती ताः कथाः सदा ।
यद्यत्पृच्छति सा भूमिः शेषं साक्षान्महीधरम् ॥९
शृण्वन्ति ऋषयः सर्वे तत्रस्थाः तदनुग्रहात् ।
मया तत्र श्रुतं वत्स कृष्णप्रेमामृतं शुभम् ॥१०
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७८
स्तोत्रं तत्ते प्रवक्ष्यामि यस्यार्थं त्वमिहागतः । वाराहाद्यवताराणां चरितं पापनाशनम् ॥११ सुखदं मोक्षदं चैव ज्ञानविज्ञानकारणम् । श्रुत्वा सर्वं धरा वत्स प्रहृष्टा तं धराधरम् ॥१२ उवाच प्रणता भूयो ज्ञातुं कृष्णविचेष्टितम् ।
धरण्युवाच- अलंकृतं जन्म पुंसामपि नंदव्रजौकसाम् ॥१३ तस्य देवस्य कृष्णस्य लीलावियहधारिणः । जयोपाधिनियुक्तानि संति नामान्यनेकशः ॥१४
मैं वहाँ पर बड़े ही आनन्द से भगवान् विष्णु देव की कथाओं का श्रवण करता हुआ बैठ गया था। हे महाभाग ! यह भूमि भी जो समस्त भूतों की धात्री स्वरूप वाली है वहीं पर उन शेष भगवान् के आगे बैठी हुई थी और बहुत ही प्रीति के साथ सदा कथाओं का श्रवण किया करती थी। वह भूमि साक्षात् इस मही के धारण करने वाले शेष भगवान् से जो-जो भी पूछा करती है उसको समस्त ऋषिगण वहीं पर संस्थित होकर उनके ही अनुग्रह के होने से श्रवण किया करते हैं। हे वत्स ! मैंने भी वहां परम शुभ कृष्ण प्रेमामृत का श्रवण किया था ।८-१०। उस स्तोत्र को मैं अब आपको बतलाऊंगा जिसको प्राप्त करने के लिये तुम यहाँ पर आये हो। इस स्तोत्र में वाराह आदि भगवान् के अवतारों का चरित है जो समस्त प्रकार के पापों का विनाश कर देने वाला होता है ।११। यह चरित परमाधिक सुख-सौभाग्य के प्रदान करने वाला है—परलोक में जाकर इस भौतिक शरीर के त्याग करने के पश्चात् मोक्ष का भी देने वाला है जिससे इस संसार में बारम्बार जन्म-मरण के महान् कष्टों से छुटकारा मिल जाया करता है। और यह चरित ऐसा अद्भुत है कि जो पूर्ण ज्ञान और विशेष ज्ञान का भी कारण होता है। इस वसुन्धरा देवी ने इन सब का श्रवण किया था और यह बहुत ही अधिक प्रसन्न हुई थी, हे वत्स ! फिर धराके धारण करने वाले अनन्त भगवान् से बोली थी ।१२। परम प्रणत होकर इस भूमि ने फिर भगवान् कृष्ण की लीला को जानने के लिए प्रार्थना की थी। धरणी ने कहा—भगवान् श्री कृष्ण चन्द्र जी ने नन्द गोपराज के ब्रज में निवास करने वाले ब्रजवासी मनुष्यों का भी जन्म अपना अवतार धारण कर अनेक अद्भुत लीला-
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७६
विहारों से अलंकृत कर दिया था।१३। अपनी लीला से ही विग्रह (मानवीय शरीर) धारण करने वाले उन श्री कृष्ण देव के जय की अनेक उपाधियों से नियुक्त अनेक शुभ नाम है ।१४।
तेषु नामानि मुख्यानि श्रोतुकामा चिरादहम् ।
तत्तानि ब्रूहि नामानि वासुदेवस्य वासुके ।।१५
नातः परतरं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शेष उवाच-
वसुंधरे वरारोहे जनानामस्ति मुक्तिदम् ।।१६
सर्वमंगलमूर्द्धन्यमणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ।
महापातककोटिघ्नं सर्वतीर्थफलप्रदम् ।।१७
समस्तजपयज्ञानां फलदं पापनाशनम् ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।।१८
सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्या तु यत्फलम् ।
एकावृत्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति ।।१९
तस्मात्पुण्यतरं चैतत्स्तोत्रं पातकनाशनम् ।
नाम्नामष्टोत्तरशतस्याहमेव ऋषिः प्रिये ।।२०
छन्दोऽनुष्टुब्देवता तु योगः कृष्णप्रियावहः ।
श्रीकृष्णः कमलानाथो वासुदेवः सनातनः ।।२१
उन श्रीकृष्ण के नामों में जो बहुत ही प्रमुख उनके नाम हैं उनके श्रवण करने की कामना वाली मैं बहुत अधिक समय से हो रही हूँ। हे भगवन्वासुके ! भगवान् वासुदेव के उन परम शुभ नामों को अब कृपा करके मेरे आगे बतलाइए ।१५। क्योंकि इस संसार में इससे परतर अर्थात् बड़ा अन्य कोई भी पुण्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण के परम शुभ नामों का स्मरण और श्रवण लोक में सबसे अधिक पुण्य कार्य है। भगवान् शेष ने कहा- हे परम श्रेष्ठ आरोह वाली वसुन्धरे ! भगवान् श्री कृष्ण के एक सौ आठ नामों का एक शतक स्तोत्र है और वह मानवों के लिए मुक्ति के प्रदान करने वाला है ।१६। यह शतक सभी प्रकार के मङ्गल कार्यों में शिरोमणि है तथा लौकिक साधारण वैभवों की प्राप्ति की तो बात
