संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३३३
नाम वाली नगरी को देखा था जो नगरी बहुत ही विशाल थी ।१८। उस नगरी की छटा का वर्णन किया जाता है—उस नगरी में अनेक भवन ऐसे बने हुए थे जो नाना भाँति के रत्नों से संयुत थे, उन भवनों की शोभा से वह परम सुशोभित थी। उसमें बहुत से यक्ष विद्यमान थे जो विचित्र प्रकार के भूषणों के धारण करने वाले तथा विविध स्वरूपों वाले थे । इनसे भी उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ।१९। उस नगरी में बहुत तरह के वन और उपवन थे जिनमें अनेक प्रकार के वृक्ष थे। वह नगरी अनेक विशाल वापियों (बावड़ियों) से तथा तालाबों से भी परम सुशोभित थी ।२०। उस पुरी का बाहिरी सब ओर से सीता और अलकनन्दा नाम वाली सुन्दर सरिताओं से समावृत था । वहाँ पर देवों की अङ्गनाएँ स्नान कर रही थीं जिससे उनके अङ्गों में लगा हुआ कुंकुम छूटकर उनके जल में प्रवाहित हो रहा था ।२१।
तृषाविरहिताश्चांभः पिबन्ति करिणो मुदा । यत्र संगीतसंनादा श्रूयन्ते तत्र तत्र ह ।।२२ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सततं सहकारिभिः । तां दृष्ट्वा भार्गवो राजन्मुदा परमया युतः ।।२३ ययौ तदूर्ध्वं शिखरं यत्र शैवपरं गृहम् । ततो ददर्श राजेंद्र स्निग्धच्छायं महावटम् ।।२४ तस्याधस्ताद्धरावासं सुसेव्यं सिद्धसंयुतम् । ददर्श तत्र प्राकारं शतयोजनमंडलम् ।।२५ नानारत्नाचितं रम्यं चतुर्द्वारं गणावृतम् । नन्दीश्वरं महाकालं रक्ताक्षं विकटोदरम् ।।२६ पिंगलाक्षं विशालाक्षं विरूपाक्षं घटोदरम् । मंदारं भैरवं बाण रुरुं भैरवमेव च ।।२७ वीरकं वीरभद्रं च चंडं भृङ्गि रिटि मुखम् । सिद्धेंद्रनाथरुद्रांश्च विद्याधरमहोरगान् ।।२८
उन सरिताओं में तृषा से विरहित करी बड़े ही आनन्द से उनका जल पी रहे थे । वहाँ पर जहाँ-तहाँ संगीत की परम मधुर ध्वनियाँ सुनाई दे रही थी ।२२। वहाँ पर बहुत से गन्धर्व गण अप्सराओं को अपने साथ में