भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

भार्गव चरित्र वर्णन (१) ] [ ३२६

भार्गव चरित्र वर्णन (१)

वसिष्ठ उवाच— दृष्ट्वा पितुर्वधं घोरं तत्पुत्रास्ते शतं त्वरा ।
वारयामासुरत्युग्रं भार्गवं स्वबलैः पृथक् ॥१
एकैकाक्षौहिणीयुक्ताः सर्वे ते युद्धदुर्मदाः ।
संग्रामं तुमुलं चक्रुः संरब्धास्तु पितुर्वधात् ॥२
रामस्तु दृष्ट्वा तत्पुत्राञ्छूरान्रणविशारदान् ।
परश्वधं समादाय युयुधे तैश्च संगरे ॥३
तां सेनां भगवान्रामः शताक्षौहिणिसंमिताम् ।
निजघान त्वरायुक्तो मुहूर्तद्वयमात्रतः ॥४
निःशेषितं स्वसैन्यं तु कुठारेणैव लीलया ।
दृष्ट्वा रामेण ते सर्वे युयुधुर्वीर्यसंमताः ॥५
नानाविधानि दिव्यानि प्रहरंतो महौजसः ।
परितो मंडलं चक्रुर्भागर्वस्य महात्मनः ॥६
अथ रामोऽपि बलवांस्तेषां मंडलमध्यगः ।
विरेजे भगवान्साक्षाद्यथा नाभिस्तु चक्रगा ॥७

श्री वसिष्ठ जी ने कहा—उसके पुत्रों ने जब यह महान् घोर अपने पिता का वध देखा था तो उन सौ पुत्रों ने पृथक्-पृथक् अपने सैन्य बलों लेकर अतीव उग्र भार्गव का वारण किया था ।१। वे सभी युद्ध करने में अत्यन्त दुर्मद थे और सबके साथ एक-एक अक्षौहिणी सेना थी । अपने पिता के वध हो जाने से वे अत्यन्त ही क्रोध में भरे हुए थे और उन्होंने तुमुल संग्राम किया था ।२। परशुराम जी ने देखा था कि उसके सभी पुत्र बड़े शूरवीर हैं और रण करने में बहुत कुशल हैं तब उन्होंने अपना फर्शा उठा लिया था और उन सबके साथ युद्ध क्षेत्र में घोर युद्ध किया था ।३। भगवान् राम ने सौ अक्षौहिणियों से संयुत उस समग्र सेना को बड़ी ही त्वरा से युक्त होकर दो ही मुहूर्त्त के समय में विहनन करके मार गिराया था ।४। महान् वीर्य से संमत उन्होंने जब यह देखा था कि परशुराम ने अपने कुठार के

३३० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्वारा खेल ही खेल में लीला से ही बिना कुछ अधिक आयास किये सम्पूर्ण अपनी सेना को मारकर समाप्त कर दिया है तो सबने बड़ा भारी घोर युद्ध किया था ।५। महान् आत्मा वाले भार्गव के चारों ओर विविध प्रकार के दिव्य अस्त्रों के द्वारा प्रहार करते हुए उन महान् ओज वालों ने सबने एक मण्डल सा बना लिया था अर्थात् सब ओर से घेर कर बीच में दे लिया था ।६। इसके अनन्तर महान् बलशाली परशुराम भी उन सबके मण्डल (घेरा) में मध्य में स्थित होकर वह साक्षात् भगवान् परम सुशोभित हुए थे जिस तरह से समस्त नाड़ियों के चक्र के मध्य में स्थित नाभि शोभा दिया करती है ।७।

नृत्यन्निवाजौ विरराज रामः शतं पुनस्ते परितो भ्रमंतः ।
रेजुश्च गोपीगणमध्यसंस्थः कृष्णो यथा ताः
परितो भ्रमंत्यः ॥८
तदा तु सर्वे द्रुहिणप्रधानाः समागताः स्वस्वविमानसंस्थाः ।
समाकिरन्नन्दनमाल्यवर्षैः समंततो राममहीनवीर्यम् ॥६
यः शस्त्रपादादुदतिष्ठत ध्वनिहुंकारगर्भो
दिवमस्पृशत्स वै ।
तीर्यंत्रिकस्येव शरक्षतानि भांतीव यद्वन्नखदंतपाताः ॥१०
क्रंदंति शस्त्रैः क्षतविक्षतांगा गायंति यद्वत्किल गीतविज्ञाः ।
एवं प्रवृत्तं नृपयुद्धमण्डलं पश्यंति देवा
भृशविस्मिताक्षाः ॥११
ततस्तु रामोऽवनिपालपुत्राञ्जिघांसुराजौ विविधास्त्रपूगैः ।
पृथक्चकारातिबलांस्तु मंडलाद्विच्छिद्य पंक्तिं
प्रभुरातचापः ॥१२
एकैकशस्तान्निजघान वीराञ्छतं तदा पंच
ततः पलायिताः ।
शूरो वृषास्यो वृषशूरसेनौ जयध्वजश्चापि
विभिन्नधैर्याः ॥१३

भार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३१

महाभयेनाथ परीतचित्ता हिमाद्रिपादांतरकाननं च । पृथग्गतास्ते सुपरीप्सवो नृपा न कोऽपि कांस्विददृशे भृशार्त्तः ॥१४

उस संग्राम भूमि में परशुराम नृत्य करते हुए जैसे परमाधिक शोभा को प्राप्त हुए थे और एक सौ वे कार्त्तवीर्य के पुत्र फिरते हुए चारों ओर शोभित हो रहे थे। उस समय में उन सब की शोभा ऐसी ही रही थी जैसी नित्य विहार स्थल वृन्दावन की निकुञ्जों में व्रजाङ्गना गोपियों के समुदाय के मध्य में महारास के समय में भगवान् श्री कृष्ण विराजमान थे और उनके चारों ओर गोपाङ्गनाएँ परिभ्रमण कर रही थीं उनकी शोभा हो रही ।८। उस समय सब जिनमें द्रुहिण प्रमुख थे अपने-अपने विमानों पर समवस्थित होकर वहाँ पर समागत हो गये थे और उन अहीनवीर्य वाले परशुराम के ऊपर सब ओर से नन्दन वन के कमनीय कुसुमों की वर्षा कर रहे थे ।६। इस प्रकार जो शस्त्रों का पात उनके ऊपर हो रहा था तब वे परशुराम उस शरों की वृष्टि में उठकर खड़े हो गये थे और उनकी ध्वनि हुङ्कार करने वाली थी तब ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों वे स्वर्ग का ही स्पर्श कर रहे होवें। उनके शरों के क्षत ऐसे मालूम हो रहे थे जैसे नृत्यगीत करने वाले के दन्तों और नखों के पातों के ही चिन्ह दिखाई दे रहे हों ।१०। वे शस्त्रों से क्षत विक्षत अङ्गों वाले क्रन्दन कर रहे थे मानों कोई गीतों के गान में विज्ञ पुरुष गान कर रहे होंवे। इसी रीति से उन नृपों के साथ युद्ध का मण्डल प्रवृत्त हुआ था जिसको देवगण अत्यन्त विस्मित नेत्रों वाले होकर देख रहे थे ।११। इसके अनन्तर प्रभु राम ने धनुष ग्रहण करके विविध अस्त्रों के समुदाय से उन राजा के पुत्रों का रण में हनन करने की इच्छा वाला होकर यद्यपि वे अतीव बलवान् थे तो भी उनको उस मण्डल से विच्छिन्न करके पंक्ति से पृथक् कर दिया था ।१२। वे सौ वीर थे उनमें से एक-एक को पकड़कर उन्होंने मार डाला था। उस समय में केवल उनमें से पाँच ही बच गये थे जो वहाँ से भाग गये थे। उन पाँचों का धैर्य टूट गया था। उनके नाम शूर-वृषास्य-वृष-शूरसेन और जयध्वज ये थे ।१३। वे पाँचों नृप पृथक् होकर ही चले गये थे और वे सब नृप अपने प्राणों के बचाने की इच्छा वाले थे। उन में से अत्यन्त आर्त्त होकर किसी ने भी किन को भी वहाँ नहीं देखा था। तात्पर्य यह है कि सबको अपनी रक्षा की पड़ी थी और कोई भी किसी को न देख पाया था ।१४।