२८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ही क्या है यह तो अणिमा-महिमा आदि जो आठ सिद्धियां हैं उनको भी देने वाला है। बड़े-बड़े महान् जो करोड़ों प्रकार के पातक हैं उनका भी विनाश कर देने वाला और समस्त तीर्थों के स्नान-ध्यान तथा अटन का जो पुण्यफल हुआ करता है उनके प्रदान कर देने वाला होता है।१७। सभी तरह के अश्वमेधादि यज्ञों एवं जपों का जो भी फल होता है उसके देने वाला है और सभी पापों के नाश करने वाला है। हे देवि ! अब आप उस नामों के शतक को सुनिए, मैं आपको बतलाता हूँ जो एक सौ आठ भगवान् के नामों वाला है ।१८। परम पुण्यमय अन्य सहस्र नामों की तीन बार आवृत्ति के करने से जो फल प्राप्त होता है वह पुण्य-फल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम की एक ही आवृत्ति के द्वारा एक ही नाम दिया करता है ।१९। इस कारण से यह स्तोत्र विशेष पुण्य वाला है और पातकों का विनाशक है। हे प्रिये ! इस परम शुभ नामों के अष्टोत्तर शत का मैं ही ऋषि हूँ ।२०। इसका छन्द अनुष्टुप् है और इसका देवता श्री कृष्ण के प्रिय का आवहन करने वाला योग है। अब यहाँ से आगे वह अष्टोत्तर शतक का आरम्भ होता है—श्रीकृष्ण-कमला (महालक्ष्मी) के नाथ-वसुदेव के पुत्र वासुदेव-और सनातन अर्थात् सदा सर्वदा से चले आने वाले हैं ।२१।
वसुदेवात्मजः पुण्यो लीलामानुषविग्रहः ।
श्रीवत्सकौस्तुभधरो यशोदावत्सलो हरिः ॥२२
चतुर्भुं जात्तचक्रासिगदाशं खायुधायुधः ।
देवकीनन्दनः श्रीशो नन्दगोपप्रियात्मजः ॥२३
यमुनावेगसंहारी बलभद्रप्रियानुजः ।
पूतनाजीवितहरः शकटासुरभंजनः ॥२४
नन्दव्रजनानन्दी सच्चिदानंदविग्रहः ।
नवनीतविलिप्तांगो नवनीतनटोऽनघः ॥२५
नवनीतलवाहारी मुचुकुं दप्रसादकृत् ।
षोडशस्त्रीसहस्रेशस्त्रिभंगी मधुराकृतिः ॥२६
शुकवागमृताब्धींदुर्गोविदो गोविदांपतिः ।
वत्सपालनसंचारी धेनुकासुरमर्दनः ॥२७
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८१
तृणीकृततृणावर्त्तो यमलार्जुनभंजनः ।
उत्तालतालभेत्ता च तमालश्यामलाकृतिः ॥२८॥
वसुदेव को पुत्र—परम पुण्यमय—लीला ही से मानुष शरीर के धारण करने वाले हैं। श्रीवत्स का चिह्न और कौस्तुभ मणि धारण के करने वाले-यशोदा के वत्सल और हरि हैं। हरि का अर्थ होता है पापों के हरण करने वाले हैं। २२। चार भुजाओं में सुदर्शन चक्र, कौमोदकी गदा, शङ्ख और असि आदि आयुधों के धारण करने वाले हैं। देवकी के नन्दन—श्रीदेवी के स्वामी और नन्दगोप की प्रिया यशोदा के आत्मज अर्थात् पुत्र हैं। २३। यमुना के वेग का संहार करने वाले। बलभद्रजी परम प्रिय अनुज अर्थात् छोटे भाई हैं। पूतना के जीवन का हरण करने वाले तथा शकटासुर का हनन करने वाले हैं। २४। नन्दगोप ब्रह्मजन अर्थात् ब्रजवासी मनुष्यों को आनन्द देने वाले और सत्-चित् (ज्ञान) तथा आनन्द के शरीर वाले हैं अर्थात् सत्-चित् और आनन्द ये तीनों ही वस्तुएँ उनके शरीर में विद्यमान हैं। नवनीत (मक्खन) से विलिप्त अङ्गों वाले हैं जिस समय में यशोदाजी दधि मन्थन कर रही थी उस समय में दधिभाण्ड का भयंकर नवनीत अपने समस्त अङ्गों में लपेट लिया था। नवनीत के लिए नट हैं अर्थात् थोड़ा सा नवनीत पाने के लिए गोपाङ्गनाओं के यहाँ अनेक नृत्य आदि की लीलायें करने वाले हैं। अनघ अर्थात् निष्पाप स्वरूप वाले हैं। २५। नवनीत के थोड़े से भाग का आहार करने वाले हैं अर्थात् दधि और मक्खन के विक्रय करने वाली ब्रजाङ्गनाओं को मार्ग में रोककर नवनीत का आहार किया करते हैं। राजा मुचुकुन्द के ऊपर कृपा करने वाले हैं। जिस समय जरासन्ध से युद्ध हो रहा था तब स्वयं भाग कर वहाँ पर पहुँच गये थे जहाँ पर निद्रित मुचुकुन्द गुफा में यह वरदान लेकर सो रहा था कि उसे जो भी जगायेगा वह भस्म हो जायगा। उस पर अपनी पीताम्बर डालकर आप छिप गये थे जरासन्ध ने उसे श्रीकृष्ण समझ कर जगाया और भस्म हो गया था फिर भगवान् ने दर्शन देकर उसको प्रसन्न किया था। सोलह सहस्र स्त्रियों के स्वामी हैं-त्रिभङ्गी हैं अर्थात् चरण-कटि और ग्रीवा तीनों को तिरछा करके बंशी वादन करने वाले हैं तथा परमाधिक मधुर आकृति से समन्वित हैं। २६। अमृत के समान जो शुकदेव की वाणी रूपी सागर है उसके आप चन्द्र हैं अर्थात् शुकदेव जी के द्वारा श्रीमद्भागवत की रचना हुई उसके प्रकाशन चन्द्र हैं। गोविन्दों के पति हैं। जब आप बालक थे तब ब्रज में गोवत्सों का पालन करने के लिए वन में सञ्चरण करने वाले हैं तथा धेनुक नामक कंस
२८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
के द्वारा प्रेषित असुर का मर्दन करने वाले हैं।२७। तृणावर्त्त असुर को तृण के समान हनन करके डाल दिया है और जो दो अर्जुन वृक्षों का जोड़ा शाप वश वृक्ष हो गये थे उनका भंजन कर वृक्षों की योनि छुड़ा देने वाले हैं। बहुत ही ऊँचे तालों के भेदन करने वाले हैं तथा तमाल वृक्षों के सदृश श्यामल आकृति वाले हैं ।२८।
गोपगोपीश्वरो योगी सूर्यकोटिसमप्रभः ।
इलापतिः परंज्योतिर्यादवेंद्रो यदूद्वहः ॥२६
वनमाली पीतवासाः पारिजातापहारकः ।
गोवर्द्धनाचलोद्धर्त्ता गोपालः सर्वपायकः ॥३०
अजो निरंजनः कामजनकः कंजलोचनः ।
मधुहा मथुरानाथो द्वारकानाथको बली ॥३१
वृंदावनांतसंचारी तुलसीदामभूषणः ।
स्यमंतकमणेर्हर्त्ता नरनारायणात्मकः ॥३२
कुब्जाकृष्टांबरधरो मायी परमपूरुषः ।
मुष्टिकासुरचाणूरमल्लयुद्धविशारदः ॥३३
