संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३३६
कर दिया था। इसके अनन्तर शत्रु वीरों के हनन करने वाले भार्गव गणेश जी पर बहुत क्रुद्ध हो गये थे और अपनी परशु लेकर उसका प्रहार करने के लिए उद्यत हो गये थे ॥५३॥ गजानन ने जब यह देखा था कि भृगुवर बड़ी शीघ्रता से क्रोध में भरकर अपने लिए परशु को प्रक्षिप्त कर रहे हैं तो उन्होंने उसी समय में बड़े ही वेग से अपने हाथ से परशुराम को ऊपर उठा कर भूर्लोक-भुवर्लोक-स्वर्लोक-और उसके भी ऊपर महर्लोक-जनलोक तप-लोक-सत्यलोक और दूसरे वैकुण्ठ लोक में ले आये थे ॥५४॥ उन भगवान शम्भु के पुत्र गजानन ने उन भृगुवर उसके ऊपर गोलोक को दिखाते हुए फिर गिराकर नीचे के सातों अतल-वितल-सुतल-तला-तल-रसातल-महातल और पाताल लोकों को दिखा दिया था। फिर नीचे के लोकों से ऊपर उठाकर सलिल के गर्भ में शीघ्रता से प्रक्षिप्त किया था। जब यह देखा कि वह भयभीत होकर अपने प्राणों की रक्षा करने की इच्छा वाले हैं तो फिर वहाँ पर उनको लाकर खड़ा कर दिया था जहाँ पर वे पहिले स्थित थे ॥५५॥
भार्गव-चरित्र वर्णन (२)
वसिष्ठ उवाच-
एवं संभ्रामितो रामो गणाधीशेन भूपते ।
हर्षशोकसमाविष्टो विचित्यात्मपराभवम् ॥१
गणेशं चाभितो वीक्ष्य निर्विकारमवस्थितम् ।
क्रोधाविष्टो भृशं भूत्वा प्राक्षिपत्स्वपरश्वधम् ॥२
गणेशस्त्वभिवीक्ष्याथ पित्रा दत्तं परश्वधम् ।
अमोघं कर्तुकामस्तु वामे तं दशनेऽग्रहीत् ॥३
स तु दंतः कुठारेण विच्छिन्नो भूतलेऽपतत् ।
भुवि शोणितसंदिग्धो वज्राहत इवाचलः ॥४
दंतपातेन विध्वस्ता साब्धिद्वीपधरा धरा ।
चकंपे पृथिवीपाल लोकास्त्रासमुपागताः ॥५