३३२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

रामोऽपि हत्वा नृपचक्रमाजी राज्ञ. सहाय्यार्थमुपागतं च ।
समन्वितोऽसावकृतव्रणेन सस्नौ मुदाऽऽगत्य च
नर्मदायाम् ॥१५
स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा संपूज्य वृषभध्वजम् ।
प्रतस्थे द्रष्टुमूर्वीशं शिवं कैलासवासिनम् ॥१६
गुरुपत्नीमुमां चापि सुतौ स्कन्दविनायकौ ।
मनोयायी महात्माऽसावकृतव्रणसंयुतः ॥१७
कृतकार्यो मुदा युक्तः कैलासं प्राप्य तत्क्षणम् ।
ददर्श तत्र नगरीं महतीमलकाभिधाम् ॥१८
नानामणिगणाकीर्णभवनैरुपशोभिताम् ।
नानारूपधरैर्यक्षैः शोभितां चित्रभूषणैः ॥१९
नानावृक्षसमाकीर्णैर्वनैश्चोपवनैर्युताम् ।
दीर्घिकाभिः सुदीर्घाभिस्तडागैश्चोपशोभिताम् ॥२०
सर्वतोऽप्यावृतां बाह्ये सीतयालकनंदया ।
तत्र देवांगनास्नानमुक्तकुंकुमपिंजरम् ॥२१

भगवान् परशुराम ने भी उस रण में उस सम्पूर्ण नृपों के चक्र का हनन कर दिया था तथा जो राजा की सहायता करने के लिये वहाँ उपागत हुआ था उसका भी हनन कर डाला था। फिर यह अकृतव्रण के साथ रहकर नर्मदा नदी के समीप में समागत हुए थे और उस नदी में इन्होंने स्नान किया था ।१५। वहाँ पर स्नान करके अपना दैनिक कृत्य समाप्त किया था तथा फिर भगवान् वृषभध्वज का भली भांति अर्चन किया था। इसके उपरान्त कैलाश के निवासी प्रभु शिव का दर्शन प्राप्त करने के लिये वहाँ से परशुराम जी ने प्रस्थान किया था ।१६। अपने मन के ही समान शीघ्र गमन करने वाले परशुराम जी अपने पालित अकृतव्रण शिष्य के साथ गुरु पत्नी जगदम्बा उमा देवी–और उनके दोनों पुत्र स्कन्द और विनायक के दर्शनार्थ वह महात्मा वहाँ पर गये थे ।१७। अपने सम्पूर्ण कार्यों में सफल होकर समस्त क्षत्रिय शत्रुओं को निहत करके बड़ी ही प्रसन्नता से युक्त होते हुए उसी क्षण में कैलास गिरि पर पहुँच गये थे और भगवान् शङ्कर की अलका

भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३३३

नाम वाली नगरी को देखा था जो नगरी बहुत ही विशाल थी ।१८। उस नगरी की छटा का वर्णन किया जाता है—उस नगरी में अनेक भवन ऐसे बने हुए थे जो नाना भाँति के रत्नों से संयुत थे, उन भवनों की शोभा से वह परम सुशोभित थी। उसमें बहुत से यक्ष विद्यमान थे जो विचित्र प्रकार के भूषणों के धारण करने वाले तथा विविध स्वरूपों वाले थे । इनसे भी उसकी बड़ी शोभा हो रही थी ।१९। उस नगरी में बहुत तरह के वन और उपवन थे जिनमें अनेक प्रकार के वृक्ष थे। वह नगरी अनेक विशाल वापियों (बावड़ियों) से तथा तालाबों से भी परम सुशोभित थी ।२०। उस पुरी का बाहिरी सब ओर से सीता और अलकनन्दा नाम वाली सुन्दर सरिताओं से समावृत था । वहाँ पर देवों की अङ्गनाएँ स्नान कर रही थीं जिससे उनके अङ्गों में लगा हुआ कुंकुम छूटकर उनके जल में प्रवाहित हो रहा था ।२१।

तृषाविरहिताश्चांभः पिबन्ति करिणो मुदा । यत्र संगीतसंनादा श्रूयन्ते तत्र तत्र ह ।।२२ गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सततं सहकारिभिः । तां दृष्ट्वा भार्गवो राजन्मुदा परमया युतः ।।२३ ययौ तदूर्ध्वं शिखरं यत्र शैवपरं गृहम् । ततो ददर्श राजेंद्र स्निग्धच्छायं महावटम् ।।२४ तस्याधस्ताद्धरावासं सुसेव्यं सिद्धसंयुतम् । ददर्श तत्र प्राकारं शतयोजनमंडलम् ।।२५ नानारत्नाचितं रम्यं चतुर्द्वारं गणावृतम् । नन्दीश्वरं महाकालं रक्ताक्षं विकटोदरम् ।।२६ पिंगलाक्षं विशालाक्षं विरूपाक्षं घटोदरम् । मंदारं भैरवं बाण रुरुं भैरवमेव च ।।२७ वीरकं वीरभद्रं च चंडं भृङ्गि रिटि मुखम् । सिद्धेंद्रनाथरुद्रांश्च विद्याधरमहोरगान् ।।२८

उन सरिताओं में तृषा से विरहित करी बड़े ही आनन्द से उनका जल पी रहे थे । वहाँ पर जहाँ-तहाँ संगीत की परम मधुर ध्वनियाँ सुनाई दे रही थी ।२२। वहाँ पर बहुत से गन्धर्व गण अप्सराओं को अपने साथ में