संसारवैरी कंसारिर्मुरारिर्नरकांतकः ।
अनादि ब्रह्मचारी च कृष्णाव्यसनकर्षकः ॥३४
शिशुपालशिरश्छेत्ता दुर्योधनकुलांतकृत् ।
विदुराक्रूरवरदो विश्वरूपप्रदर्शकः ॥३५
ब्रज में समस्त गोप और जो गोपियां थीं उन सबके ईश हैं—महा योगी और करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान प्रदीप्त प्रभा से समन्वित हैं। इला के पति—परम ज्योति स्वरूप यादवों में प्रमुख और यदु कुल के उद्-हन करने वाले हैं ।२६। वनमाला के धारण करने वाले-पीत वर्ण के वस्त्रों के पहिनने वाले तथा पारिजात का महेन्द्रपुरी से आहरण करने वाले हैं—गोवर्द्धन गिरि के उद्धर्त्ता अर्थात् अपनी अंगुलि पर उठाने वाले—गौओं के पालन-पोषण करने वाले और समस्त चरअचरों के पालक हैं ।३०। अजन्मा-निरंजन-कामदेव के जन्म दाता तथा कमलों के सदृश लोचनों वाले हैं। मधु नामक दैत्य के हनन कर्त्ता—मथुरापुरी के नाथ-द्वारका के स्वामी और
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८३
बलशाली हैं ।३१। वृन्दावन के मध्य में सञ्चरण करने वाले-तुलसी की माला से सुशोभित अर्थात् तुलसी की माला के भूषण वाले हैं। स्यमन्तक नाम वाली मणि को जाम्बवान् से हरण करने वाले तथा नर और नारायण के स्वरूपधारी हैं।३२। कुब्जा जो कंस नृप की चन्दन सेविका थी वह थी तो परम सुन्दरी किन्तु टेड़े-मेड़े शरीर वाली थी। उसके द्वारा समाकृष्ट वस्त्रों के धारण करने वाले हैं। कुब्जा श्रीकृष्ण पर मोहित हो गयी थी-यह तात्पर्य है। मायी और परम पुरुष हैं। कंस के मल्ल चाणूर और मुष्टिक असुर थे उनके साथ यन्त्र युद्ध में परम कोविद हैं ।३३। इस संसार के वैरी हैं अर्थात् संसार में होने वाले दुःखों के विनाशक हैं—कंस के निपात करने वाले—मुर दैत्य के नाशक और नरक नामक असुर के अन्त कर देने वाले हैं। अनादि ब्रह्मचारी हैं अर्थात् ऐसे ब्रह्मचारी हैं जिनका कभी कोई आदि नहीं है तथा कृष्ण-द्रौपदी के व्यसन के अपकर्षण करने वाले हैं अर्थात् दुःशासन के द्वारा चीर खींचकर दुर्योधन की सभा में उसको लज्जित किया जा रहा था उस समय चीर का वर्धन करके उसकी लज्जा की रक्षा करने वाले हैं ।३४। राजा शिशुपाल के शिर के छेदन करने वाले हैं और राजा कौरवेश्वर दुर्योधन के कुल का अन्त कर देने वाले हैं। विदुर और अक्रूर को वरदानों के प्रदाता हैं और विश्वरूप अर्थात् विराट् स्वरूप के प्रदर्शक हैं ।३५।
सत्यवाक्सत्यसंकल्पः सत्यभामारतो जयी ।
सुभद्रापूर्वजो विष्णुर्भीष्ममुक्तिप्रदायकः ॥३६॥
जगद्गुरुर्जगन्नाथो वेणुवाद्यविशारदः ।
वृषभासुरविध्वंसी वकारिर्बाणबाहुकृत् ॥३७॥
युधिष्ठिरप्रतिष्ठाता बर्हिबर्हावतंसकः ।
पार्थसारथिख्यक्तो गीतामृतमहोदधिः ॥३८॥
कालीयफणिमाणिक्यरंजितः श्रीपदांबुजः ।
दामोदरो यज्ञभोक्ता दानवेन्द्रविनाशनः ॥३९॥
नारायणः परं ब्रह्म पन्नगाशनवाहनः ।
जलक्रीडासमासक्तगोपीवस्त्रापहारकः ॥४०॥
पुण्यश्लोकस्तीर्थपादो वेदवेद्यो दयानिधिः ।
सर्वतीर्थात्मकः सर्वग्रहरूपी परात्परः ॥४१॥
२०४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
इत्येवं कृष्णदेवस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । कृष्णेन कृष्णभक्तेन श्रुत्वा गीतामृतं पुरा ॥४२॥
सदा सत्य वचनों वाले तथा सत्य संकल्पों वाले हैं। सत्यभामा नाम वाली अपनी पटरानी में रति रखने वाले और जयशील हैं सुभद्रा के बड़े भाई हैं—भगवान् साक्षात् विष्णु का स्वरूप हैं तथा भीष्मपितामह को मुक्ति देने वाले हैं। ३५। इस सम्पूर्ण जगत् के गुरु हैं—इस अगत् के नाथ हैं और वेणु (वंशी) के वादन करने में महापंडित हैं। वृषभासुर के विध्वंस करने वाले हैं—बकासुर के निहन्ता और बाणासुर की बाहुओं के कर्त्तन करने वाले हैं। ३७। राजा युधिष्ठिर को राज्य गद्दी पर प्रतिष्ठित करने वाले हैं और मयूर की पंख के भूषण वाले हैं। पार्थ पृथा के पुत्र अर्जुन के रथ के वहन कराने वाले सारथि हैं। इनका ऐसा स्वरूप है जो अव्यक्त है अर्थात् जिसको कोई पहिचान ही नहीं सकता है—गीता के उपदेशों से जो कि अमृत के समान हैं यह महोदधि हैं। जैसे अमृत समुद्र से उत्पन्न हुआ था वैसे ही गीता के उपदेश इनके ही हृदय से निकले हैं। ३८। कालिय नाग के मस्तक पर नृत्य करने से माणिक्य मणि से रञ्जित श्रीपद कमल वाले हैं। दाम से बद्ध उदर वाले हैं। दधिमन्थन के महाभाण्ड का भङ्ग कर देने पर यशोदा माता ने पकड़कर डोरी से बांध दिया था तभी से दामोदर नाम हुआ है। यज्ञों के भोक्ता और दानवेन्द्रों के विनाशक है। ३९। आप साक्षात् क्षीरशायी नारायण—परं ब्रह्म और पन्नगों के अशन करने वाले गरुण के वाहन वाले हैं। यमुना के जल में दिगम्बर होकर क्रीड़ा करने वाली व्रज बाला गोपियों के वस्त्रों का अपहरण करने वाले हैं। आप पुण्य अर्थात् परम पुनीत यश वाले हैं—तीर्थ के समान चरणों वाले वेदों के द्वारा जानने के योग्य और दया के निधि हैं। समस्त तीर्थों के स्वरूप वाले—सब ग्रहों से रूप वाले और पर से भी पर हैं। ४०-४१। इस प्रकार से श्रीकृष्ण देव के एक सौ आठ नामों का यह शतक है। श्रीकृष्ण के भक्त कृष्ण ने अर्थात् वेद व्यासजी ने पहिले गीतामृत का श्रवण दिया था। ४२।
