भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७६

विहारों से अलंकृत कर दिया था।१३। अपनी लीला से ही विग्रह (मानवीय शरीर) धारण करने वाले उन श्री कृष्ण देव के जय की अनेक उपाधियों से नियुक्त अनेक शुभ नाम है ।१४।

तेषु नामानि मुख्यानि श्रोतुकामा चिरादहम् ।
तत्तानि ब्रूहि नामानि वासुदेवस्य वासुके ।।१५
नातः परतरं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
शेष उवाच-
वसुंधरे वरारोहे जनानामस्ति मुक्तिदम् ।।१६
सर्वमंगलमूर्द्धन्यमणिमाद्यष्टसिद्धिदम् ।
महापातककोटिघ्नं सर्वतीर्थफलप्रदम् ।।१७
समस्तजपयज्ञानां फलदं पापनाशनम् ।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।।१८
सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्या तु यत्फलम् ।
एकावृत्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति ।।१९
तस्मात्पुण्यतरं चैतत्स्तोत्रं पातकनाशनम् ।
नाम्नामष्टोत्तरशतस्याहमेव ऋषिः प्रिये ।।२०
छन्दोऽनुष्टुब्देवता तु योगः कृष्णप्रियावहः ।
श्रीकृष्णः कमलानाथो वासुदेवः सनातनः ।।२१

उन श्रीकृष्ण के नामों में जो बहुत ही प्रमुख उनके नाम हैं उनके श्रवण करने की कामना वाली मैं बहुत अधिक समय से हो रही हूँ। हे भगवन्वासुके ! भगवान् वासुदेव के उन परम शुभ नामों को अब कृपा करके मेरे आगे बतलाइए ।१५। क्योंकि इस संसार में इससे परतर अर्थात् बड़ा अन्य कोई भी पुण्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण के परम शुभ नामों का स्मरण और श्रवण लोक में सबसे अधिक पुण्य कार्य है। भगवान् शेष ने कहा- हे परम श्रेष्ठ आरोह वाली वसुन्धरे ! भगवान् श्री कृष्ण के एक सौ आठ नामों का एक शतक स्तोत्र है और वह मानवों के लिए मुक्ति के प्रदान करने वाला है ।१६। यह शतक सभी प्रकार के मङ्गल कार्यों में शिरोमणि है तथा लौकिक साधारण वैभवों की प्राप्ति की तो बात

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