३३४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

लिए हुए निरन्तर रंगरेलियां कर रहे थे। भार्गव श्री परशुराम जी ने जिस समय में उस परम सुन्दर पुरी का अवलोकन किया उनको अत्यन्त हर्ष हुआ था ।२३। इसके अनन्तर वे उसके ऊपर गये थे जिस शिखर पर भगवान् शिव का परम सुरम्य निवास करने का गृह था। हे राजेन्द्र ! वहाँ पर एक महान विशाल बहुत ही घनी छाया वाला वट का वृक्ष उन्होंने देखा था ।२४। उस वट वृक्ष के नीचे एक आवास गृह बना हुआ था जो भली भाँति सेवन करने के योग्य था और बड़े-बड़े महान् सिद्धगणों से समन्वित था। वहाँ पर उसका एक प्रकार (बहार दीवारी) उन्होंने देखा था जिसका मण्डल (घेरा) एक सौ योजन वाला था ।२५। उस नगर में अनेक प्रकार के रत्न खचित हो रहे थे तथा परम रम्य और चार प्रधान द्वारों से वह समन्वित था। वहाँ पर गण सब ओर थे। अब उन प्रधान गणों में नन्दीश्वर-महाकाल-रक्ताक्ष और विकटोदर थे ।२६। इनके अतिरिक्त पिंगलाक्ष-विरूपाक्ष-घटोदर-मन्दार-भैरव-बाण-रुरु-भैरव भी थे ।२७। उन गणों में वीरभद्र-चण्ड-रिटि-मुख भी थे। वहाँ पर सिद्धेन्द्र-नाथ और रुद्र थे तथा विद्याधर और महोरग भी विद्यमान थे ।२८।

भूतं तपिशाचांश्च कूष्मांडान्ब्रह्मराक्षसान् ।
वेतालान्दानवेंद्रांश्च योगीन्द्रांश्च जटाधरान् ॥२९
यक्षाँकिपुरुषांश्चैव डाकिनीयोगिनीस्तथा ।
दृष्ट्वा नंद्याज्ञया तत्र प्रविष्टोऽतर्मुदान्वितः ॥३०
ददर्श तत्र भुवनैरावृतं शिवमन्दिरम् ।
चतुर्योजनविस्तीर्णं तत्र प्राग्द्वारसंस्थितौ ॥३१
दृष्ट्वा वामे कार्त्तिकेयं दक्षे चैव विनायकम् ।
ननाम भार्गवस्तौ द्वौ शिवतुल्यपराक्रमौ ॥३२
पार्षदप्रवरास्तत्र क्षेत्रपालाश्च संस्थिताः ।
रत्नसिंहासनस्थाश्च रत्नभूषणभूषिताः ॥३३
भार्गवं प्रविशन्तं तु ह्यपृच्छञ्छिवमन्दिरम् ।
विनायको महाराज क्षणं तिष्ठेत्युवाच ह ॥३४
निद्रितो ह्युमया युक्तो महादेवोऽधुनेति च ।
ईश्वराज्ञां गृहीत्वाहंमत्रागत्य क्षणांतरे ॥३५

भार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३५

वहाँ पर इन उपर्युक्त गणों के अतिरिक्त बहुत से भूत-प्रेत-पिशाच कूष्मांड-ब्रह्मराक्षस-वेताल-दानवेन्द्र और जटाजूट धारी बड़े-बड़े योगीन्द्र भी थे ।२६। वहाँ उस शिव की नगरी में यक्ष-किम्पुरुष-डाकिनी और योगिनियां भी थीं । इन सबका वहाँ पर परशुरामजी ने अवलोकन किया था । भगवान् शङ्कर के बांई ओर स्वामी कार्त्तिकेय और उनके दाँई ओर विघ्नेश्वर विनायक विराजमान थे। भार्गवेन्द्र ने उन दोनों को प्रणाम किया था क्योंकि ये दोनों शिव के पुत्र शङ्कर के ही समान पराक्रम वाले थे । इससे पूर्व परशुरामजी ने नन्दी की आज्ञा ग्रहण करके ही उस पुर के अन्दर प्रवेश किया था। अन्दर प्रवेश करने की आज्ञा पाकर उनको बहुत ही प्रसन्नता हुई थी। वहाँ पर भुवनों से सदावृत शिवजी के मन्दिर का अवलोकन किया था। यह मन्दिर चार योजन के विस्तार वाला था ।३०-३१-३२। वहाँ पर परम श्रेष्ठ पार्षद और क्षेत्रपाल भी समवस्थित थे ये लोग रत्न जटिल सिंहासनों पर रत्नों के विविध भूषणों से विभूषित होकर विराजमान थे ।३३। जिस समय में भार्गव शिव मन्दिर में प्रवेश कर रहे थे तब उन सबने इनसे पूछा था हे महाराज ! उस समय में विनायक ने उनसे यही कहा था कि एक क्षण मात्र आप यहीं पर ठहरिए ।३४। इस समय में महादेव जी अपनी प्रिय पत्नी जगदम्बा उमा के साथ शयन किये हुए हैं। मैं एक ही क्षण भर में ईश्वर की आज्ञा प्राप्त करके यहीं पर समागत होता हूँ ।३५।

त्वया सार्द्धं प्रवेक्ष्यामि भ्रातस्तिष्ठात्र सांप्रतम् ।
विनायकश्चैवं श्रुत्वा ह्यायश्चिटं भार्गवनंदनः ॥३६
प्रवक्तुमुपचक्राम गणेशं त्वरयान्वितः ।

राम उवाच-
गत्वा ह्यंतःपुरं भ्रातः प्रणम्य जगदीश्वरौ ॥३७
पार्वतीशंकरौ सद्यो यास्यामि निजमन्दिरम् ।
कार्त्तवीर्यः सुचन्द्रश्च सपुत्रबलबांधवः ॥३८
अन्ये सहस्रशो भूपाः कांबोजाः पह्लवाः शकाः ।
कान्यकुब्जाः कोशलेशा मायावन्तो महाबलाः ॥३९
निहताः समरे सर्वे मया शम्भुप्रसादतः ।

३३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तमिमं प्रणिपत्यैव यास्यामि स्वगृहं प्रति ॥४० इत्युक्त्वा भार्गवस्तत्र तस्थौ गणपतेः पुरः । प्रोवाच मधुरं वाक्यं भार्गवे स गणाधिपः ॥४१ विनायक उवाच - क्षणं तिष्ठ महाभाग दर्शनं ते भविष्यति । अद्य विश्वेश्वरो भ्रातर्भवान्या सह वर्त्तते ॥४२

