संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३४० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
हाहाकारो महानासीद्देवानां दिवि पश्यताम् । कार्त्तिकेयादयस्तत्र चुक्रुशुर्भृशमातुराः ॥६ अथ कोलाहलं श्रुत्वा दंतपातध्वनि तथा । पार्वतीशंकरौ तत्र समाजग्मतुरीश्वरौ ॥७
वसिष्ठ जी ने कहा—हे भूपते ! इस रीति से गणाधीश के द्वारा परशुराम भली भाँति भ्रमित किये गये थे । तब उनको बहुत से अद्भुत लोकों के दर्शन से हर्ष हुआ था और अपने बल पराक्रम की तुच्छता समझ कर बड़ा भारी शोक भी हुआ था ऐसे हर्ष और शोक से समाविष्ट होकर उन्होंने अपने पराभव का चिन्तन किया था ।१। उस समय में गणेश जी को सामने देखा था कि वे बिना विकार वाले अवस्थित हैं तो फिर अत्यन्त क्रोध में भरकर परशुरामजी ने अपने परशु को फेंककर चलाया था ।२। गणेशजी ने यह देखा था कि वह परशु अपने पिताजी के द्वारा राम को दिया गया था । उस परशु के प्रहार को अमोघ अर्थात् सफल करने की ही इच्छा वाले गणेशजी ने उस परशु को अपने बाँये दाँत पर ग्रहण कर लिया था ।३। गणेश जी का वह बाँया दाँत उस कुठार से विच्छिन्न होकर भूतल पर गिर गया था । रुधिर से संदिग्ध (लथपथ) वह दाँत भूमि पर एक पर्वत के ही समान गिर गया था ।४। उस दाँत का पात ऐसा भीषण हुआ था कि सम्पूर्ण सागरों और द्वीपों के सहित यह धरातल विध्वस्त हो गया था और पृथिवीपाल काँप उठे थे तथा सभी लोकों को बड़ा भारी त्रास उत्पन्न हो गया था ।५। स्वर्ग में जो देवगण देख रहे थे उनमें बड़ा भारी हाहाकार मच गया था और वहाँ पर कार्त्तिकेय आदि जो सब थे वे सभी अत्यन्त आतुर होकर क्रन्दन करने लगे थे ।६। इसके अनन्तर जब बड़ा भारी वहाँ पर कोलाहल हो गया था तो उस दाँत के गिरने की ध्वनि को सुनकर ईश्वर पार्वती तथा भगवान् शङ्कर वहाँ पर समागत हो गये थे ।७।
हेरम्बं पुरतो दृष्ट्वा वक्रतुण्डकदंतिनम् । पप्रच्छ स्कन्दं पार्वती किमेतदिति कारणम् ॥८ स तु पृष्टस्तदा मात्रा सेनानीः सर्वमादितः । वृत्तांतं कथयामास मात्रे रामस्य शृण्वतः ॥६ सा श्रुत्वोदंतमखिलं जगतां जननी नृप ।
भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४१
उवाच शंकरं रुष्टा पार्वती प्राणनायकम् ॥१०
पार्वत्युवाच—अयं ते भार्गवः शंभो शिष्यः पुत्रः समोऽभवत् ।
त्वत्तो लब्ध्वा परं तेजो वर्म त्रैलोक्यजिद्विभो ॥११
कार्त्तवीर्यार्जुनं संख्ये जितवानूर्जितं नृपम् ।
स्वकार्यं साधयित्वा तु प्रादात्तुभ्यं च दक्षिणाम् ॥१२
तत्ते सुतस्य दशनं कुठारेण न्यपातयत् ।
अनेनैव कृतार्थस्त्वं भविष्यसि न संशयः ॥१३
त्वमिमं भार्गवं शम्भो रक्षांतेवासिसत्तमम् ।
तव कार्याणि सर्वाणि साधयिष्यति सद्गुरोः ॥१४
भगवान् शङ्कर ने गणेशजी को अपने सामने देखा था जिनका मुख तिरछा हो गया था और केवल एक ही दाँत था। पार्वतीजी ने स्वामी कार्त्तिकेय से पूछा था कि इस दुर्घटना के घटित होने का क्या कारण था ।८। माताजी द्वारा जब स्वामी कार्त्तिकेय से पूछा गया तो सेनानी ने आदि से सम्पूर्ण वृत्तान्त माताजी को कहकर सुना दिया था। उस समय में वहाँ पर परशुराम भी इसको सुन ही रहे थे ।६। हे नृप ! जगतों की जननी पार्वतीजी ने पूर्ण समाचार श्रवण करके रुष्ट होती हुई अपने प्राणनायक भगवान् शङ्कर से बोलीं ।१०। पार्वतीजी ने कहा—हे शम्भो ! यह भार्गव तो आपका ही शिष्य है और पुत्र के ही समान हुआ था। हे विभो ! इसने आप ही से ऐसा परम तेज और त्रैलोक्य को जीतने वाला वर्म प्राप्त किया है ।११। इसने महान् अर्जित कार्त्तवीर्यार्जुन नृप को युद्ध में जीत लिया है यह आप ही के द्वारा प्रदत्त बलविक्रम से इसकी विजय हुई है। इसने अपने कार्य को साधित करके अर्थात् अपने शत्रु का निहनन करके अब यह आपकी सेवा में दक्षिणा दी है ।१२। वह यही तो दक्षिणा है कि आप ही के पुत्र के दाँत को अपने कुठार से तोड़कर नीचे गिरा दिया है। आप इसी कार्य से कृतार्थ होंगे—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।१३। हे शम्भो ! आप इस परम श्रेष्ठ अपने छात्र तथा शिष्य की रक्षा कीजिए। आप इसके बड़े ही अच्छे गुरु हैं अब आपके समस्त कार्यों को यह ही सिद्ध करेगा ।१४।
अहं नैवात्र तिष्ठामि यत्त्वया विमता विभो ।
पुत्राभ्यां सहिता यास्ये पितुः स्वस्य निकेतनम् ॥१५
