संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३७
स्त्रीविच्छेदो भवेत्तस्य ध्रुवं सप्तसु जन्मसु ॥४५॥ श्रोणि वक्षःस्थलं वक्त्रं यः पश्यति परस्त्रियः । मातुर्वापि भगिन्या वा दुहितुः स नराधमः ॥४६॥ भार्गव उवाच- अहो श्रुतमपूर्वं किं वचनं तव वक्त्रतः । भ्रान्त्या विनिर्गतं वापि हास्यार्थमथवोदितम् ॥४७॥ कामिनां सविकाराणामेतच्छास्त्रनिदर्शनम् । निर्विकारस्य च शिशोर्न दोषः कश्चिदेव हि ॥४८॥ यास्याम्यंतः पुरं भ्रातस्तव किं तिष्ठ बालक । यथादृष्टं करिष्यामि तत्र यत्समयोचितम् ॥४९॥
हे तात ! पति और पत्नी जब एक ही आसन पर संस्थित होकर संयुक्त होवें और साथ में निरत होवें उस समय में जो कोई भी सुरत-सुख का भङ्ग किया करता है वह निश्चय ही नरक में गमन किया करता है ।४३। यह तो सर्व साधारण के लिए नियम है और विशेष रूप से हे द्विज ! जो कोई अपने पिता-गुरु अथवा भूपति को जबकि वे रहस्य में समुपसीन हों तो इनको कभी भी बाधा डालते हुए नहीं देखना चाहिए-यह निश्चित सिद्धान्त की बात है ।४४। चाहे इच्छा से या बिना ही इच्छा के कहीं पर भी सुरत क्रीड़ा में उन्मुख पति-पत्नी को जो कोई देखता है अर्थात् देखा करता है उसकी स्त्री का विच्छेद सात जन्मों तक हो जाया करता है यह परम निश्चित है ।४५। जो पराई स्त्री के श्रोणि-वक्षः स्थल और मुख को देखता है तात्पर्य यह है कि बुरी दृष्टि से देखा करता है वह चाहे अपनी माता हो-भगिनी हो या दुहिता हो इनमें कोई भी हो तो वह नरों में बड़ा ही अधम होता है ।४६। भार्गव ने कहा-आज मैंने आपके मुख से निकले हुए अपूर्व ही वचन सुने हैं । ये वचन भ्रान्ति से ही निकल गये हैं अथवा आपने हास्य के ही लिये कहे हैं ? ।४७। यह तो सब विकारों से युक्त कामियों के शास्त्र का निदर्शन है अर्थात् कामवासना से वासित अन्तःकरण वाले ही ऐसे विषय की चर्चा किया करते हैं। आप तो विकारों से रहित हैं और शिशु हैं क्या आपको ऐसा कथन करने से कोई दोष नहीं होता है ? ।४८। हे भाई ! मैं तो अन्तः पुर में जाऊँगा । आप तो बालक हैं, आपको इस बात से क्या