संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरशुराम द्वारा कार्तवीर्य वध ] [ ३२७
नागास्त्रं गारुडेनापि रामश्चिच्छेद भूपते ।
दत्तेन दत्तं यच्छूलमव्यर्थं मंत्रपूर्वकम् ॥५७
जग्राह समरे राजा भार्गवस्य वधाय च ।
तच्छूलं शतसूर्याभमनिवार्यं सुरासुरैः ॥५८
चिक्षेप राममुद्दिश्य समग्रेण बलेन सः ।
मूर्ध्नि तद्भार्गवेंद्रस्याथ निपपात महीपते ॥५९
तेन शूलप्रहारेण व्यथितो भार्गवस्तदा ।
मूर्च्छांमवाप राजेंद्र पपात च हरिं स्मरन् ॥६०
पतिते भार्गवे तत्र सर्वे देवा भयाकुलाः ।
समाजग्मुः पुरस्कृत्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् ॥६१
शंकरस्तु महाज्ञानी साक्षान्मृत्युंजयः प्रभुः ।
भार्गवं जीवयामास संजीवन्या स विद्यया ॥६२
रामस्तु चेतनां प्राप्य ददर्श पुरतः सुरान् ।
प्रणनाम च राजेंद्र भक्त्या ब्रह्मादिकांस्तु तान् ॥६३
हे भूपते ! अपने गरुड़ अस्त्र के द्वारा उस नागास्त्र का छेदन कर दिया था । दत्तात्रेय महामुनि ने जो एक शूल इस कार्तवीर्य को प्रदान किया था वह अव्यर्थ था अर्थात् उस का प्रयोग कभी भी व्यर्थ एवं असफल नहीं हुआ करता था । इस का प्रयोग मन्त्रोच्चारण के ही साथ हुआ करता था ।५७। इस शूल का ग्रहण राजा कार्तवीर्य ने परशुराम जी के वध करने के लिए किया था । वह शूल बड़ा ही तेज से युक्त था-सैकड़ों सूर्यों की आभा के ही समान उसकी आभा थी और यह ऐसा था कि जिसका प्रयोग किसी प्रकार से भी निवारित नहीं किया जा सकता था और सुर तथा असुर कोई भी उसको विफल नहीं कर सकते थे ।५८। उस कार्तवीर्य ने अपने सम्पूर्ण बल के द्वारा परशुराम का उद्देश्य करके इसको फेंका था। हे महीपते ! वह शूल भार्गवेन्द्र के मस्तक पर गिरा था ।५६। उस शूल के प्रहार से उस समय में परशुराम बहुत व्यथित हो गये थे और हे राजेन्द्र ! उनको इसके प्रबल प्रहार से मूर्च्छा हो गयी थी । वे श्री हरि का स्मरण करते हुए भूमि पर गिर गये थे ।६०। वहाँ पर जिस समय में भृगु वंशोद्भूत परशु-राम भूमि पर गिर गये थे उस समय में समस्त देवगण महान् भय से