३४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
संतो भुजिष्यातनयं सत्कुर्वन्त्यात्मपुत्रवत् । भवता तु कृतो नैव सत्कारो वचसाऽपि हि ॥१६ आत्मनस्तनयस्यास्य ततो यास्यामि दुःखिता। वसिष्ठ उवाच- एतच्छ्रुत्वा तु वचनं पार्वत्या भगवान्भवः ॥१७ नोवाच किंचिद्वचनं साधु वासाधु भूपते । सस्मार मनसा कृष्णं प्रणतक्लेशनाशनम् ॥१८ गोलोकनाथं गोपीशं नानानुनयकोविदम् । स्मृतमात्रोऽथ भगवान् केशवः प्रणतार्त्तिहा । आजगाम दयासिंधुर्भक्तश्योऽखिलेश्वरः ॥१९ मेघश्यामो विशदवदनो रत्नकेयूरहारो विद्युद्वासा मकरसदृशे कुण्डले संदधानः । बर्हापीडं मणिगणयुतं बिभ्रदीषत्स्मितास्यो गोपीनाथो गदितसुयशाः कौस्तुभोद्भासिवक्षाः ॥२० राधया सहितः श्रीमान् श्रीदाम्ना चापराजितः ॥२१
हे विभो ! मैं अब यहाँ पर नहीं रहूँगी क्योंकि आपने मेरा अपमान कर दिया है अर्थात् मुझको अपनी नहीं समझा है, अब मैं तो अपने दोनों पुत्रों को साथ में लेकर अपने पिताजी के घर में चली जाऊँगी ।१५। सत्पुरुष तो अपनी पुत्री के पुत्रों को अपने ही पुत्रों के समान सत्कार किया करते हैं । आपने तो अपने वचनों से भी कभी सत्कार नहीं किया है ।१६। यह तो आपका ही पुत्र है फिर भी कभी इसका आदर-सम्मान वाणी के द्वारा भी नहीं किया है । इसी कारण से मैं अधिक दुःखित होकर ही चली जाऊँगी । वसिष्ठ जी ने कहा—भगवान शङ्कर ने अपनी परम प्रिया पत्नी पार्वती के इस वचन का श्रवण किया था ।१७। हे राजन् ! किन्तु इस वचन को सुनकर भी उन्होंने पार्वती जी से अच्छा या कुछ भी वचन उत्तर के स्वरूप में नहीं कहा था । और प्रणतों के क्लेशों का विनाश कर देने वाले भगवान श्री कृष्णचन्द्र का मन में स्मरण किया था ।१८। ब्रज की गोपियों के नाथ और गोलोक के स्वामी तथा अनेक भाँति के अनुनयो-विनयों के ज्ञाता महान
भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४३
मनीषी भगवान् ने ध्यान में मन के द्वारा स्मरण किया था केवल स्मरण करने ही से अपने चरणों में शिर झुकाकर प्रणत होने वाले भक्तों की पीड़ा का हनन कर देने वाले केशव भगवान् वहाँ पर आकर उपस्थित हो गये थे क्योंकि प्रभु तो समस्त चराचर के ईश्वर हैं—दया के सागर हैं और अपने भक्तों के वश में होने वाले हैं ।१६। अब भगवान् के सुन्दर जगत मोहन स्वरूप का वर्णन किया जाता है—उनका वर्ण नील सजल मेघ के समान था--आपका मुख विकसित कमल के सदृश था और आप रत्न जटित केयूर और हार धारण किये हुए थे । सौदामिनी विद्युत के समान पीताम्बर पहिने हुए थे और मकरों की आकृति वाले दो कुण्डल कानों में धारण कर रहे थे । मयूर पिच्छों से निर्मित और अनेक मणियों से संयुत मस्तक पर मुकुट पहिन रहे थे तथा उनके मुख कमल पर मन्द मुस्कान झलक रही थी । वे गोपियों के नाथ जिनके यश का वर्णन किया है कौस्तुभ मणि से उद्भासित वक्षःस्थल वाले थे ।२०। अद्भुत श्री से सम्पन्न श्रीकृष्ण के साथ में रासेश्वरी राधा भी थीं और श्रीदामा से अपराजित थे ।२१।
मुष्णंस्तेजांसि सर्वेषां स्वरुचा ज्ञानवारिधिः ।
अथैनमागतं दृष्ट्वा शिवः संहृष्टमानसः ।।२२
प्रणिपत्य यथान्यायं पूजयामास चागतम् ।
प्रवेश्याभ्यंतरे वेश्म राधया सहितं विभुम् ।।२३
रत्नसिंहासने रम्ये सदारं स न्यवेशयत् ।
अथ तत्र गता देवी पार्वती तनयान्विता ।।२४
ननाम चरणान्प्रभोः पुत्राभ्यां सहिता मुदा ।
अथ रामोऽपि तत्रैव गत्वा नमितकंधरः ।।२५
पार्वत्याश्चरणोपांते पपाताकुलमानसः ।
सा यदा नाभ्यनंदत्तं भार्गवं प्रणतं पुरः ।।२६
तदोवाच जगन्नाथः पार्वतीं प्रीणयन्गिरा ।।२७
श्रीकृष्ण उवाच-
अयि नगनंदिनि निंदितचंद्रमुखि त्वमिमं जमदग्निसुतम् ।
नय निजहस्तसरोजसमर्पितमस्तकमंकमनंतगुणे ।।२८
३४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान के महान् सागर थे और अपने दिव्य देह की कान्ति से सबके तेज को तिरस्कृत कर रहे थे । इसके अनन्तर जिस समय में भगवान् श्रीकृष्ण ने वहाँ पर पदार्पण किया था तो उनका दर्शन करके भगवान् शिव के मन में परमाधिक प्रसन्नता हुई थी ।२२। उन वहाँ पर समागत हुए प्रभु को न्याय के अनुसार जैसा भी महापुरुषों के लिये अभिवादन किया जाता है प्रणिपात किया और अर्चन किया था । फिर बड़े ही आदर से राधिकाजी के साथ प्रभु का अपने सदन में प्रवेश कराया था ।