मैं फिर हे भाई ! आपको साथ ही लेकर आपका प्रवेश वहाँ पर अभी करा दूँगा । अतएव यहाँ पर कुछ समय तक आप रुकिए । भार्गव नन्दन ने विनायक के इस वचन का श्रवण करके बड़ी ही शीघ्रता से युक्त होकर श्री गणेशजी से कुछ कथन करने का उपक्रम किया था । राम ने कहा— हे भाई ! आप अन्तः पुर में जाकर उन दोनों जगदीश्वरों को प्रणाम करिए अर्थात् मेरा प्रणिपात निवेदित कर दीजिए । पार्वती और शङ्कर इन दोनों को प्रणाम करके मैं तुरन्त ही अपने मन्दिर को गमन करूँगा । कार्त्तवीर्य और सुचन्द्र जो अपने पुत्रों-सैनिकों और बान्धवों के सहित थे एवं अन्य भी सहस्रों नृप जो कि काम्बोज-पहलव शक-कान्यकुब्ज-कोशले-श्वर थे जो कि बड़ी ही अधिक माया वाले और महान् बलवान् थे ।३६-३७-३८-३९। मैंने भगवान् शम्भु की ही कृपा से तथा परिपूर्ण प्रसाद से युद्ध में सबका निहनन किया है । अतएव अब मैं उन्हीं प्रभु के चरणों में प्रणाम करके फिर अपने घर को चला जाऊँगा ।४०। इतना निवेदन करके परशुराम वहाँ पर गणपति के आगे स्थित हो गये थे । फिर उन गणाधिप प्रभु ने भार्गव से बहुत मधुर स्वर में कहा था ।४१। विनायक ने कहा— हे महाभाग ! एक मात्र आप यहाँ पर ठहरिए आपको भगवान् शङ्कर का दर्शन हो जायगा । हे भाई ! आज वे विश्वेश्वर प्रभु भवानी के साथ में विद्यमान हैं ।४२।

स्त्रीपुंसोर्युक्तयोस्तात सहैकासनसंस्थयोः । करोति सुखभंगं यो नरकं स व्रजेद्ध्रुवम् ॥४३ विशेषतस्तु पितरं गुरुं वा भूपतिं द्विज । रहस्यं समुपासीनं न पश्येदिति निश्चयः ॥४४ कामतोऽकामतो वापि पश्येद्यः सुरतोन्मुखम् ।

भार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३७

स्त्रीविच्छेदो भवेत्तस्य ध्रुवं सप्तसु जन्मसु ॥४५॥ श्रोणि वक्षःस्थलं वक्त्रं यः पश्यति परस्त्रियः । मातुर्वापि भगिन्या वा दुहितुः स नराधमः ॥४६॥ भार्गव उवाच- अहो श्रुतमपूर्वं किं वचनं तव वक्त्रतः । भ्रान्त्या विनिर्गतं वापि हास्यार्थमथवोदितम् ॥४७॥ कामिनां सविकाराणामेतच्छास्त्रनिदर्शनम् । निर्विकारस्य च शिशोर्न दोषः कश्चिदेव हि ॥४८॥ यास्याम्यंतः पुरं भ्रातस्तव किं तिष्ठ बालक । यथादृष्टं करिष्यामि तत्र यत्समयोचितम् ॥४९॥

हे तात ! पति और पत्नी जब एक ही आसन पर संस्थित होकर संयुक्त होवें और साथ में निरत होवें उस समय में जो कोई भी सुरत-सुख का भङ्ग किया करता है वह निश्चय ही नरक में गमन किया करता है ।४३। यह तो सर्व साधारण के लिए नियम है और विशेष रूप से हे द्विज ! जो कोई अपने पिता-गुरु अथवा भूपति को जबकि वे रहस्य में समुपसीन हों तो इनको कभी भी बाधा डालते हुए नहीं देखना चाहिए-यह निश्चित सिद्धान्त की बात है ।४४। चाहे इच्छा से या बिना ही इच्छा के कहीं पर भी सुरत क्रीड़ा में उन्मुख पति-पत्नी को जो कोई देखता है अर्थात् देखा करता है उसकी स्त्री का विच्छेद सात जन्मों तक हो जाया करता है यह परम निश्चित है ।४५। जो पराई स्त्री के श्रोणि-वक्षः स्थल और मुख को देखता है तात्पर्य यह है कि बुरी दृष्टि से देखा करता है वह चाहे अपनी माता हो-भगिनी हो या दुहिता हो इनमें कोई भी हो तो वह नरों में बड़ा ही अधम होता है ।४६। भार्गव ने कहा-आज मैंने आपके मुख से निकले हुए अपूर्व ही वचन सुने हैं । ये वचन भ्रान्ति से ही निकल गये हैं अथवा आपने हास्य के ही लिये कहे हैं ? ।४७। यह तो सब विकारों से युक्त कामियों के शास्त्र का निदर्शन है अर्थात् कामवासना से वासित अन्तःकरण वाले ही ऐसे विषय की चर्चा किया करते हैं। आप तो विकारों से रहित हैं और शिशु हैं क्या आपको ऐसा कथन करने से कोई दोष नहीं होता है ? ।४८। हे भाई ! मैं तो अन्तः पुर में जाऊँगा । आप तो बालक हैं, आपको इस बात से क्या

३३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

प्रयोजन है आप यहाँ पर ही रहिए। मैं वहाँ पर जैसा भी देखूँगा और जो भी उस समय में उचित होगा, करूँगा ।४६।

अत्रैव माता तातश्च त्वया नाम निरूपितौ । जगतां पितरौ तौ च पार्वतीपरमेश्वरौ ॥५० इत्युक्त‍्वा भार्गवो राजन्नंतर्गन्तुं समुद्यतः । विनायकस्तदोत्थाय वारयामास सत्वरम् ॥५१ वाग्युद्धं च तयोरासीन्मिथो हस्तविकर्षणम् । दृष्ट्वा स्कन्दस्तु सम्भ्रान्तो बोधयामास तौ तदा ॥५२ बाहुभ्यां द्वौ समुद्गृह्य पृथगुत्सारितौ तथा । अथ क्रुद्धो गणेशाय भार्गवः परवीरहा । परश्वधं समादाय संप्रक्षेप्तुं समुद्यतः ॥५३ तं दृष्ट्वा गजाननो भृगुवरं क्रोधात्क्षिपंतं त्वरा स्वात्मार्थं परशुं तदा निजकरेणोद्धृत्य वेगेन तु । भूर्लोकं भुवः स्वरपि तस्योर्ध्वं महर्वैजनं लोकं चापि तपोऽथ सत्यमपरं वैकुंठमप्यानयत् ॥५४ तस्योर्ध्वं च निदर्शयन्भृगुवरं गोलोकमीशात्मजो निष्पात्या धरलोक सप्तकमप॑त्थि दर्शयामास च । उद्धृत्याथ ततो हि गर्भसलिले प्रक्षिप्तमात्रं त्वरा भीतं प्राणपरिप्सुमानयद्धथो तत्रैव तत्रास्थितः ॥५५

वहीं पर माता जगदम्बा हैं और पिता भगवान शंकर हैं, आपने दोनों के नाम निरूपित कर ही दिये हैं। वे पार्वती और परमेश्वर तो सम्पूर्ण जगतों के पिता-माता हैं ।५०। हे राजन ! इतना भर कहकर भार्गव राम अन्दर जाने के लिए उद्यत हो गये थे। उसी समय में विनायक ने शीघ्र ही उठकर उनका वारण कर दिया था अर्थात् अन्तः पुर में जाने से रोक दिया था ।५१। पहिले तो उन दोनों का वाग्युद्ध अर्थात् कहा सुनी हुई और फिर हाथों की खींच तान हुई, जब कार्त्तिकेय जी ने देखा तो उनको बहुत सम्भ्रान्ति हुई थी और उस समय में उन्होंने दोनों को समझाया था ।५२। स्वामी स्कन्द ने अपनी बाहुओं से पकड़कर उन दोनों को अलग-अलग

भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३३६

कर दिया था। इसके अनन्तर शत्रु वीरों के हनन करने वाले भार्गव गणेश जी पर बहुत क्रुद्ध हो गये थे और अपनी परशु लेकर उसका प्रहार करने के लिए उद्यत हो गये थे ॥५३॥ गजानन ने जब यह देखा था कि भृगुवर बड़ी शीघ्रता से क्रोध में भरकर अपने लिए परशु को प्रक्षिप्त कर रहे हैं तो उन्होंने उसी समय में बड़े ही वेग से अपने हाथ से परशुराम को ऊपर उठा कर भूर्लोक-भुवर्लोक-स्वर्लोक-और उसके भी ऊपर महर्लोक-जनलोक तप-लोक-सत्यलोक और दूसरे वैकुण्ठ लोक में ले आये थे ॥५४॥ उन भगवान शम्भु के पुत्र गजानन ने उन भृगुवर उसके ऊपर गोलोक को दिखाते हुए फिर गिराकर नीचे के सातों अतल-वितल-सुतल-तला-तल-रसातल-महातल और पाताल लोकों को दिखा दिया था। फिर नीचे के लोकों से ऊपर उठाकर सलिल के गर्भ में शीघ्रता से प्रक्षिप्त किया था। जब यह देखा कि वह भयभीत होकर अपने प्राणों की रक्षा करने की इच्छा वाले हैं तो फिर वहाँ पर उनको लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ पर वे पहिले स्थित थे ॥५५॥


भार्गव-चरित्र वर्णन (२)

वसिष्ठ उवाच-

एवं संभ्रामितो रामो गणाधीशेन भूपते ।
हर्षशोकसमाविष्टो विचित्यात्मपराभवम् ॥१
गणेशं चाभितो वीक्ष्य निर्विकारमवस्थितम् ।
क्रोधाविष्टो भृशं भूत्वा प्राक्षिपत्स्वपरश्वधम् ॥२
गणेशस्त्वभिवीक्ष्याथ पित्रा दत्तं परश्वधम् ।
अमोघं कर्तुकामस्तु वामे तं दशनेऽग्रहीत् ॥३
स तु दंतः कुठारेण विच्छिन्नो भूतलेऽपतत् ।
भुवि शोणितसंदिग्धो वज्राहत इवाचलः ॥४
दंतपातेन विध्वस्ता साब्धिद्वीपधरा धरा ।
चकंपे पृथिवीपाल लोकास्त्रासमुपागताः ॥५

३४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

हाहाकारो महानासीद्देवानां दिवि पश्यताम् । कार्त्तिकेयादयस्तत्र चुक्रुशुर्भृशमातुराः ॥६ अथ कोलाहलं श्रुत्वा दंतपातध्वनि तथा । पार्वतीशंकरौ तत्र समाजग्मतुरीश्वरौ ॥७

वसिष्ठ जी ने कहा—हे भूपते ! इस रीति से गणाधीश के द्वारा परशुराम भली भाँति भ्रमित किये गये थे । तब उनको बहुत से अद्भुत लोकों के दर्शन से हर्ष हुआ था और अपने बल पराक्रम की तुच्छता समझ कर बड़ा भारी शोक भी हुआ था ऐसे हर्ष और शोक से समाविष्ट होकर उन्होंने अपने पराभव का चिन्तन किया था ।१। उस समय में गणेश जी को सामने देखा था कि वे बिना विकार वाले अवस्थित हैं तो फिर अत्यन्त क्रोध में भरकर परशुरामजी ने अपने परशु को फेंककर चलाया था ।२। गणेशजी ने यह देखा था कि वह परशु अपने पिताजी के द्वारा राम को दिया गया था । उस परशु के प्रहार को अमोघ अर्थात् सफल करने की ही इच्छा वाले गणेशजी ने उस परशु को अपने बाँये दाँत पर ग्रहण कर लिया था ।३। गणेश जी का वह बाँया दाँत उस कुठार से विच्छिन्न होकर भूतल पर गिर गया था । रुधिर से संदिग्ध (लथपथ) वह दाँत भूमि पर एक पर्वत के ही समान गिर गया था ।४। उस दाँत का पात ऐसा भीषण हुआ था कि सम्पूर्ण सागरों और द्वीपों के सहित यह धरातल विध्वस्त हो गया था और पृथिवीपाल काँप उठे थे तथा सभी लोकों को बड़ा भारी त्रास उत्पन्न हो गया था ।५। स्वर्ग में जो देवगण देख रहे थे उनमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया था और वहाँ पर कार्त्तिकेय आदि जो सब थे वे सभी अत्यन्त आतुर होकर क्रन्दन करने लगे थे ।६। इसके अनन्तर जब बड़ा भारी वहाँ पर कोलाहल हो गया था तो उस दाँत के गिरने की ध्वनि को सुनकर ईश्वर पार्वती तथा भगवान् शङ्कर वहाँ पर समागत हो गये थे ।७।

हेरम्बं पुरतो दृष्ट्वा वक्रतुण्डकदंतिनम् । पप्रच्छ स्कन्दं पार्वती किमेतदिति कारणम् ॥८ स तु पृष्टस्तदा मात्रा सेनानीः सर्वमादितः । वृत्तांतं कथयामास मात्रे रामस्य शृण्वतः ॥६ सा श्रुत्वोदंतमखिलं जगतां जननी नृप ।

भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४१

उवाच शंकरं रुष्टा पार्वती प्राणनायकम् ॥१०
पार्वत्युवाच—अयं ते भार्गवः शंभो शिष्यः पुत्रः समोऽभवत् ।
त्वत्तो लब्ध्वा परं तेजो वर्म त्रैलोक्यजिद्विभो ॥११
कार्त्तवीर्यार्जुनं संख्ये जितवानूर्जितं नृपम् ।
स्वकार्यं साधयित्वा तु प्रादात्तुभ्यं च दक्षिणाम् ॥१२
तत्ते सुतस्य दशनं कुठारेण न्यपातयत् ।
अनेनैव कृतार्थस्त्वं भविष्यसि न संशयः ॥१३
त्वमिमं भार्गवं शम्भो रक्षांतेवासिसत्तमम् ।
तव कार्याणि सर्वाणि साधयिष्यति सद्गुरोः ॥१४

