संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव चरित्र वर्णन (१) ] [ ३२६
भार्गव चरित्र वर्णन (१)
वसिष्ठ उवाच—
दृष्ट्वा पितुर्वधं घोरं तत्पुत्रास्ते शतं त्वरा ।
वारयामासुरत्युग्रं भार्गवं स्वबलैः पृथक् ॥१
एकैकाक्षौहिणीयुक्ताः सर्वे ते युद्धदुर्मदाः ।
संग्रामं तुमुलं चक्रुः संरब्धास्तु पितुर्वधात् ॥२
रामस्तु दृष्ट्वा तत्पुत्राञ्छूरान्रणविशारदान् ।
परश्वधं समादाय युयुधे तैश्च संगरे ॥३
तां सेनां भगवान्रामः शताक्षौहिणिसंमिताम् ।
निजघान त्वरायुक्तो मुहूर्तद्वयमात्रतः ॥४
निःशेषितं स्वसैन्यं तु कुठारेणैव लीलया ।
दृष्ट्वा रामेण ते सर्वे युयुधुर्वीर्यसंमताः ॥५
नानाविधानि दिव्यानि प्रहरंतो महौजसः ।
परितो मंडलं चक्रुर्भागर्वस्य महात्मनः ॥६
अथ रामोऽपि बलवांस्तेषां मंडलमध्यगः ।
विरेजे भगवान्साक्षाद्यथा नाभिस्तु चक्रगा ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—उसके पुत्रों ने जब यह महान् घोर अपने पिता का वध देखा था तो उन सौ पुत्रों ने पृथक्-पृथक् अपने सैन्य बलों लेकर अतीव उग्र भार्गव का वारण किया था ।१। वे सभी युद्ध करने में अत्यन्त दुर्मद थे और सबके साथ एक-एक अक्षौहिणी सेना थी । अपने पिता के वध हो जाने से वे अत्यन्त ही क्रोध में भरे हुए थे और उन्होंने तुमुल संग्राम किया था ।२। परशुराम जी ने देखा था कि उसके सभी पुत्र बड़े शूरवीर हैं और रण करने में बहुत कुशल हैं तब उन्होंने अपना फर्शा उठा लिया था और उन सबके साथ युद्ध क्षेत्र में घोर युद्ध किया था ।३। भगवान् राम ने सौ अक्षौहिणियों से संयुत उस समग्र सेना को बड़ी ही त्वरा से युक्त होकर दो ही मुहूर्त्त के समय में विहनन करके मार गिराया था ।४। महान् वीर्य से संमत उन्होंने जब यह देखा था कि परशुराम ने अपने कुठार के