संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें३३८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रयोजन है आप यहाँ पर ही रहिए। मैं वहाँ पर जैसा भी देखूँगा और जो भी उस समय में उचित होगा, करूँगा ।४६।
अत्रैव माता तातश्च त्वया नाम निरूपितौ । जगतां पितरौ तौ च पार्वतीपरमेश्वरौ ॥५० इत्युक्त्वा भार्गवो राजन्नंतर्गन्तुं समुद्यतः । विनायकस्तदोत्थाय वारयामास सत्वरम् ॥५१ वाग्युद्धं च तयोरासीन्मिथो हस्तविकर्षणम् । दृष्ट्वा स्कन्दस्तु सम्भ्रान्तो बोधयामास तौ तदा ॥५२ बाहुभ्यां द्वौ समुद्गृह्य पृथगुत्सारितौ तथा । अथ क्रुद्धो गणेशाय भार्गवः परवीरहा । परश्वधं समादाय संप्रक्षेप्तुं समुद्यतः ॥५३ तं दृष्ट्वा गजाननो भृगुवरं क्रोधात्क्षिपंतं त्वरा स्वात्मार्थं परशुं तदा निजकरेणोद्धृत्य वेगेन तु । भूर्लोकं भुवः स्वरपि तस्योर्ध्वं महर्वैजनं लोकं चापि तपोऽथ सत्यमपरं वैकुंठमप्यानयत् ॥५४ तस्योर्ध्वं च निदर्शयन्भृगुवरं गोलोकमीशात्मजो निष्पात्या धरलोक सप्तकमप॑त्थि दर्शयामास च । उद्धृत्याथ ततो हि गर्भसलिले प्रक्षिप्तमात्रं त्वरा भीतं प्राणपरिप्सुमानयद्धथो तत्रैव तत्रास्थितः ॥५५
वहीं पर माता जगदम्बा हैं और पिता भगवान शंकर हैं, आपने दोनों के नाम निरूपित कर ही दिये हैं। वे पार्वती और परमेश्वर तो सम्पूर्ण जगतों के पिता-माता हैं ।५०। हे राजन ! इतना भर कहकर भार्गव राम अन्दर जाने के लिए उद्यत हो गये थे। उसी समय में विनायक ने शीघ्र ही उठकर उनका वारण कर दिया था अर्थात् अन्तः पुर में जाने से रोक दिया था ।५१। पहिले तो उन दोनों का वाग्युद्ध अर्थात् कहा सुनी हुई और फिर हाथों की खींच तान हुई, जब कार्त्तिकेय जी ने देखा तो उनको बहुत सम्भ्रान्ति हुई थी और उस समय में उन्होंने दोनों को समझाया था ।५२। स्वामी स्कन्द ने अपनी बाहुओं से पकड़कर उन दोनों को अलग-अलग