संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 269, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम का अगस्त्याश्रम में आगमन ] [ २७३
ने स्नान किया था और परम हर्ष से संयुक्त होकर वहाँ पर मध्याह्न काल में होने वाली सन्ध्या की उपासना की थी ।३६। उस समय में वह यही विचार कर रहा था उस मृग ने मेरा अपना हित कहा था । तब तक वह यह देखता है कि पीछे लगा उस मृग और मृगी का जोड़ा वहाँ पर उपागत हो गया था ।४०। उस मृग और मृगी के जोड़े ने पुष्कर में जल का पान किया था और उसके जल से अपने शरीरों का अभिषिञ्चन किया था । भार्गव परशुराम यह देख ही रहे थे कि उनके देखते-देखते वह मृग-मृगी का जोड़ा अगस्त्य मुनि आश्रम के सम्मुख चला गया था ।४१। राम ने भी अपनी सन्ध्योपासना को पूर्ण करके नैत्यिक कर्म से निवृत्ति की थी और वह भी अगस्त्य मुनि के आश्रम को चला गया था । यह परमोदार मन वाला विपद्गत पुष्कर का दर्शन करते ही चला जा रहा था ।४२।
विष्णोः पदानि नागानां कुण्डं सप्तर्षिसंस्थितम् । गत्वोपस्पृश्य शुच्यंभो जगामागस्त्यसंश्रयम् ।।३३
यच्च ब्रह्मसुता राजन्समामाता सरस्वती । त्रीन्संपूरयितुं कुण्डानग्निहोत्रस्य वै विधेः ।।४३
तत्र तीरे शुभं पुण्यं नानामुनिनिषेवितम् । ददर्श महदाश्चर्यं भार्गवः कुम्भजाश्रमम् ।।४५
मृगैः सिंहैः सहगतैः सेवितं शांतमानसैः । कुटरैरर्जुनैः पारिभद्रधवेगुदैः ।।४६
खदिरासनखर्जूरैः संकुलं बदरीद्रुमैः । तत्र प्रविश्य वै रामो ह्यकृतव्रणसंयुतः ।।४७
ददर्श मुनिमासीनं कुम्भजं शांतमानसम् । स्तिमितोदरसरः प्रख्यं ध्यायन्तं ब्रह्म शाश्वतम् ।।४८
कौश्यां वृष्यां मार्गकृतिं वसानं पल्लवोटजे । ननाम च महाराज स्वाभिधानं समुच्चरन् ।।४९
भगवान् विष्णु के पदों को-नागों के कुण्ड को जहाँ पर सप्तर्षिगण संस्थित थे जाकर, उस परम शुचि जल का उपस्पर्शन करके फिर वह अगस्त्य मुनि के संश्रय स्थल को चला गया था ।४३। हे राजन् ! वहाँ पर