भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 274

अगस्त्य द्वारा श्रीकृष्ण प्रेमामृत स्तोत्र का कथन ] [ २७८

स्तोत्रं तत्ते प्रवक्ष्यामि यस्यार्थं त्वमिहागतः । वाराहाद्यवताराणां चरितं पापनाशनम् ॥११ सुखदं मोक्षदं चैव ज्ञानविज्ञानकारणम् । श्रुत्वा सर्वं धरा वत्स प्रहृष्टा तं धराधरम् ॥१२ उवाच प्रणता भूयो ज्ञातुं कृष्णविचेष्टितम् ।

धरण्युवाच- अलंकृतं जन्म पुंसामपि नंदव्रजौकसाम् ॥१३ तस्य देवस्य कृष्णस्य लीलावियहधारिणः । जयोपाधिनियुक्तानि संति नामान्यनेकशः ॥१४

मैं वहाँ पर बड़े ही आनन्द से भगवान् विष्णु देव की कथाओं का श्रवण करता हुआ बैठ गया था। हे महाभाग ! यह भूमि भी जो समस्त भूतों की धात्री स्वरूप वाली है वहीं पर उन शेष भगवान् के आगे बैठी हुई थी और बहुत ही प्रीति के साथ सदा कथाओं का श्रवण किया करती थी। वह भूमि साक्षात् इस मही के धारण करने वाले शेष भगवान् से जो-जो भी पूछा करती है उसको समस्त ऋषिगण वहीं पर संस्थित होकर उनके ही अनुग्रह के होने से श्रवण किया करते हैं। हे वत्स ! मैंने भी वहां परम शुभ कृष्ण प्रेमामृत का श्रवण किया था ।८-१०। उस स्तोत्र को मैं अब आपको बतलाऊंगा जिसको प्राप्त करने के लिये तुम यहाँ पर आये हो। इस स्तोत्र में वाराह आदि भगवान् के अवतारों का चरित है जो समस्त प्रकार के पापों का विनाश कर देने वाला होता है ।११। यह चरित परमाधिक सुख-सौभाग्य के प्रदान करने वाला है—परलोक में जाकर इस भौतिक शरीर के त्याग करने के पश्चात् मोक्ष का भी देने वाला है जिससे इस संसार में बारम्बार जन्म-मरण के महान् कष्टों से छुटकारा मिल जाया करता है। और यह चरित ऐसा अद्भुत है कि जो पूर्ण ज्ञान और विशेष ज्ञान का भी कारण होता है। इस वसुन्धरा देवी ने इन सब का श्रवण किया था और यह बहुत ही अधिक प्रसन्न हुई थी, हे वत्स ! फिर धराके धारण करने वाले अनन्त भगवान् से बोली थी ।१२। परम प्रणत होकर इस भूमि ने फिर भगवान् कृष्ण की लीला को जानने के लिए प्रार्थना की थी। धरणी ने कहा—भगवान् श्री कृष्ण चन्द्र जी ने नन्द गोपराज के ब्रज में निवास करने वाले ब्रजवासी मनुष्यों का भी जन्म अपना अवतार धारण कर अनेक अद्भुत लीला-

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