संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 327, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३१
महाभयेनाथ परीतचित्ता हिमाद्रिपादांतरकाननं च । पृथग्गतास्ते सुपरीप्सवो नृपा न कोऽपि कांस्विददृशे भृशार्त्तः ॥१४
उस संग्राम भूमि में परशुराम नृत्य करते हुए जैसे परमाधिक शोभा को प्राप्त हुए थे और एक सौ वे कार्त्तवीर्य के पुत्र फिरते हुए चारों ओर शोभित हो रहे थे। उस समय में उन सब की शोभा ऐसी ही रही थी जैसी नित्य विहार स्थल वृन्दावन की निकुञ्जों में व्रजाङ्गना गोपियों के समुदाय के मध्य में महारास के समय में भगवान् श्री कृष्ण विराजमान थे और उनके चारों ओर गोपाङ्गनाएँ परिभ्रमण कर रही थीं उनकी शोभा हो रही ।८। उस समय सब जिनमें द्रुहिण प्रमुख थे अपने-अपने विमानों पर समवस्थित होकर वहाँ पर समागत हो गये थे और उन अहीनवीर्य वाले परशुराम के ऊपर सब ओर से नन्दन वन के कमनीय कुसुमों की वर्षा कर रहे थे ।६। इस प्रकार जो शस्त्रों का पात उनके ऊपर हो रहा था तब वे परशुराम उस शरों की वृष्टि में उठकर खड़े हो गये थे और उनकी ध्वनि हुङ्कार करने वाली थी तब ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे स्वर्ग का ही स्पर्श कर रहे होवें। उनके शरों के क्षत ऐसे मालूम हो रहे थे जैसे नृत्यगीत करने वाले के दन्तों और नखों के पातों के ही चिन्ह दिखाई दे रहे हों ।१०। वे शस्त्रों से क्षत विक्षत अङ्गों वाले क्रन्दन कर रहे थे मानों कोई गीतों के गान में विज्ञ पुरुष गान कर रहे होंवे। इसी रीति से उन नृपों के साथ युद्ध का मण्डल प्रवृत्त हुआ था जिसको देवगण अत्यन्त विस्मित नेत्रों वाले होकर देख रहे थे ।११। इसके अनन्तर प्रभु राम ने धनुष ग्रहण करके विविध अस्त्रों के समुदाय से उन राजा के पुत्रों का रण में हनन करने की इच्छा वाला होकर यद्यपि वे अतीव बलवान् थे तो भी उनको उस मण्डल से विच्छिन्न करके पंक्ति से पृथक् कर दिया था ।१२। वे सौ वीर थे उनमें से एक-एक को पकड़कर उन्होंने मार डाला था। उस समय में केवल उनमें से पाँच ही बच गये थे जो वहाँ से भाग गये थे। उन पाँचों का धैर्य टूट गया था। उनके नाम शूर-वृषास्य-वृष-शूरसेन और जयध्वज ये थे ।१३। वे पाँचों नृप पृथक् होकर ही चले गये थे और वे सब नृप अपने प्राणों के बचाने की इच्छा वाले थे। उन में से अत्यन्त आर्त्त होकर किसी ने भी किन को भी वहाँ नहीं देखा था। तात्पर्य यह है कि सबको अपनी रक्षा की पड़ी थी और कोई भी किसी को न देख पाया था ।१४।