संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रामोऽपि हत्वा नृपचक्रमाजी राज्ञ. सहाय्यार्थमुपागतं च ।
समन्वितोऽसावकृतव्रणेन सस्नौ मुदाऽऽगत्य च
नर्मदायाम् ॥१५
स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा संपूज्य वृषभध्वजम् ।
प्रतस्थे द्रष्टुमूर्वीशं शिवं कैलासवासिनम् ॥१६
गुरुपत्नीमुमां चापि सुतौ स्कन्दविनायकौ ।
मनोयायी महात्माऽसावकृतव्रणसंयुतः ॥१७
कृतकार्यो मुदा युक्तः कैलासं प्राप्य तत्क्षणम् ।
ददर्श तत्र नगरीं महतीमलकाभिधाम् ॥१८
नानामणिगणाकीर्णभवनैरुपशोभिताम् ।
नानारूपधरैर्यक्षैः शोभितां चित्रभूषणैः ॥१९
नानावृक्षसमाकीर्णैर्वनैश्चोपवनैर्युताम् ।
दीर्घिकाभिः सुदीर्घाभिस्तडागैश्चोपशोभिताम् ॥२०
सर्वतोऽप्यावृतां बाह्ये सीतयालकनंदया ।
तत्र देवांगनास्नानमुक्तकुंकुमपिंजरम् ॥२१
भगवान् परशुराम ने भी उस रण में उस सम्पूर्ण नृपों के चक्र का हनन कर दिया था तथा जो राजा की सहायता करने के लिये वहाँ उपागत हुआ था उसका भी हनन कर डाला था। फिर यह अकृतव्रण के साथ रहकर नर्मदा नदी के समीप में समागत हुए थे और उस नदी में इन्होंने स्नान किया था ।१५। वहाँ पर स्नान करके अपना दैनिक कृत्य समाप्त किया था तथा फिर भगवान् वृषभध्वज का भली भांति अर्चन किया था। इसके उपरान्त कैलाश के निवासी प्रभु शिव का दर्शन प्राप्त करने के लिये वहाँ से परशुराम जी ने प्रस्थान किया था ।१६। अपने मन के ही समान शीघ्र गमन करने वाले परशुराम जी अपने पालित अकृतव्रण शिष्य के साथ गुरु पत्नी जगदम्बा उमा देवी–और उनके दोनों पुत्र स्कन्द और विनायक के दर्शनार्थ वह महात्मा वहाँ पर गये थे ।१७। अपने सम्पूर्ण कार्यों में सफल होकर समस्त क्षत्रिय शत्रुओं को निहत करके बड़ी ही प्रसन्नता से युक्त होते हुए उसी क्षण में कैलास गिरि पर पहुँच गये थे और भगवान् शङ्कर की अलका