स्तोत्रं कृष्णप्रियकरं कृतं तस्मान्मया श्रुतम् । कृष्णप्रेमामृतं नाम परमानन्ददायकम् ॥४३॥ अत्युपद्रवदुःखघ्नं परमायुष्यवर्द्धनम् । दानं व्रतं तपस्तीर्थं यत्कृतं त्विह जन्मनि ॥४४॥
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८५
पठतां शृण्वतां चैव कोटिकोटिगुणं भवेत् । पुत्रप्रदमपुत्राणामगतीनां गतिप्रदम् ॥४५ धनवाहं दरिद्राणां जयेच्छूनां जयावहम् । शिशूनां गोकुलानां च पुष्टिदं पुण्यवर्द्धनम् ॥४६ बालरोगग्रपादीनां शमनं शांतिकारकम् । अं ते कृष्णस्मरणदं भवतापत्रयापहम् ॥४७ असिद्धसाधकं भद्रे जपादिकरमात्मनाम् । कृष्णाय यादवेंद्राय ज्ञानमुद्राय योगिने ॥४८ नाथाय रुक्मिणीशाय नमो वेदांतवेदिने । इमं मंत्रं महादेवि जपन्नेव दिवानिशम् ॥४९
कृष्ण द्वैपायन महामुनि ने यह श्रीकृष्ण के प्रिय को करने वाला स्तोत्र रचित किया था। उन्हीं से इसका श्रवण मैंने किया था। यह श्रीकृष्ण प्रेमामृत नामक स्तोत्र परमाधिक आनन्द के प्रदान करने वाला है ।४३। यह अत्यधिक उपद्रव और दुःखों का हनन करने वाला है तथा इसके श्रवण और पठन से अधिकाधिक आयु का वर्धन होता है। इस लोक में जन्म ग्रहण करके जो भी कुछ दान-व्रत-तप-तीर्थ आदि किया है वह सभी इस परम पुनीत स्तोत्र के पढ़ने वालों तथा श्रवण किया है वह सभी इस परम पुनीत स्तोत्र के पढ़ने वालों तथा श्रवण करने वालों को करोड़ों गुना फल देने वाला होती है। जो पुत्रों से रहित है उनको यह पुत्रों के प्रदान करने वाला है तथा जिनकी सद्गति का कोई भी साधन नहीं है उनको सुगति अर्थात् उद्धार के प्रदान करने वाला है ।४४-४५। जो धन से महीन महान् दरिद्र है उनको धन का वहन कराने वाला है और जो सर्वत्र युद्ध स्थल में अपनी विजय के इच्छुक हैं उनको जय देने वाला है। यह स्तोत्र शिशुओं की और गोकुलों की पुष्टि का बढ़ाने वाला है ।४६। बालरोग और ग्रहों आदि का शमन करने वाला तथा परम शान्ति के करने वाला है। यह समय में श्रीकृष्ण की स्मृति का देने वाला तथा संसार के तीनों (आध्यात्मिक-आधिभौतिक-आधिदैविक) तापों का अपहरण करने वाला है ।४७। हे भद्रे ! यह स्तोत्र अपने असिद्ध जप आदि के साधन करने वाला अर्थात् सिद्धि कारक है। पादवेन्द्र-ज्ञान की मुद्रा वाले-योगी-रुक्मिणी के स्वामी-
२८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
वेदान्त के वेद्य नाथ श्री कृष्ण के लिए नमस्कार है--हे महादेवि ! यह मन्त्र है इसका अहर्निश जाप करते रहना चाहिए ।४८-४९।
सर्वग्रहानुग्रहभावसर्वप्रियतमो भवेत् । पुत्रपौत्रैः परिवृतः सर्वसिद्धिसमृद्धिमान् ॥५० निषेव्य भोगानंतेऽपि कृष्णसायुज्यमाप्नुयात् ।
अगस्त्य उवाच- एतावदुक्तो भगवाननंतो मूर्त्तिस्तु संकर्षणसंज्ञिता विभो ॥५१ धराधरोऽलं जगतां धरायै निर्दिश्य भूयो विरराम मानदः । ततस्तु सर्वे सनकादयो ये समास्थितास्तत्परितः कथाहताः । आनंदपूर्णा बुनिधौ निमग्नाः सभाजयामासुरहीश्वरं तम् ॥५२
ऋषय ऊचुः- नमो नमस्तेऽखिलविश्वभावन प्रपन्नभक्ता- र्तिहराव्ययात्मन् । धराधरायापि कृपार्णवाय शेषाय विश्वप्रभवे नमस्ते ॥५३ कृष्णामृतं नः परिपायितं विभो विधूतपापा भवता कृता वयम् । भवादृशा दीनदयालवो विभो समुद्धरंत्येव निजान्हि संततान् ॥५४ एवं नमस्कृत्य फणीश पादयोर्मनो विधायाखिलकामपूरयोः । प्रदक्षिणीकृत्य धराधराधरं सर्वे वयं स्वावसथानुपागताः ॥५५
इस परमोत्तम एवं दिव्य स्तोत्र का सेवन करने वाला पुरुष समस्त ग्रहों के अनुग्रह को प्राप्त करने वाला हो जाता है और वह सभी का परम प्रिय बन जाया करता है । इस अष्टोत्तर शतक कृष्ण स्तोत्र के श्रवण तथा पठन करने से भजन पुत्र-पौत्रादि से परिवृत होता है और उसके सभी प्रकार की सिद्धियों को समृद्धि हो जाया करती है ।५०। वह मनुष्य इस लोक में सब प्रकार के सुखों का उपभोग करके भी अन्त समय में भगवान् श्री
अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत का कथन ] [ २८७