२३। वहाँ पर एक रत्न जटिल परम सुरम्य सिंहासन पर राधिका जी के सहित उनको विराजमान कराया था । इसके अनन्तर जब पार्वती जी ने साक्षात् प्रभु का आगमन देखा तो वह भी अपने दोनों पुत्रों के सहित वहाँ पर पहुँच गयी थीं ।२४। बड़े ही हर्षोल्लास के साथ इन्होंने अपने दोनों पुत्रों के सहित श्रीकृष्ण और श्रीराधा चरणों में प्रणाम किया था । इसके उपरान्त परशुराम भी वहीं पर पहुँच गये थे और अपनी गरदन को नीचे की ओर झुकाये हुए आकुलित मन वाले होकर पार्वती जी के चरणों के समीप में ही भूमि में गिर गये थे । किन्तु जब अपने आगे प्रणिपात करते हुए भार्गव को पार्वती जी ने अभिनन्दित नहीं किया था तो यह भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं उनके हृद्गत अमर्ष का अवलोकन किया था ।२५-२६। उस समय जगतों के नाथ प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी परम मधुर वाणी से पार्वती जी को प्रसन्न करते हुए उनसे कहा था ।२७। श्रीकृष्ण ने कहा—अयि ! नगराज की पुत्रि ! आप तो इतने अधिक सुन्दर मुख वाली हैं कि जिसकी छटा के सामने चन्द्र भी तुच्छ है । आपके अन्दर तो अनन्त गुण गण विद्यमान हैं । अब आप इस जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपने कर कमलों से इसका मस्तक पकड़ कर अपनी गोद में बिठा लीजिए ।२८।
भवभयहारिणि शंभुविहारिणि कल्मषनाशिनि कुंभिगते । तव चरणे पतितं सततं कृतकिल्विषमप्यव देहि वरम् ॥२९
शृणु देवि महाभागे वेदोक्तं वचनं मम । यच्छ्रुत्वा हर्षिता नूनं भविष्यसि न संशयः । विनायकस्ते तनयो महात्मा महतां महान् ॥३०
यं कामः क्रोध उद्वेगो भयं नाविशते कदा । वेदस्मृतिपुराणेषु संहितासु च भामिनि ॥३१
भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४५
नामान्यस्योपदिष्टानि सुपुण्यानि महात्मभिः । यानि तानि प्रवक्ष्यामि निखिलाघहराणि च ॥३२ प्रमथानां गणा ये च नानारूपा महाबलाः । तेषामीशस्त्वयं यस्माद्गणेशस्तेन कीर्त्तितः ॥३३ भूतानि च भविष्याणि वर्त्तमानानि यानि च । ब्रह्मांडान्यखिलान्येव यस्मिँल्लंबोदरः स तु ॥३४ यः स्थिरो देवयोगेन च्छिन्नं संयोजितं पुनः । गजस्य शिरसा देवि तेन प्रोक्तो गजाननः ॥३५
हे शम्भु के साथ बिहार करने वाली देवि ! आप तो समस्त सांसारिक भयों को दूर करने वाली हैं और सभी प्रकार के कल्मषों का विनाश कर देने वाली हैं। हे कुम्भिगते ! अर्थात् मत्तकरिणी के समान मन्द गति वाली ! यह परशुराम अब आपके चरणों में पड़ा हुआ आप को प्रणिपात कर रहा है। यद्यपि इसने निरन्तर आपके अपराध रूपी पाप किया है तथापि इसको क्षमा करके अब वरदान दे दीजिए ।२६। हे देवि ! आप तो महान् भाग वाली हैं। अब आप मेरे वेदों में कहे हुए वचन का श्रवण कीजिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि उस मेरे वचन को सुनकर आप निश्चय ही परम हर्षित हो जायगी। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। यह विनायक (गणेश) आपका पुत्र है और यह महान् आत्मा वाले तथा महान् पुरुषों में भी शिरोमणि महान् पुरुषों में भी शिरोमणि महान् हैं ।३०। इनके हृदय में कभी भी काम-क्रोध-उद्वेग और भय आदि का प्रवेश नहीं हुआ करता है। हे भामिनि ! वेदों में स्मृतियों में पुराणों में तथा संहिताओं में सर्वत्र इनके शुभमानों का वर्णन है ।३१। बड़े-बड़े महात्माओं के द्वारा सुपुण्यमय इनके नामों का उपदेश दिया गया है। वे इनके परम शुभ नाम समस्त अघों के दूर कर देने वाले हैं। जो भी वे नाम हैं उनको मैं अभी आपको बतला दूँगा ।३२। जो भी प्रमथों के गण हैं जिनके विविध स्वरूप हैं और जो महान् बल वाले हैं। उन सबके यह गणेश स्वामी हैं। यही कारण है कि इनका नाम 'गणेश' यह संसार में कहा जाया करता है ।३३। जितने भी जो भी भविष्य में होने वाले हैं और समस्त जो भी ब्रह्माण्ड हैं जिनमें यहीं लम्बोदर हैं अर्थात् लम्बे विशाल उदर वाले यही हैं ।३४। जो भी इस समय में स्थिर है यह पहिले एक बार देव के योग से इनका मस्तक छिन्न हो गया
३४६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
था और फिर उसको संयोजित किया था जो कि एक गज के शिर से ही जोड़ दिया गया था । हे देवि ! इसीलिए यह गजानन नाम वाले हैं ।३५।
