संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२६ ] [ कालिका पुराण
नानाप्रहरणैश्चान्यैराजघान द्विजात्मजम् । स रामो लाघवेनैव संप्रक्षिप्तान्यनेन च ॥५४ शूलादीनि चकत्ताशु मध्य एव निजाशुगैः । स राजा वायुं पस्पृश्य ससर्जाग्नेयमुत्तमम् ॥५५ अस्त्रं रामो वारुणेन शमयामास सत्वरम् । गांधवं विदधे राजा वायव्येनाहनद्विभुम् ॥५६
आज आपको यह परम दुष्कृत का ही फल प्राप्त हुआ है। अब यहाँ पर जो भी पाप किया है उसका फल भोगिए क्योंकि यह दुष्कृत आपने ही जो अर्जित किया है फिर इसका फल भी आप ही को भोगना है। आपने मेरे गुरु जमदग्नि का अपमान करके बड़ा भारी अपकार किया है। यही कारण है कि आपके कानों का कृन्तन हुआ है ।५०। तुम्हारे यश का अप-हरण करके मैंने ओज से तुम्हारी चूड़ामणि का अपहरण किया है यह तुम देख लो। इतना कहकर उन महात्मा भृगु ने बाण चढ़ाकर धनुष की प्रत्यञ्चा को खींच लिया था ।५१। उन्होंने उस राजा के ऊपर उस बाण का प्रक्षेप किया था और बड़े ही लाघव से उस मणि का छेदन किया था जिससे कि वह मणि परशुराम के समीप में उपागत हो गयी थी। उस मुनि-कुमार के इस कर्म का अभिवीक्षण करके वह हैहय के वंश के धारण करने वाले सहस्रार्जुन युद्ध को तैयार हो गया था ।५२। वह कार्त्तवीर्य राजा आयुध ग्रहण करके युद्ध में उस द्विज सुत को जिसको वह अपना शत्रु सम-झता था मारने के लिये समुद्यत हो गया था। शूल-शक्ति-गदा-चक्र-खङ्ग-पट्टिट और तोमर तथा अन्यन्य नाना प्रकार के प्रहरणों से उस कार्त्तवीर्य द्विजवर के पुत्र परशुराम पर प्रकार किये थे किन्तु परशुराम ने उनके द्वारा जो भी अस्त्रों का प्रक्षेप किया गया था वे सब बहुत ही लाघव से उन सबको काट दिया था और जब तक वे अस्त्र लक्ष्य तक पहुँचने भी नहीं पाये थे तभी तक बीच में ही अपने बाणों के द्वारा उन सबको राम ने काटकर शीघ्र ही गिरा दिया था। उस राजा ने भी जल का उपस्पर्शन करके फिर अपने उत्तम आग्नेय अस्त्र को छोड़ दिया था ।५३-५५। रामने अपने वारुण अस्त्र के द्वारा शीघ्र ही उस आग्नेय अस्त्र का शमन कर दिया था। फिर राजा ने गान्धर्व अस्त्र को छोड़ा था और वायव्य अस्त्र से विभु परशुराम के ऊपर प्रहार किया था ।५६।