कृष्ण के सायुज्य की प्राप्ति किया करता है। अगस्त्य मुनि ने कहा—हे विभो ! इतना कहकर भगवान् अनन्त देव चुप हो गये थे जो कि संकर्षण की संज्ञा वाली मूर्त्ति थी। यह भगवान् समस्त जगतों की इस धरा के धारण करने में पूर्णतया समर्थ थे। मान के देने वाले प्रभु ने पुनः धरा के लिए निर्देश किया था। इसके अनन्तर कथा का आदर करने वाले सनकादिक मुनिगण सब जो उनको चारों ओर से घेरकर समवस्थित थे आनन्द से परि-पूर्ण सागर में निमग्न हो गये थे और उन सबने अहीश्वर प्रभु को सभाजित किया था ।५१-५२। ऋषिगणों ने कहा—हे प्रभो ! आप तो इस सम्पूर्ण विश्व पर अनुकम्पा करते हुए इसका परिपालन किया करते हैं। हे अव्यय स्वरूप वाले ! आप तो शरण में समागत अपने भक्तों की आर्त्ति के हरण करने वाले हैं आपके लिए हमारा सबका बारम्बार प्रणाम है। आप इस धरा के धारण करने वाले होते हुए भी परम कृपा के सागर हैं और आप समग्र विश्व की समुत्पत्ति करने वाले हैं। ऐसे शेष भगवान् आपकी सेवा में हमारा प्रणिपात है ।५३। हे विभो ! आपने हम सबको श्रीकृष्ण के नामों का जो अष्टोत्तर शतक रूपी अमृत है उसका भली भाँति से पान कराया है और आपने हम सबको पापों से रहित कर दिया है। हे विभो ! आप सरीखे महापुरुष ही दीनों पर दया की वृष्टि करने वाले होते हैं जो कि अपने चरणों की शरण में समागत अपने भक्तों का भली भाँति उद्धार किया करते हैं ।५४। इस रीति से नमस्कार करके और समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान् शेष के चरणों में मन लगाकर तथा धराधर को परिक्रमा करके हम सब अपने-अपने निवास स्थानों को उपागत हो गये थे ।५५।
इति तेऽभिहितं राम स्तोत्रं प्रेमामृताभिधम् ।
कृष्णस्य परिपूर्णस्य राधाकांतस्य सिद्धिदम् ॥५६
इदं राम महाभाग स्तोत्रं परमदुर्लभम् ।
श्रुतं साक्षाद्भगवतः शेषात्कथययः कथाः ॥५७
यावंति मन्त्रजालानि स्तोत्राणि कवचानि च ॥५८
त्रैलोक्ये तानि सर्वाणि सिद्धयं त्येवास्य शीलनात् ।
वसिष्ठ उवाच—
एवमुक्त्वा महाराज कृष्णप्रेमामृतं स्तवम् ।
यावद्वघरं सीत्स मुनिस्तावत्स्वर्यानमागतम् ॥५९
२८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
चतुर्भिरद्भुतैः सिद्धैः कामरूपैर्मनोजवैः । अनुयातमथोत्प्लुत्य स्त्रीपुंसौ हरिणौ तदा । अगस्त्यचरणौ नत्वा समारुरुहतुर्मुदा ॥ ६० ॥ दिव्यदेहधरौ भूत्वा शंखचक्रादिचिह्नितौ । गतौ च वैष्णवं लोकं सर्वदेवनमस्कृतम् । पश्यतां सर्वभूतानां भार्गवागस्त्ययोस्तथा ॥ ६१ ॥
अगस्त्य महामुनि ने कहा कि हे राम ! श्री राधा के कान्त-परिपूर्ण भगवान् श्रीकृष्ण का यह समस्त सिद्धियों का प्रदान कर देने वाला प्रेमामृत नाम वाला स्तोत्र मैंने आपको बता दिया है ।५६। हे महाभाग राम ! यह स्तोत्र अत्यन्त दुर्लभ है । मैंने कथाओं का वर्णन करते हुए साक्षात् भगवान् शेष के ही मुख से इसका श्रवण किया है ।५७। इस लोक में जितने भी मन्त्रों के समूह हैं तथा स्तोत्र और कवच आदि हैं इस त्रिभुवन में वे सभी इस स्तोत्र के ही परिशीलन करने से सिद्ध हो जाया करते हैं । वसिष्ठजी ने कहा—हे महाराज ! इस रीति से श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तव को बतलाकर जब तक अगस्त्य मुनि विरत हुए थे तभी तक वहाँ स्वर्ग से एक यान आ गया था ।५८-५९। उस मान में चार स्वेच्छया स्वरूप धारण करने वाले—मन के ही समान वेग से समन्वित और अतीव अद्भुत सिद्धों से युक्त था । इसके अनन्तर वे दोनों हरिण और हरिणी स्त्री एवं पुरुष के स्वरूप में होकर अगस्त्य मुनि को प्रणाम करके उस समय में परम हर्ष से उछल कर उस यान में समारूढ़ हो गये ।६०। वे दोनों परम दिव्य देह के धारण करने वाले हो गये थे जो शङ्ख-चक्र आदि भगवान् के चिह्नों से संयुत थे । इसके पश्चात् वे समस्त देवगणों के द्वारा वन्दित भगवान् विष्णु के लोक में चले गये थे । उस समय इस विलक्षण घटना को वहाँ पर संस्थित सभी प्राणी तथा भार्गव राम और अगस्त्य मुनि भी देख रहे थे उन सबकी आँखों के ही सामने ऐसा हुआ था ।६१।
भार्गव चरित्र (१)
वसिष्ठ उवाच— दृष्ट्वा परशुरामस्तु तदाश्चर्यं महाद्भुतम् । जगाद सर्ववृत्तान्तं मृगयोस्तु यथाश्रुतम् ॥ १॥
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २८६
तच्छ्रुत्वा भगवान्साक्षादगस्त्यः कुंभसंभवः । मोदमान उवाचेदं भार्गवं पुरतः स्थितम् ॥२ अगस्त्य उवाच- शृणु राम महाभाग कार्याकार्यविशारद । हितं वदामि यत्तेऽद्य तत्कुरुष्व समाहितः ॥३ इतो विदूरे सुमहत्स्थानं विष्णोः सुदुर्लभम् । पदानि यत्र दृश्यंते न्यस्तानि सुमहात्मना ॥४ यत्र गंगा समुद्भूता वामनस्य महात्मनः । पदाग्रात्क्रमतो लोकांस्तद्वलेस्तु विनिग्रहे ॥५ तत्र गत्वा स्तवं चेदं मासमेकमनन्यधीः । पठस्व नियमेनैव नियतो नियताशनः ॥६ यत्त्वया कवचं पूर्वमभ्यस्तं सिद्धिमिच्छता । शत्रूणां निग्रहार्थाय तच्च ते सिद्धिदं भवेत् ॥७