चतुर्थ्यामुदितश्चन्द्रो दम्भिणा शप्त आतुरः । अनेन विधृतो भाले भालचन्द्रस्ततः स्मृतः ॥३६ शप्तः पुरा सप्तभिस्तु मुनिभिः संक्षयं गतः । जातवेदा दीपितोऽभूद्येनासौ शूर्पकर्णकः ॥३७ पुरा देवासुरे युद्धे पूजितो दिविषद्गणैः । विघ्नं निवारयामास विघ्ननाशस्ततः स्मृतः ॥३८ अद्यायं देवि रामेण कुठारेण निपात्य च । दशनं दैवतो भद्रे ह्येकदंतः कृतोऽमुना ॥३९ भविष्यत्यथ पर्याये ब्रह्मणो हरवल्लभे । वक्रीभविष्यत्तुण्डत्वाद्वक्रतुण्डः स्मृतोः बुधैः ॥४० एवं तवास्य पुत्रस्य संति नामानि पार्वति । स्मरणात्पापहारीणि त्रिकालानुगतान्यपि ॥४१ अस्मात्त्रयोदशीकल्पात्पूर्वस्मिन्दशमीभवे । मयास्मै तु वरो दत्तः सर्वदेवाग्रपूजने ॥४२
चतुर्थी तिथि में चन्द्रमा उदित हुआ था और दम्भी के द्वारा इसको शाप दे दिया गया था तब यह अत्यन्त आतुर हो गया था । उस समय में इन्हीं गणेश ने इसको अपने भाल में धारण कर लिया था । तभी से इसका नाम भाल चन्द्र कहा गया है ।३६। प्राचीन काल में पहिले सात मुनियों ने एक बार इसको शाप दे दिया था । इसी कारण से यह क्षीणता को प्राप्त हो गया था । इनके द्वारा एक बार जातवेदा (अग्नि) दीपित किया गया था । इसी कारण से तभी से इनका शूर्पकर्णक नाम हो गया था ।३७। पहिले समय में देवों और असुरों का महान् भीषण देवासुर संग्राम हुआ था उसमें देवगणों के द्वारा इनकी बड़ी अर्चना हुई थी । उससे परम प्रसन्न होकर इन्होंने सभी विघ्नों का निवारण कर दिया था । फिर तभी से इनका विघ्न नाश—यह शुभ नाम पड़ गया था ।३८। हे देवि ! आज परशुराम के द्वारा इसके ऊपर अपने कुठार का प्रहार किया गया है हे भद्रे ! इससे दैववशात् इनका एक
भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४७
दाँत टूटकर गिर गया है। इसीलिये इतने इसको एकदन्त कर दिया है ।३६। हे हर ! वल्लभे ! इसके अनन्तर यह ब्रह्मा के पर्याय में होंगे। कुठार के ही प्रहार से इनका मुख कुछ वक्र सा हो गया है तभी से बुधों के द्वारा इनको वक्रतुण्ड कहा गया है ।४०। हे पार्वति ! इसी भाँति से आपके इस पुत्र (गणेश) के अनेक नाम हैं। जिनका तीनों कालों में अर्थात् प्रातः- मध्याह्न और सायंकाल में स्मरण करने वाले होते हैं ।४१। इस त्रयोदशी कल्प से पूर्व कदम्बीभव में मैंने ही इनको यह वरदान दे दिया था कि समस्त देवों के पूजन के पहिले इन्हीं का सर्वप्रथम पूजन हुआ करेगा ।४२।
जातकमादिसंस्कारे गर्भाधानादिकेऽपि च । यात्रायां च वणिज्यादौ युद्धे देवार्चने शुभे ॥४३ संकष्टे काम्यसिद्ध्यर्थं पूजयेद्यो गजाननम् । तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्ध्यंत्येव न संशयः ॥४४ वसिष्ठ उवाच- इत्युक्तं तु समाकर्ण्य कृष्णेन सुमहात्मना । पार्वती जगतां नाथा विस्मिताऽसीच्छुभानना ॥४५ यदा नैवोत्तरं प्रादात्पार्वती शिवसन्निधौ । तदा राधाऽब्रवीद्दे वीं शिवरूपा सनातनी ॥४६ श्री राधोवाच- प्रकृतिः पुरुषश्चोभावप्योन्याश्रयविग्रहौ । द्विधा भिन्नौ प्रकाशेते प्रपंचेस्मिन् यथा तथा ॥४७ त्वं चाहमावयोर्र्देवि भेदो नैवास्ति कश्चन । विष्णुस्त्वमहमेवास्मि शिवो द्विगुणतां गतः ॥४८ शिवस्य हृदये विष्णुर्भवत्या रूपमास्थितः । मम रूपं समास्थाय विष्णोश्च हृदये शिवः ॥४९
जातकर्म आदि षोडश संस्कारों के कराने के समय में तथा गर्म के आधान आदि कर्मों में—यात्रा के करने के समय में वाणिज्य आदि व्यसार्यों के करने के काल में—संग्राम के आरम्भ करने के समय में एवं किसी भी
३४८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शुभ कार्य के करने के समय में तथा सङ्कट के आ पड़ने पर और किसी भी कामना से युक्त कार्य की सिद्धि के लिए जो भी कोई इन गजानन प्रभु का पूजन करेगा उस पुरुष के समस्त कार्य अवश्यमेव सिद्ध हो जाया करते हैं— इनमें कुछ भी संशय नहीं है ।४३-४४। श्री वसिष्ठजी ने कहा—परम शुभ मुख वाली जगतों की स्वामिनी पार्वती श्रीकृष्ण महान् आत्मा वाले प्रभु के द्वारा इस प्रकार से कहे हुए वचन का श्रवण करके अत्यन्त विस्मित हो गयी थीं ।४५। जब भगवान् शिव की सन्निधि में पार्वतीजी ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया था उस समय में सनातनी शिव के स्वरूप वाली राधा जी ने देवी से कहा था ।४६। श्री राधाजी ने कहा—जिस रीति से इस प्रपञ्च में पुरुष और प्रकृति दोनों परस्पर में एक दूसरे के आश्रम में विग्रहों (स्वरूपों) को रखने वाले हैं और दो रूपों में भिन्न प्रकाशित हुआ करते हैं उसी रीति से हे देवि ! तुम और मैं दोनों में दो रूप तो हैं किन्तु वस्तुत कोई भी भेद नहीं है । तुम विष्णु और मैं ही शिव हूँ और द्विगुणता को प्राप्त हुआ है ।४७-४८। भगवान् शिव के हृदय में विष्णु आपके रूप में समास्थित हैं और मेरे रूप में समास्थित होकर भगवान् विष्णु के हृदय में शिव है ।४६।
