भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 324

३२८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समाकुल हो गये थे और वे सब ब्रह्मा-विष्णु और महेश्वर को अपने आगे करके वहाँ पर समागत हो गये थे ।६१। भगवान् शङ्कर तो महाज्ञानी थे और मृत्यु के ऊपर भी विजय प्राप्त करने वाले साक्षात् प्रभु थे । उन्होंने तुरन्त ही अपनी संजीवनी विद्या से भार्गव को जीवन प्रदान करके जीवित कर दिया था ।६२। परशुराम जी को जब चेतना प्राप्त हो गयी थी तो सम्हलकर खड़े हुए थे और उन्होंने अपने आगे सभी सुरगणों को देखा था । हे राजेन्द्र ! उन्होंने ब्रह्मा आदिक उन महान् देवों के चरणों में बड़े ही भक्ति के भाव से प्रणाम किया था ।६३।

ते स्तुता भार्गवेन्द्रेण सद्योऽदर्शनमागताः ।
स रामो वार्युपस्पृश्य जजाप कवचं तु तत् ॥६४
उत्थितश्च सुसंरब्धो निर्दहन्निव चक्षुषा ।
स्मृत्वा पाशुपतं चास्त्रं शिवदत्तं स भार्गवः ॥६५
सद्यः संहृतवांस्तत्तु कार्त्तवीर्यं महाबलम् ।
स राजा दत्तभक्तस्तु विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम् ।
प्रविष्टो भस्मसाज्जातं शरीरं बाहुनन्दन ॥६६

भार्गवेन्द्र के द्वारा उनकी स्तुति की गयी थी और फिर वे सभी सुर-गण तुरन्त ही अन्तर्हित हो गये थे । उन परशुराम प्रभु ने जल का आचमन करके उस समय में उस कवच का जप किया था ।६४। और भली भाँति संरब्ध होकर वे उठ खड़े हुए थे । उस समय में उनके नेत्रों में ऐसा अद्भुत तेज हो गया था जिससे ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे चक्षु से सब को दग्ध ही कर रहे होंवे । उन भार्गव ने भगवान् शिव के द्वारा कृपा करके प्रदान किये पाशुपत अस्त्र का स्मरण किया था ।६५। उस पाशुपत अस्त्र ने महान् बलवान् उस कार्त्तवीर्य को तुरन्त ही संहृत कर दिया था अर्थात् मार गिराया था । वह राजा दत्तात्रेय महामुनि का परम भक्त था और भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र में प्रविष्ट हो गया था और सहस्रों बाहुओं के द्वारा आनन्द करने वाले उसका शरीर भस्मसात् हो गया था ।६६।


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