श्री वसिष्ठजी ने कहा—उस समय में परशुराम ने इस महान आश्चर्य को देखकर उन दोनों हरिण-हरिणियों का सम्पूर्ण वृत्तान्त जैसा भी सुना गया था अगस्त्य मुनि से कह दिया था।१। साक्षात् कुम्भ से समुत्पत्ति ग्रहण करने वाले अगस्त्य भगवान् ने इस वृत्तान्त का श्रवण करके बहुत ही अधिक प्रसन्न होते हुए अपने समक्ष में संस्थित भार्गव राम से यह कहा था।२। अगस्त्य जी ने कहा—हे राम ! आप तो महान् भाग वाले हो और क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इस विषय में आप बहुत विद्वान हैं। आज मैं जो आपके हित की बात है उसको आपको बतलाता हूँ। उसे आप बहुत ही सावधान होते हुए कर डालिए ।३। इस स्थल से विशेष दूरी पर भगवान विष्णु का परम दुर्लभ एक बड़ा भारी स्थान है जहाँ पर भगवान् के कमनीय कोमल चरणों के चिह्न दिखलाई दिया करते हैं जहाँ पर महान् आत्मा वाले प्रभु ने उन अपने चरणों को रक्खा था।४। यह वह स्थल है जहाँ पर प्रभु ने वामन का अवतार लेकर राजा बलि को विनिगृहीत करने के कार्य में अपने चरण के अग्रभाग से सभी लोकों को समाक्रान्त कर लिया था। उस समय में ब्रह्माजी ने भगवान के चरणों को प्रक्षालित किया था और जहाँ पर महात्मा वामन के चरणों के जलसे गङ्गा
२६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
का समुद्भव हुआ था ।५। अब आप उसी स्थल में जाकर अनन्य बुद्धि वाले होते हुए एक मास तक इस स्तोत्र का पाठ करो और पूर्ण नियम से ही नियत तथा नियत अशन (भोजन) वाले होकर रहो ।६। आपने सिद्धि की इच्छा रखते हुए जिस कवच का पूर्व में अभ्यास किया था और अपने समस्त शत्रुओं के निग्रह करने की कामना से ही किया था वही अब आपको सिद्धि के देने वाला हो जायगा ।७।
वसिष्ठ उवाच–
एवमुक्तो ह्यगस्त्येन रामः शत्रुनिबर्हणः ।
नमस्कृत्य मुनिं शांतं निर्जगाश्रमाद्बहिः ॥८
पुनस्तेनैव मार्गेण संप्राप्तस्तत्र सत्वरम् ।
यत्रोत्तरात्पदन्यासान्निर्गता स्वर्णदी नृप ॥९
तत्र वासं प्रकल्प्यासावकृतव्रणसंयुतः ।
समभ्यस्यत्स्तवं दिव्यं कृष्णप्रेमामृताभिधम् ॥१०
नित्यं व्रतपतेस्तस्य स्तोत्रं तुष्टोऽभवद्धरिः ।
जगाम दर्शनं तस्य जामदग्न्यस्य भूपते ॥११
चतुर्व्यूहाधिपः साक्षात्कृष्णः कमललोचनः ।
किरीटेनार्कवर्णेन कुंडलाभ्यां च राजितः ॥१२
कौस्तुभोद्भासितोरस्कः पीतवासा घनप्रभः ।
मुरलीवादनपरः साक्षान्मोहनरूपधृक् ॥१३
तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय जामदग्न्यो मुदान्वितः ।
प्रणम्य दंडवद्भूमौ तुष्टाव प्रयतो विभुम् ॥१४
वसिष्ठजी ने कहा—इस प्रकार से शत्रुओं के निवर्हण करने वाले राम से जब अगस्त्य मुनि के द्वारा कहा गया था तो फिर राम ने मुनि को नमस्कार करके जो महा मुनि परम शान्त स्वभाव वाले थे उस आश्रम से राम बाहिर निकलकर चला गया था ।८। हे भूप ! फिर उसी मार्ग से वह बहुत शीघ्र वहाँ पर पहुँच गया था जहाँ पर उत्तर पद के न्यास से स्वर्ग गङ्गा निकली थी ।९। उस स्थल पर उस परशुराम ने अकृतव्रण के साथ ही रहकर निवास करने का अपने मन में संकल्प किया था और श्रीकृष्ण प्रेमा-
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६१
मृत नामक दिव्य स्तव का भली-भांति अभ्यास किया था ।१०। हे भूपते ! ब्रज के स्वामी उन भगवान श्रीकृष्ण उस पर परम प्रसन्न हो गये थे और उन्होंने जमदग्नि के पुत्र के लिए अपना दर्शन दिया था ।११। अब भगवान के स्वरूप का वर्णन किया जाता है जिस रूप से राम को उन्होंने दर्शन दिया था—उनके नेत्र कमलों के समान परम सुन्दर थे—भगवान कृष्ण साक्षात् चतुर्व्यूहों के अधिप थे—सूर्य के वर्ण के सदृश जाज्वल्यमान किरीट और दोनों कानों में कुण्डलों की शोभा से समन्वित थे ।१२। वक्षःस्थल में कौस्तुभ महामणि धारण किये हुए थे जिसकी प्रभा से उनका उरःस्थल समु- द्भासित हो रहा था—पीताम्बर का परिधान करने वाले नील जलद के समान प्रभा वाले थे । उनके करकमलों में वंशी थी जिसका वादन वे कर रहे थे तथा वे साक्षात् मोहन करने वाले स्वरूप को धारण करने वाले थे । ।१३। ऐसे उन भगवान् श्री कृष्ण के दर्शन करके जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने तुरन्त ही अपने आसन से उठकर गात्रोत्थान दिया था और वह बहुत ही हर्ष के समन्वित हो गये थे । उस राम ने उनके सामने चरणों में दण्ड की भांति गिरकर उन विभु को प्रणाम किया था और फिर बहुत ही प्रणत होकर उनकी स्तुति की थी ।१४।
परशुराम उवाच— नमो नमः कारणविग्रहाय प्रपन्नपालाय सुरार्त्तिहारिणे । ब्रह्मेशविष्णुद्रमुखस्तुताय ततोऽस्मि नित्यं परमेश्वराय ॥१५
यं वेदवादैर्विविधप्रकारैर्निर्णोतुमीशानमुखा न शक्नुयुः । तं त्वामनिर्देश्यमजं पुराणमनंतमीडे भव मे दयापरः ॥१६
यस्त्वेक ईशो निजवांछितप्रदो धत्ते तनूर्लोकविहाररक्षणे । नानाविधा देवमनुष्यतिर्यंग्यादःसु भूमेर्भरवारणाय ॥१७
तं त्वामहं भक्तजनानुरक्तं विरक्तमत्यंतमपींदिरादिषु । स्वयं समक्षं व्यभिचारदुष्टचित्तास्वपि प्रेमनिबद्धमानसम् ॥१८
यं वै प्रसन्ना असुराः सुरा नराः सकिन्नरास्तिर्यंग्योतयोऽपि हि ।
२६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गताः स्वरूपं निखिलं विहाय ते देहस्त्र्यपत्यार्थम- मत्वमीश्वर ॥१९॥ तं देवदेवं भजतामभीप्सितप्रदं निरीहं गुणवर्जितं च । अचिंत्यमव्यक्तमघौघनाशनं प्राप्तोऽरणं प्रेमनिधानमादरात् ॥२०॥ तर्पंति तापैर्विविधैः स्वदेहमन्ये तु यज्ञैर्विविधैर्यजंति । स्वप्नेऽपि ते रूपमलौकिकं विभो पश्यन्ति नैवार्थनिबद्धवासनाः ॥२१॥