एष रामो महाभागे वैष्णवः शैवतां गतः । गणेशोऽयं शिवः साक्षाद्वैष्णवत्वं समास्थितः ॥५० एतयोरावयोः प्रभ्वोश्चापि भेदो न दृश्यते । एवमुक्त्वा तु सा राधा क्रोडे कृत्वा गजाननम् ॥५१ मूर्द्धन्यु पाघ्राय पस्पर्श स्वहस्तेन कपोलके । स्पृष्टमात्रे कपोले तु क्षतं पूर्त्तिमुदागतम् ॥५२ पार्वतीसुप्रसन्नाभूदनुनीताऽथ राधया । पादयोः पतितं राममुत्थाप्य निजपाणिना ॥५३ क्रोडीचकार सुप्रीता मूर्द्धन्यु पाघ्राय पार्वती । एवं तयोस्तु सत्कारं दृष्ट्वा रामगणेशयोः ॥५४ कृष्णः स्कन्दमुपाकृष्य स्वांके प्रेम्णा न्यवेशयत् । अथ शम्भुरपि प्रीतः श्रीदामानमुपस्थितम् ॥५५ स्वोत्संगे स्थापयामास प्रेम्णा सत्कृत्य मानदः ॥५६
भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३४६
हे महाभागे ! यह वैष्णव परशुराम शैवता को प्राप्त हुआ है अर्थात् शिव के स्वरूप को प्राप्त हो जाने वाला हो गया है । और साक्षात् यह गणेश शिव हैं जो वैष्णवत्व को प्राप्त हुआ है अर्थात् विष्णु के स्वरूप में समास्थित है । इन हम दोनों प्रभुओं का भी भेद दिखलाई नहीं दिया करता है । इस प्रकार से कहकर श्री राधा ने अपनी गोद में गजानन को बैठा लिया था ।५०-५१। फिर गणेशजी का मस्तक सूँघ कर अपने हाथ से उनके कपोलों का स्पर्श किया था । उनके केवल कर कमल के स्पर्श करते ही तत्क्षण जो भी दाँत के टूट जाने से क्षत हो गया था वह भरकर ठीक हो गया था ।५२। इसके अनन्तर श्री राधा जी के द्वारा अनुनय की गयी पार्वतीजी भी परम प्रसन्न हो गयी थीं और अपने चरणों में मस्तक नवाकर पड़े हुए परशुराम को उन्होंने भी अपने करकमल से पकड़ कर उठा लिया था । पार्वती जी ने परम प्रसन्न होकर उसको अपनी गोद में बिठाकर उसके शिर का उपघ्राण किया था । आर्य संस्कृति में वृद्ध एवं बड़े लोग अपने छोटे बालकों का शिर सूँघ कर उनकी आयु की वृद्धि किया करते थे । इस रीति से उन दोनों राम और गणेश का सत्कार भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने नेत्रों से देखा था । तब श्रीकृष्ण ने भी स्कन्द को अपनी ओर उठाकर बहुत ही प्रेम के साथ अपनी गोद में बैठा लिया था । इसके अनन्तर भगवान् शम्भु ने भी परम प्रसन्न होकर वहाँ पर समुपस्थित श्रीदामा को अपनी गोद में संस्थापित कर लिया था और मान प्रदान करने वाले प्रभु ने उसका बड़ा सत्कार किया था ।५३-५४-५५-५६।
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भार्गव-चरित्र वर्णन (३)
वसिष्ठ उवाच—
एवं सुस्निग्धचित्तेषु तेषु तिष्ठत्सु भूपते ।
भवान्युत्सङ्गतो रामः समुत्थाय कृतांजलिः ॥१
तुष्टाव प्रयतो भूत्वा निर्विशेषं विशेषवत् ।
अद्वयं द्वैतमापन्नं निर्गुणं सगुणात्मकम् ॥२
राम उवाच—
प्रकृतिविकृतिजातं विश्वमेतद्विधातुं मम कियदनुभातं
वैभवं तत्प्रमातुम् ।
३५० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अविदिततनुनामाऽनोष्टवस्त्वेकधामाऽभवदथ भव- भामा पातु मां पूर्णकामा ॥३
प्रकटितगुणमानं कालसंख्याविधानं सकलभवनिदानं कीर्त्यते यत्प्रधानम् । तदिह निखिलतातः संबभूवोक्षपातः कृतकृतकनिपातः पातु मामद्य मातः ॥४
दनुजकुलविनाशी लेखपाताविनाशी प्रथम- कुलविकाशी सर्वविद्याप्रकाशी । प्रसभरचितकाशी भक्तदत्ताखिलाशीरवतु विजितपाशी मां सदा षण्मुखाशी ॥५
हरनिकटनिवासी कृष्णसेवाविलासी प्रणतजनविभासी गोपकन्याप्रहासी । हरकृतबहुमानो गोपिकेशैकतानो विदितबहुविधानो जायतां कीर्तिहा नो ॥६
प्रभुनियतमना यो नुन्नभक्तांतरायो हृतदुरितनिकायो ज्ञानदातापरायोः । सकलगुणगरिष्ठो राधिकांके निविष्टो मम कृतमपराधं क्षंतुमर्हत्यगाधम् ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—हे भूपते ! इस रीति से उन सबके परमा- धिक स्नेह से युक्त चित्त वाले हो जाने पर समवस्थित हुए देखा था तो परशुराम भवानी की गोद से उतर कर दोनों हाथों को जोड़कर पूर्णतया प्रणत हो गये थे ।१। फिर परम प्रयत्नशील होकर विशेषता से रहित की भी विशेष की भाँति स्तुति की थी । आप द्वैत से रहित होते हुए भी अर्थात् एक ही स्वरूप वाले होकर भी इस समय में द्वैत भाव को प्राप्त हो रहे हैं अर्थात् दो स्वरूपों में दर्शन दे रहे हैं । वास्तव में आप गुणों से रहित हैं तो भी अब सगुण स्वरूप से संयुत हैं ।२। परशुराम ने कहा—यह सम्पूर्ण विश्व प्रकृति के विकारों से ही समुत्पन्न हुआ है । इसकी रचना करने के लिए जो