भगवान् शङ्कर ने गणेशजी को अपने सामने देखा था जिनका मुख तिरछा हो गया था और केवल एक ही दाँत था। पार्वतीजी ने स्वामी कार्त्तिकेय से पूछा था कि इस दुर्घटना के घटित होने का क्या कारण था ।८। माताजी द्वारा जब स्वामी कार्त्तिकेय से पूछा गया तो सेनानी ने आदि से सम्पूर्ण वृत्तान्त माताजी को कहकर सुना दिया था। उस समय में वहाँ पर परशुराम भी इसको सुन ही रहे थे ।६। हे नृप ! जगतों की जननी पार्वतीजी ने पूर्ण समाचार श्रवण करके रुष्ट होती हुई अपने प्राणनायक भगवान् शङ्कर से बोलीं ।१०। पार्वतीजी ने कहा—हे शम्भो ! यह भार्गव तो आपका ही शिष्य है और पुत्र के ही समान हुआ था। हे विभो ! इसने आप ही से ऐसा परम तेज और त्रैलोक्य को जीतने वाला वर्म प्राप्त किया है ।११। इसने महान् अर्जित कार्त्तवीर्यार्जुन नृप को युद्ध में जीत लिया है यह आप ही के द्वारा प्रदत्त बलविक्रम से इसकी विजय हुई है। इसने अपने कार्य को साधित करके अर्थात् अपने शत्रु का निहनन करके अब यह आपकी सेवा में दक्षिणा दी है ।१२। वह यही तो दक्षिणा है कि आप ही के पुत्र के दाँत को अपने कुठार से तोड़कर नीचे गिरा दिया है। आप इसी कार्य से कृतार्थ होंगे—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।१३। हे शम्भो ! आप इस परम श्रेष्ठ अपने छात्र तथा शिष्य की रक्षा कीजिए। आप इसके बड़े ही अच्छे गुरु हैं अब आपके समस्त कार्यों को यह ही सिद्ध करेगा ।१४।

अहं नैवात्र तिष्ठामि यत्त्वया विमता विभो ।
पुत्राभ्यां सहिता यास्ये पितुः स्वस्य निकेतनम् ॥१५

३४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

संतो भुजिष्यातनयं सत्कुर्वन्त्यात्मपुत्रवत् । भवता तु कृतो नैव सत्कारो वचसाऽपि हि ॥१६ आत्मनस्तनयस्यास्य ततो यास्यामि दुःखिता। वसिष्ठ उवाच- एतच्छ्रुत्वा तु वचनं पार्वत्या भगवान्भवः ॥१७ नोवाच किंचिद्वचनं साधु वासाधु भूपते । सस्मार मनसा कृष्णं प्रणतक्लेशनाशनम् ॥१८ गोलोकनाथं गोपीशं नानानुनयकोविदम् । स्मृतमात्रोऽथ भगवान् केशवः प्रणतार्त्तिहा । आजगाम दयासिंधुर्भक्तश्योऽखिलेश्वरः ॥१९ मेघश्यामो विशदवदनो रत्नकेयूरहारो विद्युद्वासा मकरसदृशे कुण्डले संदधानः । बर्हापीडं मणिगणयुतं बिभ्रदीषत्स्मितास्यो गोपीनाथो गदितसुयशाः कौस्तुभोद्भासिवक्षाः ॥२० राधया सहितः श्रीमान् श्रीदाम्ना चापराजितः ॥२१

हे विभो ! मैं अब यहाँ पर नहीं रहूँगी क्योंकि आपने मेरा अपमान कर दिया है अर्थात् मुझको अपनी नहीं समझा है, अब मैं तो अपने दोनों पुत्रों को साथ में लेकर अपने पिताजी के घर में चली जाऊँगी ।१५। सत्पुरुष तो अपनी पुत्री के पुत्रों को अपने ही पुत्रों के समान सत्कार किया करते हैं । आपने तो अपने वचनों से भी कभी सत्कार नहीं किया है ।१६। यह तो आपका ही पुत्र है फिर भी कभी इसका आदर-सम्मान वाणी के द्वारा भी नहीं किया है । इसी कारण से मैं अधिक दुःखित होकर ही चली जाऊँगी । वसिष्ठ जी ने कहा—भगवान शङ्कर ने अपनी परम प्रिया पत्नी पार्वती के इस वचन का श्रवण किया था ।१७। हे राजन् ! किन्तु इस वचन को सुनकर भी उन्होंने पार्वती जी से अच्छा या कुछ भी वचन उत्तर के स्वरूप में नहीं कहा था । और प्रणतों के क्लेशों का विनाश कर देने वाले भगवान श्री कृष्णचन्द्र का मन में स्मरण किया था ।१८। ब्रज की गोपियों के नाथ और गोलोक के स्वामी तथा अनेक भाँति के अनुनयो-विनयों के ज्ञाता महान

भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४३

मनीषी भगवान् ने ध्यान में मन के द्वारा स्मरण किया था केवल स्मरण करने ही से अपने चरणों में शिर झुकाकर प्रणत होने वाले भक्तों की पीड़ा का हनन कर देने वाले केशव भगवान् वहाँ पर आकर उपस्थित हो गये थे क्योंकि प्रभु तो समस्त चराचर के ईश्वर हैं—दया के सागर हैं और अपने भक्तों के वश में होने वाले हैं ।१६। अब भगवान् के सुन्दर जगत मोहन स्वरूप का वर्णन किया जाता है—उनका वर्ण नील सजल मेघ के समान था--आपका मुख विकसित कमल के सदृश था और आप रत्न जटित केयूर और हार धारण किये हुए थे । सौदामिनी विद्युत के समान पीताम्बर पहिने हुए थे और मकरों की आकृति वाले दो कुण्डल कानों में धारण कर रहे थे । मयूर पिच्छों से निर्मित और अनेक मणियों से संयुत मस्तक पर मुकुट पहिन रहे थे तथा उनके मुख कमल पर मन्द मुस्कान झलक रही थी । वे गोपियों के नाथ जिनके यश का वर्णन किया है कौस्तुभ मणि से उद्भासित वक्षःस्थल वाले थे ।२०। अद्भुत श्री से सम्पन्न श्रीकृष्ण के साथ में रासेश्वरी राधा भी थीं और श्रीदामा से अपराजित थे ।२१।

मुष्णंस्तेजांसि सर्वेषां स्वरुचा ज्ञानवारिधिः ।
अथैनमागतं दृष्ट्वा शिवः संहृष्टमानसः ।।२२
प्रणिपत्य यथान्यायं पूजयामास चागतम् ।
प्रवेश्याभ्यंतरे वेश्म राधया सहितं विभुम् ।।२३
रत्नसिंहासने रम्ये सदारं स न्यवेशयत् ।
अथ तत्र गता देवी पार्वती तनयान्विता ।।२४
ननाम चरणान्प्रभोः पुत्राभ्यां सहिता मुदा ।
अथ रामोऽपि तत्रैव गत्वा नमितकंधरः ।।२५
पार्वत्याश्चरणोपांते पपाताकुलमानसः ।
सा यदा नाभ्यनंदत्तं भार्गवं प्रणतं पुरः ।।२६
तदोवाच जगन्नाथः पार्वतीं प्रीणयन्गिरा ।।२७
श्रीकृष्ण उवाच-
अयि नगनंदिनि निंदितचंद्रमुखि त्वमिमं जमदग्निसुतम् ।
नय निजहस्तसरोजसमर्पितमस्तकमंकमनंतगुणे ।।२८

