संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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द्वारा खेल ही खेल में लीला से ही बिना कुछ अधिक आयास किये सम्पूर्ण अपनी सेना को मारकर समाप्त कर दिया है तो सबने बड़ा भारी घोर युद्ध किया था ।५। महान् आत्मा वाले भार्गव के चारों ओर विविध प्रकार के दिव्य अस्त्रों के द्वारा प्रहार करते हुए उन महान् ओज वालों ने सबने एक मण्डल सा बना लिया था अर्थात् सब ओर से घेर कर बीच में दे लिया था ।६। इसके अनन्तर महान् बलशाली परशुराम भी उन सबके मण्डल (घेरा) में मध्य में स्थित होकर वह साक्षात् भगवान् परम सुशोभित हुए थे जिस तरह से समस्त नाड़ियों के चक्र के मध्य में स्थित नाभि शोभा दिया करती है ।७।
नृत्यन्निवाजौ विरराज रामः शतं पुनस्ते परितो भ्रमंतः ।
रेजुश्च गोपीगणमध्यसंस्थः कृष्णो यथा ताः
परितो भ्रमंत्यः ॥८
तदा तु सर्वे द्रुहिणप्रधानाः समागताः स्वस्वविमानसंस्थाः ।
समाकिरन्नन्दनमाल्यवर्षैः समंततो राममहीनवीर्यम् ॥६
यः शस्त्रपादादुदतिष्ठत ध्वनिहुंकारगर्भो
दिवमस्पृशत्स वै ।
तीर्यंत्रिकस्येव शरक्षतानि भांतीव यद्वन्नखदंतपाताः ॥१०
क्रंदंति शस्त्रैः क्षतविक्षतांगा गायंति यद्वत्किल गीतविज्ञाः ।
एवं प्रवृत्तं नृपयुद्धमण्डलं पश्यंति देवा
भृशविस्मिताक्षाः ॥११
ततस्तु रामोऽवनिपालपुत्राञ्जिघांसुराजौ विविधास्त्रपूगैः ।
पृथक्चकारातिबलांस्तु मंडलाद्विच्छिद्य पंक्तिं
प्रभुरातचापः ॥१२
एकैकशस्तान्निजघान वीराञ्छतं तदा पंच
ततः पलायिताः ।
शूरो वृषास्यो वृषशूरसेनौ जयध्वजश्चापि
विभिन्नधैर्याः ॥१३