भार्गव-चरित्र वर्णन (३) | [ ३५१
भी आपका वैभव है उसके जानने के लिये मेरा ज्ञान कितना है अर्थात् मैं बहुत ही तुच्छ ज्ञान वाला उसको नहीं जान सकता हूँ। आपका स्वरूप और नाम किसी को भी विदित नहीं हैं किन्तु फिर भी आप अभीष्ट वस्तुओं के एक ही धाम हैं। आप भगवान् शङ्कर की भामिनी हैं और पूर्ण काम वाली हैं। आप मेरी रक्षा कीजिए। ३। सत्त्व-रज और तम-इन गुणों का ज्ञान करने वाला—काल की सख्या का विधान करने वाला—इस सम्पूर्ण संसार का जो मूल कारण है वह प्रधान-इस नाम से कीर्त्तित किया जाया करता है वह यहाँ पर पूर्णतया कृतकृतक निपात वाला उत्कपात जिससे हुआ था हे माता ! वह आप आज मेरा परित्राण कीजिए ।४। सम्पूर्ण दनुओं के कुलों का विनाश करने वाले—लेख पातों में अविनाशी-अपने कुल का सर्वप्रथम विकास करने वाले—समस्त विद्याओं के प्रकाश से समन्वित-अपने बल से ही काशी की रचना के कर्त्ता-अपने भक्तों के लिए सभी प्रकार का आशीर्वाद देने वाले और जिन्होंने पाश को भी जीत लिया है ऐसे षण्मुखों से अशन करने वाले स्वामी कार्त्तिकेय मेरी सदा-सर्वदा रक्षा करें ।५। भगवान् हर के समीप में निवास करने वाले—श्रीकृष्ण की सेवा के विलास वाले-जो भक्त चरणों में प्रणत होते हैं उनको विशेष ज्ञान प्रदान करने वाले-गोपों की कन्याओं के द्वारा प्रहास किये गये-भगवान् शङ्कर जिनका बड़ा मान दिया करते हैं गोपिकेश्वर के एक ध्यान वाले और जिनको बहुत से विधान ज्ञान हैं वे मेरे कीर्त्तिहा होवे ।६। जो प्रभु के चरणों में नियत मन वाले हैं तथा भक्तों के अन्तःकरण में प्रेरणा प्रदान करने वाले-समस्त पापों के समुदाय का हरण करने वाले-ज्ञान के प्रदान में तत्पर-सब प्रकार के गुणगणों में परमश्रेष्ठ और श्री राधाकाजी को गोद में विराजमान प्रभु मेरे किये हुए अगाध अपराध को क्षमा करने के योग्य होते हैं ।७।
या राधा जगदुद्भवस्थितिलयेष्वाराध्यते वा जनैः
शब्दं बोधयतीशवक्त्रं विगलत्प्रेमामृतास्वादनम् ।
रासेशी रसिकेश्वरी रमणहृन्निष्ठानिर्जानंदिनी
नेत्री सा परिपातु मामवनतं राधेति या कीर्त्यते ॥८
यस्या गर्भसमुद्भवो ह्यतिविराडद्यस्यांशभूतो विराड्
यन्नाभ्यंबुरुहोद्भवेन विधिनाैकांतोपदिष्टेन वै
सृष्टं सर्व्वमिदं चराचरमयं विश्वं च यद्रोमसु
ब्रह्मांडानि विभांति तस्य जननी शश्वत्प्रसन्नाऽस्तु सा ॥९
३५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पायाद्यः स चराचरस्य जगतो व्यापी विभुः सच्चिदा-
नंदाब्धिः प्रकटस्थितो विलसति प्रेमांधया राधया ।
कृष्णः पूर्णतमो ममोपरि दयाक्लिन्नांतरः स्यात्सदा
येनाहं सुकृती भवामि च भवाम्यानंदलीनांतरः ॥१०
वसिष्ठ उवाच-
स्तुत्वैवं जामदग्न्यस्तु विरराम ह तत्परम् ।
विज्ञाताखिलतत्त्वार्थो हृष्टरोमा कृतार्थवत् ॥११
अथोवाच प्रसन्नात्मा कृष्णः कमललोचनः ।
भार्गवं प्रणतं भक्त्या कृपापात्रं पुरःस्थितम् ॥१२
कृष्ण उवाच-
सिद्धोऽसि भार्गवेंद्र त्वं प्रसादान्मम सांप्रतम् ।
अद्य प्रभृति वत्सास्मिँल्लोके श्रेष्ठतमो भव ॥१३
तुभ्यं वरो मया दत्तः पुरा विष्णुपदाश्रमे ।
तत्सर्वं क्रमतो भाव्यं समा बह्वीस्त्वया विभो ॥१४
जो श्री राधा इस जगत् के लय-उद्भव और स्थिति काल में भी जनों के द्वारा समाराधित होती हैं-स्वामी के मुख से विगलित प्रेमरूपी अमृत के रसास्वाद का शब्द से ज्ञान कराती हैं-जो रास लीला की स्वामिनी हैं-रसिकों की ईश्वरी है अपने रमण कराने वाले के हृदय में निष्ठा वाली तथा अपने आपको आनन्द पाने वाली वह नेत्री अर्थात् गोपीगणाधीश्वरी जिनका शुभ नाम श्री राधा कीर्तित किया जाया करता है वह अवनत मेरी की रक्षा करें ।८। जिसके गर्भ से अति विराट् स्वरूप का उद्भव हुआ था और जिसका वह विराट् स्वरूप एक अंशभूत ही था-जिसकी नाभि से समुत्पन्न कमल से समुत्पन्न हुए विधाता ने जिसको एकान्त में उपदेश दिया गया था-इस स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण विश्व की रचना की है और जिसके रोमों में ये समस्त ब्रह्माण्ड शोभित हो रहे हैं उस पूर्ण परमेश्वर को जन्म देने वाली जननी मेरे ऊपर निरन्तर प्रसन्न होवे ।९। जो इस चराचर जगत् में व्यापक विभु है और जो सत्-चित् और आनन्द का सागर प्रकट स्वरूप में स्थित होकर प्रेमान्ध श्रीराधा के साथ शोभा प्राप्त करता है वह मेरी रक्षा
भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३५३
करें। परम पूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण मेरे ऊपर करुणा से पसीजे हुए हृदय वाले मेरे ऊपर होवें जिसमे मैं सुकृती हो जाऊँ और आनन्द में लीन अन्तःकरण वाला बन जाऊँ ॥१०॥ वसिष्ठजी ने कहा—इस रीति से जमदग्नि महामुनि के पुत्र परशुराम ने भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र की स्तुति करके फिर इसके पश्चात् वह विरत होकर चुप हो गए थे। वह सम्पूर्ण तत्वों के अर्थों का ज्ञाता एक सफलता प्राप्त होने वाले के ही समान परम प्रसन्न पुलकोद्गम वाला हो गया था ॥११॥ इसके अनन्तर कमलों के सदृश लोचनों वाले परम प्रसन्न आत्मा से युक्त होते हुए श्रीकृष्ण ने अपने आगे उपस्थित-भक्ति भावना से प्रणत तथा कृपा के पात्र भार्गव से कहा—॥१२॥ श्रीकृष्ण बोले—हे भार्गवेन्द्र ! तुम इस समय मेरे प्रसाद (पूर्ण प्रसन्नता) से सिद्ध हो गये हो। हे वत्स ! तुम आज से लेकर इस लोक में सबसे अधिक श्रेष्ठ हो गए हो ॥१३॥ पहिले समय में विष्णु महाश्रम में मैंने आपको वर दिया था। वह सब कुछ हे विभो ! क्रम से बहुत से वर्षों में पूर्ण होना चाहिए अर्थात् पूर्ण हो ही जायगा ॥१४॥
दया विधेया दीनेषु श्रेय उत्तममिच्छता ।
योगश्च साधनीयो वै शत्रूणां निग्रहस्तथा ॥१५
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिंस्तेजसा च बलेन च ।
ज्ञानेन यशसा वापि सर्वश्रेष्ठतमो भवान् ॥१६
अथ स्वगृहमासाद्य पित्रोः शुश्रूषणं कुरु ।
तपश्चर यथाकालं तेन सिद्धिः करस्थिता ॥१७
राधोत्संगात्समुत्थाप्य गणेशं राधिकेश्वरः ।
आलिंग्य गाढं रामेण मैत्रीं तस्य चकार ह ॥१८
अथोभावपि संप्रीतौ तदा रामगणेश्वरौ ।
कृष्णाज्ञया महाभागौ बभूवतुररिंदम ॥१९
एतस्मिन्नंतरे देवी राधा कृष्णप्रिया सती ।
उभाभ्यां च वरं प्रादात्प्रसन्नास्या मुदान्विता ॥२०
राधोवाच—सर्वस्य जगतो वंद्यौ दुराधर्षौ प्रियावहौ ।
मद्भक्तौ च विशेषेण भवंतौ भवतां सुतौ ॥२१
अब मेरा तुम्हारे लिए यह उपदेश है कि परम श्रेय की अभिलाषा रखने वाले आपको जो विचारे दीन प्राणी हैं उन पर दया करनी चाहिए। और तुमको योग की साधना करनी चाहिए तथा अपने शत्रुओं का निग्रह
३५४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भी करना चाहिए । १५। इस लोक में आपके समान अन्य कोई भी तेज-बल-ज्ञान और यश में समानता रखने वाला नहीं है और आप सबमें परम श्रेष्ठतम हैं । १६। उसके अनन्तर आप अपने निवास गृह में पहुँचकर अपने माता-पिता की शुश्रूषा करो । और जब भी समय प्राप्त हो तब तपश्चर्या करो । इससे सिद्धि आपके करतल में स्थित हो जायगी । १७। फिर श्रीराधिका के ईश्वर ने भी राधाजी की गोद से गणेशजी को अपनी बाहुओं से स्वयं उठाकर अपने वक्ष स्थल से लगा लिया था और भली-भाँति स्नेहालिङ्गन करके फिर उनकी मित्रता परशुराम के साथ करादी थी । १८। हे शत्रुओं दमन करने वाले ! इसके उपरान्त उस समय में भगवान् श्रीकृष्ण की आज्ञा से महान भाग वाले वे दोनों ही परशुराम और गणेश बहुत प्रीति वाले हो गये थे अर्थात् उन दोनों की बहुत ही गहरी प्रीतिमयी मित्रता हो गयी थी और पहिले हुआ द्वेष भाव बिल्कुल ही उनके हृदयों से निकल गया था । १९। इसी बीच में परम सती-साध्वी श्रीकृष्ण चन्द्र की प्रिया श्रीराधा देवी अधिक आनन्द से समन्वित होकर प्रसन्न मुख कमल वाली ने उन दोनों के लिए वर दिया था । २०। श्रीराधाजी ने कहा-हे पुत्रो ! इस सम्पूर्ण जगत के द्वारा वन्दना करने के योग्य—असह्य तेज वाले और प्रिय कार्य का आवाहन करने वाले तथा आप दोनों ही विशेष रूप से मेरे भक्त हो जावें । २१।
भवतोर्नाम चोच्चार्य यत्कार्यं यः समारभेत् ।
सिद्धिं प्रयातु तत्सर्वं मत्प्रसादाद्धि तस्य तु ॥२२
अथोवाच जगन्माता भवानी भववल्लभा ।
वत्स राम प्रसन्नाऽहं तुभ्यं कं प्रददे वरम् ।
तं प्रब्रूहि महाभाग भयं त्यक्त्वा सुदूरतः ।
