भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ही क्या है यह तो अणिमा-महिमा आदि जो आठ सिद्धियां हैं उनको भी देने वाला है। बड़े-बड़े महान् जो करोड़ों प्रकार के पातक हैं उनका भी विनाश कर देने वाला और समस्त तीर्थों के स्नान-ध्यान तथा अटन का जो पुण्यफल हुआ करता है उनके प्रदान कर देने वाला होता है।१७। सभी तरह के अश्वमेधादि यज्ञों एवं जपों का जो भी फल होता है उसके देने वाला है और सभी पापों के नाश करने वाला है। हे देवि ! अब आप उस नामों के शतक को सुनिए, मैं आपको बतलाता हूँ जो एक सौ आठ भगवान् के नामों वाला है ।१८। परम पुण्यमय अन्य सहस्र नामों की तीन बार आवृत्ति के करने से जो फल प्राप्त होता है वह पुण्य-फल भगवान् श्रीकृष्ण के नाम की एक ही आवृत्ति के द्वारा एक ही नाम दिया करता है ।१९। इस कारण से यह स्तोत्र विशेष पुण्य वाला है और पातकों का विनाशक है। हे प्रिये ! इस परम शुभ नामों के अष्टोत्तर शत का मैं ही ऋषि हूँ ।२०। इसका छन्द अनुष्टुप् है और इसका देवता श्री कृष्ण के प्रिय का आवहन करने वाला योग है। अब यहाँ से आगे वह अष्टोत्तर शतक का आरम्भ होता है—श्रीकृष्ण-कमला (महालक्ष्मी) के नाथ-वसुदेव के पुत्र वासुदेव-और सनातन अर्थात् सदा सर्वदा से चले आने वाले हैं ।२१।

वसुदेवात्मजः पुण्यो लीलामानुषविग्रहः ।
श्रीवत्सकौस्तुभधरो यशोदावत्सलो हरिः ॥२२
चतुर्भुं जात्तचक्रासिगदाशं खायुधायुधः ।
देवकीनन्दनः श्रीशो नन्दगोपप्रियात्मजः ॥२३
यमुनावेगसंहारी बलभद्रप्रियानुजः ।
पूतनाजीवितहरः शकटासुरभंजनः ॥२४
नन्दव्रजनानन्दी सच्चिदानंदविग्रहः ।
नवनीतविलिप्तांगो नवनीतनटोऽनघः ॥२५
नवनीतलवाहारी मुचुकुं दप्रसादकृत् ।
षोडशस्त्रीसहस्रेशस्त्रिभंगी मधुराकृतिः ॥२६
शुकवागमृताब्धींदुर्गोविदो गोविदांपतिः ।
वत्सपालनसंचारी धेनुकासुरमर्दनः ॥२७