संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र वर्णन (१) ] [ ३३५
वहाँ पर इन उपर्युक्त गणों के अतिरिक्त बहुत से भूत-प्रेत-पिशाच कूष्मांड-ब्रह्मराक्षस-वेताल-दानवेन्द्र और जटाजूट धारी बड़े-बड़े योगीन्द्र भी थे ।२६। वहाँ उस शिव की नगरी में यक्ष-किम्पुरुष-डाकिनी और योगिनियां भी थीं । इन सबका वहाँ पर परशुरामजी ने अवलोकन किया था । भगवान् शङ्कर के बांई ओर स्वामी कार्त्तिकेय और उनके दाँई ओर विघ्नेश्वर विनायक विराजमान थे। भार्गवेन्द्र ने उन दोनों को प्रणाम किया था क्योंकि ये दोनों शिव के पुत्र शङ्कर के ही समान पराक्रम वाले थे । इससे पूर्व परशुरामजी ने नन्दी की आज्ञा ग्रहण करके ही उस पुर के अन्दर प्रवेश किया था। अन्दर प्रवेश करने की आज्ञा पाकर उनको बहुत ही प्रसन्नता हुई थी। वहाँ पर भुवनों से सदावृत शिवजी के मन्दिर का अवलोकन किया था। यह मन्दिर चार योजन के विस्तार वाला था ।३०-३१-३२। वहाँ पर परम श्रेष्ठ पार्षद और क्षेत्रपाल भी समवस्थित थे ये लोग रत्न जटिल सिंहासनों पर रत्नों के विविध भूषणों से विभूषित होकर विराजमान थे ।३३। जिस समय में भार्गव शिव मन्दिर में प्रवेश कर रहे थे तब उन सबने इनसे पूछा था हे महाराज ! उस समय में विनायक ने उनसे यही कहा था कि एक क्षण मात्र आप यहीं पर ठहरिए ।३४। इस समय में महादेव जी अपनी प्रिय पत्नी जगदम्बा उमा के साथ शयन किये हुए हैं। मैं एक ही क्षण भर में ईश्वर की आज्ञा प्राप्त करके यहीं पर समागत होता हूँ ।३५।
त्वया सार्द्धं प्रवेक्ष्यामि भ्रातस्तिष्ठात्र सांप्रतम् ।
विनायकश्चैवं श्रुत्वा ह्यायश्चिटं भार्गवनंदनः ॥३६
प्रवक्तुमुपचक्राम गणेशं त्वरयान्वितः ।
राम उवाच-
गत्वा ह्यंतःपुरं भ्रातः प्रणम्य जगदीश्वरौ ॥३७
पार्वतीशंकरौ सद्यो यास्यामि निजमन्दिरम् ।
कार्त्तवीर्यः सुचन्द्रश्च सपुत्रबलबांधवः ॥३८
अन्ये सहस्रशो भूपाः कांबोजाः पह्लवाः शकाः ।
कान्यकुब्जाः कोशलेशा मायावन्तो महाबलाः ॥३९
निहताः समरे सर्वे मया शम्भुप्रसादतः ।