परशुराम ने कहा—भक्तों की सुरक्षा करने के कारणों से शरीर धारण करने वाले—अपनी शरणागति में सम्प्राप्त जनों का प्रतिपालन करने वाले और सुरगणों की पीड़ा का हरण करने वाले आपके लिए मेरा बार-म्बार नमस्कार है । ब्रह्मा-शिव-विष्णु और इन्द्र जिनमें प्रमुख हैं ऐसे समस्त देवगणों के द्वारा जिनका स्तवन किया गया है ऐसे परमेश्वर प्रभु के लिए मैं नित्य ही प्रणाम निवेदन करने वाला हूँ ।१५। शिव आदि प्रमुख देव भी अनेक प्रकार के वेदों के वादों के द्वारा जिनके स्वरूप का निर्णय करने में समर्थ नहीं हुआ करते हैं उन निर्देशन करने के योग्य-अजन्मा-पुराण पुरुष तथा अनन्त प्रभु का मैं स्तवन करता हूँ । आप मेरे ऊपर दया में परायण हो जाइए ।१६। जो एक ही ईश हैं और नित्य ही अपने भक्तों के मनोवाञ्छितों को प्रदान करने वाले हैं वे आप इस भूमि के भार को उतारने के लिए लोकों में विहार और उनकी रक्षा करने के वास्ते अनेक प्रकार के देव-मनुष्य-तिर्यग् तथा जल जीवों में शरीर धारण करके अवतार ग्रहण किया करते हैं ।१७। ऐसे उन प्रभु आपको मैं स्वयं साक्षात् देख रहा हूँ जो अपने ही भक्तों में अनुराग रखने वाले हैं और इन्दिरा आदि में भी अत्यन्त विरक्त रहते हैं तथा व्यभिचार से दुष्ट चित्त वालियों में भी प्रेम से निबद्ध मन वाले हैं ।१८। हे ईश्वर ! जिन आपके स्वरूप की प्राप्ति परम प्रसन्न होते हुए सम्पूर्ण अपने देह-स्त्री-सन्तति और वैभव की ममता का त्यागकर असुर-सुर-नर-किन्नर-और तिर्यग् योनि वाले भी कर चुके हैं ।१९। उन्हीं देवों के भी देव-भजन करने वालों के लिये अभीप्सित प्रदान करने वाले-निरीह गुणों से रहित अर्थात् रजोगुणादि से रहित-न चिन्तन करने के योग्य-अव्यक्त और अघों के समुदायों के विनाश करने वाले-अरण तथा प्रेम के निधान
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६३
आपको मैंने आदर से इस समय साक्षात् प्राप्त कर लिया है। २०। अन्य जन तो नाना भाँति के तपश्चर्या जनित तापों से अपने देह को संतप्त किया करते हैं और विविध यज्ञों के द्वारा आपका यजन किया करते हैं। हे विभो ! इस प्रकार के परम क्लिष्ट विधानों के करते हुए भी वे सब किसी प्रयोजनों की सिद्धि के लिए निबद्ध वासना वाले आपके इस अलौकिक स्वरूप का दर्शन स्वप्न में भी नेत्रों से नहीं किया करते हैं । २१।
ये वै त्वदीयं चरणं भवश्रमान्निर्विण्णचित्ता
विधिवत्स्मरंति ।
नमन्ति भक्त्याऽथ समर्च्चयन्ति वै परस्परं संसदि
वर्णयंति ॥२२
तेनेकजन्मोद्भवपंकभेदमप्रसक्तचित्ता भवतोंऽघ्रिपद्मे ।
तरंति चान्यानपि तारयंति हि भवौषधं नाम
मुद्या तवेज ॥२३
अहं प्रभो कामनिबद्धचित्तो भवंतमार्यं विविधप्रयत्नैः ।
आराधये नाथ भवानभिज्ञः किं ते ह
विज्ञाप्यमिहास्ति लोके ॥२४
वसिष्ठ उवाच—
इत्येवं जामदग्न्यं तु स्तुवंतं प्रणतं पुरः ।
उवाचागाधया वाचा मोहयन्निव मायया ॥२५
कृष्ण उवाच—
हंत राम महाभाग सिद्धं ते कार्यमुत्तमम् ।
कवचस्य स्तवस्यापि प्रभावादवधारय ॥२६
हत्वा तं कार्त्तवीर्यं हि राजानं दृप्तमानसम् ।
साधयित्वा पितुर्वैरं कुरु निःक्षत्रियां महीम् ॥२७
मम चक्रावतारो हि कार्त्तवीर्यो धरातले ।
कृतकार्यो द्विजश्रेष्ठ तं समापय मानद ॥२८
२६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
जो-जो भी भक्तगण आपके चरणाम्बुजों का इस संसार के बारम्बार जन्म-मरण के घोर श्रम से वैराग्य वाले होकर विधि के साथ स्मरण किया करते हैं—भक्ति की परम पूत भावना से नमन करते हैं और आपके चरणों का भली भाँति अर्चन किया करते हैं तथा परस्पर में एक-दूसरे सभा में इनका वर्णन किया करते हैं ।२२। उस रीति से आपके चरण कमल में एक जन्म में समुत्पन्न पङ्क के भेदन करने में प्रसक्त चित्त वाले भक्तजन स्वयं तर जाते हैं और दूसरों को तार दिया करते हैं । हे ईश ! आपका परम पुनीत नाम निश्चित रूप से इस सांसारिक रोग के दूर करने के लिए अमृत स्वरूप महौषध है ।२३। हे प्रभो ! मैं तो कुछ कामना से निबद्ध चित्त वाला वाला हूँ । मैंने परम श्रेष्ठतम आपकी विधिपूर्वक प्रबल प्रयत्नों के साथ आराधना की थी । हे नाथ ! आप तो स्वयं ही इसके अभिज्ञ हैं अर्थात् आपको सभी कुछ ज्ञात है । आपके लिए इस लोक में क्या बात विज्ञापित करने के योग्य है ? अर्थात् कुछ भी नहीं है ।२४। वसिष्ठ जी ने कहा—इस प्रकार से स्तवन करते हुए अपने चरणों में आगे प्रणत होने वाले परशुराम से माया से मोहित करते हुए के समान ही अगाध वाणी से प्रभु ने कहा था ।२५। श्रीकृष्ण चन्द्र भगवान् ने कहा—बड़ी ही प्रसन्नता की बात है हे राम ! आप महान् भाग्य वाले हो । आपका उत्तम कार्य सिद्ध हो गया है । इसकी सिद्धि कवच और स्तव के ही प्रभाव से हुई है—इसको मन में समझ लीजिए ।२६। बहुत ही वर्ष से युक्त मन वाले राजा कार्त्तवीर्य का हनन करके अपने पिता के साथ किये हुए कुत्सित व्यवहार के बैर का बदला लेकर इस भूमि को क्षत्रियों से रहित कर डालिए ।२७। इस धरातल में यह कार्त्तवीर्य मेरे ही चक्र का अवतार है हे मानद द्विजश्रेष्ठ ! उसको समाप्त करके आप सफल हो जाइए ।२८।