३४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान के महान् सागर थे और अपने दिव्य देह की कान्ति से सबके तेज को तिरस्कृत कर रहे थे । इसके अनन्तर जिस समय में भगवान् श्रीकृष्ण ने वहाँ पर पदार्पण किया था तो उनका दर्शन करके भगवान् शिव के मन में परमाधिक प्रसन्नता हुई थी ।२२। उन वहाँ पर समागत हुए प्रभु को न्याय के अनुसार जैसा भी महापुरुषों के लिये अभिवादन किया जाता है प्रणिपात किया और अर्चन किया था । फिर बड़े ही आदर से राधिकाजी के साथ प्रभु का अपने सदन में प्रवेश कराया था ।२३। वहाँ पर एक रत्न जटिल परम सुरम्य सिंहासन पर राधिका जी के सहित उनको विराजमान कराया था । इसके अनन्तर जब पार्वती जी ने साक्षात् प्रभु का आगमन देखा तो वह भी अपने दोनों पुत्रों के सहित वहाँ पर पहुँच गयी थीं ।२४। बड़े ही हर्षोल्लास के साथ इन्होंने अपने दोनों पुत्रों के सहित श्रीकृष्ण और श्रीराधा चरणों में प्रणाम किया था । इसके उपरान्त परशुराम भी वहीं पर पहुँच गये थे और अपनी गरदन को नीचे की ओर झुकाये हुए आकुलित मन वाले होकर पार्वती जी के चरणों के समीप में ही भूमि में गिर गये थे । किन्तु जब अपने आगे प्रणिपात करते हुए भार्गव को पार्वती जी ने अभिनन्दित नहीं किया था तो यह भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं उनके हृद्गत अमर्ष का अवलोकन किया था ।२५-२६। उस समय जगतों के नाथ प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी परम मधुर वाणी से पार्वती जी को प्रसन्न करते हुए उनसे कहा था ।२७। श्रीकृष्ण ने कहा—अयि ! नगराज की पुत्रि ! आप तो इतने अधिक सुन्दर मुख वाली हैं कि जिसकी छटा के सामने चन्द्र भी तुच्छ है । आपके अन्दर तो अनन्त गुण गण विद्यमान हैं । अब आप इस जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपने कर कमलों से इसका मस्तक पकड़ कर अपनी गोद में बिठा लीजिए ।२८।

भवभयहारिणि शंभुविहारिणि कल्मषनाशिनि कुंभिगते । तव चरणे पतितं सततं कृतकिल्विषमप्यव देहि वरम् ॥२९

शृणु देवि महाभागे वेदोक्तं वचनं मम । यच्छ्रुत्वा हर्षिता नूनं भविष्यसि न संशयः । विनायकस्ते तनयो महात्मा महतां महान् ॥३०

यं कामः क्रोध उद्वेगो भयं नाविशते कदा । वेदस्मृतिपुराणेषु संहितासु च भामिनि ॥३१

भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४५

नामान्यस्योपदिष्टानि सुपुण्यानि महात्मभिः । यानि तानि प्रवक्ष्यामि निखिलाघहराणि च ॥३२ प्रमथानां गणा ये च नानारूपा महाबलाः । तेषामीशस्त्वयं यस्माद्गणेशस्तेन कीर्त्तितः ॥३३ भूतानि च भविष्याणि वर्त्तमानानि यानि च । ब्रह्मांडान्यखिलान्येव यस्मिँल्लंबोदरः स तु ॥३४ यः स्थिरो देवयोगेन च्छिन्नं संयोजितं पुनः । गजस्य शिरसा देवि तेन प्रोक्तो गजाननः ॥३५

हे शम्भु के साथ बिहार करने वाली देवि ! आप तो समस्त सांसारिक भयों को दूर करने वाली हैं और सभी प्रकार के कल्मषों का विनाश कर देने वाली हैं। हे कुम्भिगते ! अर्थात् मत्तकरिणी के समान मन्द गति वाली ! यह परशुराम अब आपके चरणों में पड़ा हुआ आप को प्रणिपात कर रहा है। यद्यपि इसने निरन्तर आपके अपराध रूपी पाप किया है तथापि इसको क्षमा करके अब वरदान दे दीजिए ।२६। हे देवि ! आप तो महान् भाग वाली हैं। अब आप मेरे वेदों में कहे हुए वचन का श्रवण कीजिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उस मेरे वचन को सुनकर आप निश्चय ही परम हर्षित हो जायगी। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। यह विनायक (गणेश) आपका पुत्र है और यह महान् आत्मा वाले तथा महान् पुरुषों में भी शिरोमणि महान् पुरुषों में भी शिरोमणि महान् हैं ।३०। इनके हृदय में कभी भी काम-क्रोध-उद्वेग और भय आदि का प्रवेश नहीं हुआ करता है। हे भामिनि ! वेदों में स्मृतियों में पुराणों में तथा संहिताओं में सर्वत्र इनके शुभमानों का वर्णन है ।३१। बड़े-बड़े महात्माओं के द्वारा सुपुण्यमय इनके नामों का उपदेश दिया गया है। वे इनके परम शुभ नाम समस्त अघों के दूर कर देने वाले हैं। जो भी वे नाम हैं उनको मैं अभी आपको बतला दूँगा ।३२। जो भी प्रमथों के गण हैं जिनके विविध स्वरूप हैं और जो महान् बल वाले हैं। उन सबके यह गणेश स्वामी हैं। यही कारण है कि इनका नाम 'गणेश' यह संसार में कहा जाया करता है ।३३। जितने भी जो भी भविष्य में होने वाले हैं और समस्त जो भी ब्रह्माण्ड हैं जिनमें यहीं लम्बोदर हैं अर्थात् लम्बे विशाल उदर वाले यही हैं ।३४। जो भी इस समय में स्थिर है यह पहिले एक बार देव के योग से इनका मस्तक छिन्न हो गया

३४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

था और फिर उसको संयोजित किया था जो कि एक गज के शिर से ही जोड़ दिया गया था । हे देवि ! इसीलिए यह गजानन नाम वाले हैं ।३५।

चतुर्थ्यामुदितश्चन्द्रो दम्भिणा शप्त आतुरः । अनेन विधृतो भाले भालचन्द्रस्ततः स्मृतः ॥३६ शप्तः पुरा सप्तभिस्तु मुनिभिः संक्षयं गतः । जातवेदा दीपितोऽभूद्येनासौ शूर्पकर्णकः ॥३७ पुरा देवासुरे युद्धे पूजितो दिविषद्गणैः । विघ्नं निवारयामास विघ्ननाशस्ततः स्मृतः ॥३८ अद्यायं देवि रामेण कुठारेण निपात्य च । दशनं दैवतो भद्रे ह्येकदंतः कृतोऽमुना ॥३९ भविष्यत्यथ पर्याये ब्रह्मणो हरवल्लभे । वक्रीभविष्यत्तुण्डत्वाद्वक्रतुण्डः स्मृतोः बुधैः ॥४० एवं तवास्य पुत्रस्य संति नामानि पार्वति । स्मरणात्पापहारीणि त्रिकालानुगतान्यपि ॥४१ अस्मात्त्रयोदशीकल्पात्पूर्वस्मिन्दशमीभवे । मयास्मै तु वरो दत्तः सर्वदेवाग्रपूजने ॥४२

