संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हाहाकारो महानासीद्देवानां दिवि पश्यताम् । कार्त्तिकेयादयस्तत्र चुक्रुशुर्भृशमातुराः ॥६ अथ कोलाहलं श्रुत्वा दंतपातध्वनि तथा । पार्वतीशंकरौ तत्र समाजग्मतुरीश्वरौ ॥७
वसिष्ठ जी ने कहा—हे भूपते ! इस रीति से गणाधीश के द्वारा परशुराम भली भाँति भ्रमित किये गये थे । तब उनको बहुत से अद्भुत लोकों के दर्शन से हर्ष हुआ था और अपने बल पराक्रम की तुच्छता समझ कर बड़ा भारी शोक भी हुआ था ऐसे हर्ष और शोक से समाविष्ट होकर उन्होंने अपने पराभव का चिन्तन किया था ।१। उस समय में गणेश जी को सामने देखा था कि वे बिना विकार वाले अवस्थित हैं तो फिर अत्यन्त क्रोध में भरकर परशुरामजी ने अपने परशु को फेंककर चलाया था ।२। गणेशजी ने यह देखा था कि वह परशु अपने पिताजी के द्वारा राम को दिया गया था । उस परशु के प्रहार को अमोघ अर्थात् सफल करने की ही इच्छा वाले गणेशजी ने उस परशु को अपने बाँये दाँत पर ग्रहण कर लिया था ।३। गणेश जी का वह बाँया दाँत उस कुठार से विच्छिन्न होकर भूतल पर गिर गया था । रुधिर से संदिग्ध (लथपथ) वह दाँत भूमि पर एक पर्वत के ही समान गिर गया था ।४। उस दाँत का पात ऐसा भीषण हुआ था कि सम्पूर्ण सागरों और द्वीपों के सहित यह धरातल विध्वस्त हो गया था और पृथिवीपाल काँप उठे थे तथा सभी लोकों को बड़ा भारी त्रास उत्पन्न हो गया था ।५। स्वर्ग में जो देवगण देख रहे थे उनमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया था और वहाँ पर कार्त्तिकेय आदि जो सब थे वे सभी अत्यन्त आतुर होकर क्रन्दन करने लगे थे ।६। इसके अनन्तर जब बड़ा भारी वहाँ पर कोलाहल हो गया था तो उस दाँत के गिरने की ध्वनि को सुनकर ईश्वर पार्वती तथा भगवान् शङ्कर वहाँ पर समागत हो गये थे ।७।
हेरम्बं पुरतो दृष्ट्वा वक्रतुण्डकदंतिनम् । पप्रच्छ स्कन्दं पार्वती किमेतदिति कारणम् ॥८ स तु पृष्टस्तदा मात्रा सेनानीः सर्वमादितः । वृत्तांतं कथयामास मात्रे रामस्य शृण्वतः ॥६ सा श्रुत्वोदंतमखिलं जगतां जननी नृप ।