भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तमिमं प्रणिपत्यैव यास्यामि स्वगृहं प्रति ॥४० इत्युक्त्वा भार्गवस्तत्र तस्थौ गणपतेः पुरः । प्रोवाच मधुरं वाक्यं भार्गवे स गणाधिपः ॥४१ विनायक उवाच - क्षणं तिष्ठ महाभाग दर्शनं ते भविष्यति । अद्य विश्वेश्वरो भ्रातर्भवान्या सह वर्त्तते ॥४२

मैं फिर हे भाई ! आपको साथ ही लेकर आपका प्रवेश वहाँ पर अभी करा दूँगा । अतएव यहाँ पर कुछ समय तक आप रुकिए । भार्गव नन्दन ने विनायक के इस वचन का श्रवण करके बड़ी ही शीघ्रता से युक्त होकर श्री गणेशजी से कुछ कथन करने का उपक्रम किया था । राम ने कहा— हे भाई ! आप अन्तः पुर में जाकर उन दोनों जगदीश्वरों को प्रणाम करिए अर्थात् मेरा प्रणिपात निवेदित कर दीजिए । पार्वती और शङ्कर इन दोनों को प्रणाम करके मैं तुरन्त ही अपने मन्दिर को गमन करूँगा । कार्त्तवीर्य और सुचन्द्र जो अपने पुत्रों-सैनिकों और बान्धवों के सहित थे एवं अन्य भी सहस्रों नृप जो कि काम्बोज-पहलव शक-कान्यकुब्ज-कोशले-श्वर थे जो कि बड़ी ही अधिक माया वाले और महान् बलवान् थे ।३६-३७-३८-३९। मैंने भगवान् शम्भु की ही कृपा से तथा परिपूर्ण प्रसाद से युद्ध में सबका निहनन किया है । अतएव अब मैं उन्हीं प्रभु के चरणों में प्रणाम करके फिर अपने घर को चला जाऊँगा ।४०। इतना निवेदन करके परशुराम वहाँ पर गणपति के आगे स्थित हो गये थे । फिर उन गणाधिप प्रभु ने भार्गव से बहुत मधुर स्वर में कहा था ।४१। विनायक ने कहा— हे महाभाग ! एक मात्र आप यहाँ पर ठहरिए आपको भगवान् शङ्कर का दर्शन हो जायगा । हे भाई ! आज वे विश्वेश्वर प्रभु भवानी के साथ में विद्यमान हैं ।४२।

स्त्रीपुंसोर्युक्तयोस्तात सहैकासनसंस्थयोः । करोति सुखभंगं यो नरकं स व्रजेद्ध्रुवम् ॥४३ विशेषतस्तु पितरं गुरुं वा भूपतिं द्विज । रहस्यं समुपासीनं न पश्येदिति निश्चयः ॥४४ कामतोऽकामतो वापि पश्येद्यः सुरतोन्मुखम् ।