अद्य प्रभृति लोकेऽस्मिन्नंशावे शेन मे भवान् । चरिष्यति यथाकालं कर्त्ता हर्त्ता स्वयं प्रभुः ॥२६
चतुर्विंशे युगे वत्स त्रेतायां रघुवंशजः । रामो नाम भविष्यामि चतुर्व्यूहः सनातनः ॥३०
कौसल्यानन्दजनको राज्ञो दशरथादहम् । तदा कौशिकयज्ञं तु साधयित्वा सलक्ष्मणः ॥३१
गमिष्यामि महाभाग जनकस्य पुरं महत् । तत्रेशचाप निर्भज्य परिणीय विदेहजाम् ॥३२
भार्गव-चरित्र (१) ] [ २६५
तदा यास्यन्नयोध्यां ते हरिष्ये तेज उन्मदम् । वसिष्ठ उवाच- कृष्ण एवं समादिश्य जामदग्न्यं तपोनिधिम् । पश्यतोंऽतर्दधे तत्र रामस्य सुमहात्मनः ॥३३
आज से ही आरम्भ करके आप इस लोक में मेरे ही अंश के वेश से चरण करेंगे और यथा समय आप स्वयं ही कर्त्ता और हर्त्ता प्रभु हो जायेंगे ।२६। हे वत्स ! आगे चौबीसवें युग में जब त्रेतायुग होगा तब मैं राजा रघु के वंश में चतुर्व्यूह सनातन राम नाम वाला होऊँगा अर्थात् मेरा रामावतार होगा ।३०। मैं राजा दशरथ के वीर्य से उसकी रानी कौशल्या के गर्भ से जन्म ग्रहण कर उसके आनन्द को उत्पन्न करने वाला आत्मज होऊँगा । उस समय मैं लक्ष्मण के साथ कौशिक विश्वामित्र महर्षि के यज्ञ को पूर्ण कराकर जिसमें दानव बाधा डाल रहे थे मैं फिर हे महाभाग ! राजा जनक के महान् नगर को जाऊँगा । वहाँ पर धनुषशाला में समस्त वीर नृपों के मध्य में शिव के धनुष का भञ्जन करके विदेह की पुत्री जानकी के साथ विवाह करूँगा ।३१-३२। उस समय मैं अपनी राजधानी अयोध्यापुरी के लिये गमन करते हुए आपके उन्मदतेज का हनन कर दूँगा । वसिष्ठ जी ने कहा—इस रीति से भगवान् श्रीकृष्ण ने जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपना आदेश भली-भाँति देकर जो कि राम तप की निधि थे। वहीं पर महात्मा राम के देखते-देखते हुए ही भगवान् कृष्ण अन्तर्हित हो गये थे ।३३।
भार्गव-चरित्र (२)
वसिष्ठ उवाच- अंतर्द्धानं गते कृष्णे रामस्तु सुमहायशाः । समुद्रिक्तमथात्मानं मेने कृष्णानुभावतः ॥१ अकृतव्रणसंयुक्तः प्रदीप्ताग्निरिव ज्वलन् । समायातो भार्गवोऽसौ पुरीं माहिष्मतीं प्रति ॥२ यत्र पापहरा पुण्या नर्मदा सरितां वरा । पुनाति दर्शनादेव प्राणिनः पापिनो ह्यपि ॥३
२६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पुरा यत्रहरेणापि निविष्टेन महात्मना ।
त्रिपुरस्य विनाशाय कृतो यत्नो महीपते ॥४
तत्र किं वर्ण्यंते पुण्यं नृणां देवस्वरूपिणाम् ।
स दृष्ट्वा नर्मदां भूप भार्गवः कुलनन्दनः ॥५
नमश्चकार सुप्रीतः शत्रुसाधनतत्परः ।
नमोऽस्तु नर्मदे तुभ्यं हरदेहसमुद्भवे ॥६
क्षिप्रं नाशय शत्रून्मे वरदा भव शोभने ।
इत्येवं स नमस्कृत्य नर्मदां पापनाशिनीम् ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—भगवान् श्री कृष्ण के अन्तर्धान हो जाने पर सुमहान् यश वाले परशुराम ने इसके उपरान्त अपने आपको श्रीकृष्ण चन्द्र के अनुभाव समुद्रिक्त मान लिया था अर्थात् अपने आपको उच्चस्तरीय व्यक्ति मान लिया था ।१। अकृतव्रण से समन्वित होकर जलती हुई अग्नि के ही समान जलता हुआ यह भार्गव राम माहिष्मती नगरी की ओर आ गया था ।२। यह पुरी वहाँ पर थी जहाँ पर समस्त सरिताओं में परम श्रेष्ठ-पुण्य प्रदा और पापों का हरण करने वाली नर्मदा नाम वाली नदी बहती है । यह नदी बहती है । यह नदी केवल दर्शन मात्र ही से महापापी प्राणियों को पुनीत बना दिया करती है ।३। हे महीपते ! प्राचीन काल में त्रिपुर के हनन करने वाले भगवान् शम्भु ने भी जो कि महान् आत्मा वाले हैं यहीं पर निविष्ट होते हुए त्रिपुरासुर के विनाश के लिये यत्न किया था ।४। वहाँ पर जो भी मनुष्य हैं वे महापुण्य शाली देवों के समान स्वरूप वाले हैं । उनके महान् पुण्य का क्या वर्णन किया जावे अर्थात् उनका पुण्य तो अवर्णनीय है । उस भार्गव परशुराम ने जो अपने कुल को अभिनन्दित करने वाले थे, हे भूप ! उस पुण्यमयी परम पावनी नदी का दर्शन किया था ।५। फिर राम ने जो अपने महाशत्रु कार्त्तवीर्य के साधन करने में परायण थे परम-प्रीतिमान् होकर नर्मदा को प्रणाम किया था और सविनय प्रार्थना की थी कि हे नर्मदे ! आप तो साक्षात् भगवान् शङ्कर के देह से शरीर धारण करने वाली हैं । आपकी सेवा में मेरा प्रणिपात स्वीकार होवे ।६। हे शोभने ! मेरा यही विनम्र निवेदन है कि आप मेरे शत्रुओं का बहुत ही शीघ्र विनाश करने की मेरे ऊपर अनुकम्पा कीजिए और मेरे लिए वर-