चतुर्थी तिथि में चन्द्रमा उदित हुआ था और दम्भी के द्वारा इसको शाप दे दिया गया था तब यह अत्यन्त आतुर हो गया था । उस समय में इन्हीं गणेश ने इसको अपने भाल में धारण कर लिया था । तभी से इसका नाम भाल चन्द्र कहा गया है ।३६। प्राचीन काल में पहिले सात मुनियों ने एक बार इसको शाप दे दिया था । इसी कारण से यह क्षीणता को प्राप्त हो गया था । इनके द्वारा एक बार जातवेदा (अग्नि) दीपित किया गया था । इसी कारण से तभी से इनका शूर्पकर्णक नाम हो गया था ।३७। पहिले समय में देवों और असुरों का महान् भीषण देवासुर संग्राम हुआ था उसमें देवगणों के द्वारा इनकी बड़ी अर्चना हुई थी । उससे परम प्रसन्न होकर इन्होंने सभी विघ्नों का निवारण कर दिया था । फिर तभी से इनका विघ्न नाश—यह शुभ नाम पड़ गया था ।३८। हे देवि ! आज परशुराम के द्वारा इसके ऊपर अपने कुठार का प्रहार किया गया है हे भद्रे ! इससे दैववशात् इनका एक

भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४७

दाँत टूटकर गिर गया है। इसीलिये इतने इसको एकदन्त कर दिया है ।३६। हे हर ! वल्लभे ! इसके अनन्तर यह ब्रह्मा के पर्याय में होंगे। कुठार के ही प्रहार से इनका मुख कुछ वक्र सा हो गया है तभी से बुधों के द्वारा इनको वक्रतुण्ड कहा गया है ।४०। हे पार्वति ! इसी भाँति से आपके इस पुत्र (गणेश) के अनेक नाम हैं। जिनका तीनों कालों में अर्थात् प्रातः- मध्याह्न और सायंकाल में स्मरण करने वाले होते हैं ।४१। इस त्रयोदशी कल्प से पूर्व कदम्बीभव में मैंने ही इनको यह वरदान दे दिया था कि समस्त देवों के पूजन के पहिले इन्हीं का सर्वप्रथम पूजन हुआ करेगा ।४२।

जातकमादिसंस्कारे गर्भाधानादिकेऽपि च । यात्रायां च वणिज्यादौ युद्धे देवार्चने शुभे ॥४३ संकष्टे काम्यसिद्ध्यर्थं पूजयेद्यो गजाननम् । तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्ध्यंत्येव न संशयः ॥४४ वसिष्ठ उवाच- इत्युक्तं तु समाकर्ण्य कृष्णेन सुमहात्मना । पार्वती जगतां नाथा विस्मिताऽसीच्छुभानना ॥४५ यदा नैवोत्तरं प्रादात्पार्वती शिवसन्निधौ । तदा राधाऽब्रवीद्दे वीं शिवरूपा सनातनी ॥४६ श्री राधोवाच- प्रकृतिः पुरुषश्चोभावप्योन्याश्रयविग्रहौ । द्विधा भिन्नौ प्रकाशेते प्रपंचेस्मिन् यथा तथा ॥४७ त्वं चाहमावयोर्र्देवि भेदो नैवास्ति कश्चन । विष्णुस्त्वमहमेवास्मि शिवो द्विगुणतां गतः ॥४८ शिवस्य हृदये विष्णुर्भवत्या रूपमास्थितः । मम रूपं समास्थाय विष्णोश्च हृदये शिवः ॥४९

जातकर्म आदि षोडश संस्कारों के कराने के समय में तथा गर्म के आधान आदि कर्मों में—यात्रा के करने के समय में वाणिज्य आदि व्यसार्यों के करने के काल में—संग्राम के आरम्भ करने के समय में एवं किसी भी

३४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शुभ कार्य के करने के समय में तथा सङ्कट के आ पड़ने पर और किसी भी कामना से युक्त कार्य की सिद्धि के लिए जो भी कोई इन गजानन प्रभु का पूजन करेगा उस पुरुष के समस्त कार्य अवश्यमेव सिद्ध हो जाया करते हैं— इनमें कुछ भी संशय नहीं है ।४३-४४। श्री वसिष्ठजी ने कहा—परम शुभ मुख वाली जगतों की स्वामिनी पार्वती श्रीकृष्ण महान् आत्मा वाले प्रभु के द्वारा इस प्रकार से कहे हुए वचन का श्रवण करके अत्यन्त विस्मित हो गयी थीं ।४५। जब भगवान् शिव की सन्निधि में पार्वतीजी ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था उस समय में सनातनी शिव के स्वरूप वाली राधा जी ने देवी से कहा था ।४६। श्री राधाजी ने कहा—जिस रीति से इस प्रपञ्च में पुरुष और प्रकृति दोनों परस्पर में एक दूसरे के आश्रम में विग्रहों (स्वरूपों) को रखने वाले हैं और दो रूपों में भिन्न प्रकाशित हुआ करते हैं उसी रीति से हे देवि ! तुम और मैं दोनों में दो रूप तो हैं किन्तु वस्तुत कोई भी भेद नहीं है । तुम विष्णु और मैं ही शिव हूँ और द्विगुणता को प्राप्त हुआ है ।४७-४८। भगवान् शिव के हृदय में विष्णु आपके रूप में समास्थित हैं और मेरे रूप में समास्थित होकर भगवान् विष्णु के हृदय में शिव है ।४६।

एष रामो महाभागे वैष्णवः शैवतां गतः । गणेशोऽयं शिवः साक्षाद्वैष्णवत्वं समास्थितः ॥५० एतयोरावयोः प्रभ्वोश्चापि भेदो न दृश्यते । एवमुक्त्वा तु सा राधा क्रोडे कृत्वा गजाननम् ॥५१ मूर्द्धन्यु पाघ्राय पस्पर्श स्वहस्तेन कपोलके । स्पृष्टमात्रे कपोले तु क्षतं पूर्त्तिमुदागतम् ॥५२ पार्वतीसुप्रसन्नाभूदनुनीताऽथ राधया । पादयोः पतितं राममुत्थाप्य निजपाणिना ॥५३ क्रोडीचकार सुप्रीता मूर्द्धन्यु पाघ्राय पार्वती । एवं तयोस्तु सत्कारं दृष्ट्वा रामगणेशयोः ॥५४ कृष्णः स्कन्दमुपाकृष्य स्वांके प्रेम्णा न्यवेशयत् । अथ शम्भुरपि प्रीतः श्रीदामानमुपस्थितम् ॥५५ स्वोत्संगे स्थापयामास प्रेम्णा सत्कृत्य मानदः ॥५६