राम उवाच—
जन्मांतरसहस्रेषु येषु येषु व्रजाम्यहम् ॥२३
कृष्णयोर्भवयोर्भक्तो भविष्यामीति देहि मे ।
अभेदेन च पश्यामि कृष्णौ चापि भवौ तथा ॥२४
पार्वत्युवाच—
एवमस्तु महाभाग भक्तोऽसि भवकृष्णयोः ।
भार्गव-चरित्र वर्णन (३) ] [ ३५५
चिरंजीवी भवाशु त्वं प्रसादान्मम सुव्रत ॥२५ अथोवाच धराधीशः प्रसन्नस्तमुमापतिः । प्रणतं भार्गवेन्द्रं तु वरार्हं जगदीश्वरः ॥२६ शिव उवाच- रामभक्तोऽसि मे वत्स यस्ते दत्तो वरो मया । स भविष्यति कार्त्स्न्येन सत्यमुक्तं न चान्यथा ॥२७ अद्यप्रभृति लोकेऽस्मिन् भवतो वलवत्तरः । न कोऽपि भवताद्वत्स तेजस्वी च भवत्परः ॥२८
जो कोई पुरुष आपके शुभ नाम का उच्चारण करके जो भी कुछ कार्य का समारम्भ किया करता है उसका वह कार्य मेरे प्रसाद से निश्चित रूप से सिद्धि को प्राप्त हो जाता है ।२२। इसके उपरान्त भगवान भव (शिव) की वल्लभा भवानी देवी जो इस समस्त जगत को जन्म देने वाली माता हैं, बोली थीं । हे राम, हे वत्स ! मैं तुम से बहुत प्रसन्न हूँ, मुझे तुम यह बतला दो कि तुम्हारे लिए मैं क्या वरदान दे दूँ । हे महान भाग वाले ! उसी वरदान को जो तुमको अभिलाषित हो मुझे स्पष्ट बतलादो और इसमें सर्वथा भय मत करो तथा भय को तो एकदम बहुत दूर हटा दो । परशुराम जी ने कहा—मैं अपने सहस्रों जन्मों में भी जिन जिन देहों में गमन करके समुत्पन्न होऊँ ।२३। श्री राधा कृष्ण और भवानी-भव का अनन्य भक्त होऊँ यही वरदान आप मुझे प्रदान कीजिए । श्री राधा कृष्ण और भव-भवानी—इन दोनों युगलों का मैं कोई भेद भी नहीं देखूँ अर्थात् इनका एक ही स्वरूप मेरी दृष्टि में बना रहे ।२४। जगदम्बा पार्वतीजी ने कहा—हे महाभाग ! इसी प्रकार से होगा । तुम तो भगवान शंकर और श्रीकृष्ण-चन्द्र के परम भक्त हो । हे सुव्रत ! अर्थात् परम सुन्दर व्रत वाले ! मेरी कृपा के प्रसाद से तुम बहुत शीघ्र चिरकाल पर्यन्त जीवित रहने वाले हो जाओ ।२५। इसके पश्चात् इस वसुन्धरा के स्वामी भगवान उमापति परमाधिक प्रसन्न होकर उस राम से बोले और जगत के स्वामी ने जब देखा था कि वह भार्गवेन्द्र परशुराम उनके चरणों में प्रणत हो रहा है तथा वरदान प्राप्त करने का परम योग्य पात्र है तो उन्होंने कहा—।२६। भगवान शिव ने कहा—हे वत्स ! तुम मेरे राम के भक्त हो—यह वरदान मैंने तुमको दिया था । वह वरदान सम्पूर्णतया कहा हुआ सत्य ही होगा और इस वरमें
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अन्यथा कुछ भी नहीं होगा अर्थात् इसमें कुछ भी अन्तर न होगा ।२७। हे वत्स ! इस समस्त लोक में आज ही से आरम्भ करके आपसे अधिक बल- वान कोई भी नहीं होगा और न कोई आपसे अधिक तेज के धारण करने वाला तेजस्वी ही होगा ।२८।
वसिष्ठ उवाच- अथ कृष्णोऽप्यनुज्ञाप्य शिवं च नगनंदिनीम् । गोलोकं प्रययौ युक्तः श्रीदाम्ना चापि राधया ।।२६ अथ रामोऽपि धर्मात्मा भवानीं च भवं तथा । संपूज्य चाभिवाद्याथ प्रदक्षिणमुपाक्रमीत् ।।३० गणेशं कार्त्तिकेय च नत्वापृच्छद्य च भूपते । अकृतव्रणसंयुक्तो निश्चक्राम गृहांतरात् ।।३१ निष्क्रम्यमाणो रामस्तु नंदीश्वरमुखैर्गणैः । नमस्कृतो ययौ राजन्स्वगृहं परया मुदा ।।३२
वसिष्ठजी ने कहा—इसके अनन्तर भगवान श्रीकृष्ण शिव और नग- राज की पुत्री को अनुज्ञापित करके श्रीराधा और श्री दामा के साथ अपने गोलोक धाम को चले गये थे ।२६। इसके पश्चात् धर्मात्मा राम ने भी भग- वान शिव और जगदम्बा का भली-भाँति अर्चन करके और अभिवादन करके इसके अनन्तर उन्होंने प्रदक्षिणा करने का उपक्रम किया था ।३०। हे भूपते ! फिर राम ने गणेशजी और स्वामी कार्त्तिकेय की सेवा में प्रणिपात करके तथा उनसे पूछकर उस गृह के मध्य भाग से बाहिर निष्क्रमण किया था ।३१। हे राजन् ! जिस बेला में राम वहाँ से बाहर निकल कर जा रहे थे उस अवसर पर नन्दीश्वर प्रभृति शिव के मुख्य गणों के द्वारा उनको प्रणाम किया गया था और फिर वह राम बड़ी ही प्रसन्नता से अपने गृह को चले गये थे ।३२।
सगरोपाख्यान (१)
वसिष्ठ उवाच- राजन्नेवं भृगुविद्वानपश्यञ्जनपदान्बहून् । समाजगाम धर्मात्माऽकृतव्रणसमन्वितः ॥१॥
सगरोपाख्यान (१) ] [ ३५७
निलिल्युः क्षत्रियाः सर्वे यत्र तत्र निरीक्ष्य तम् । व्रजंतं भार्गवं मार्गे प्राणरक्षणतत्पराः ॥२ अथाससाद राजेंद्र रामः स्वपितुराश्रमम् । शांतसत्त्वसमाकीर्णं वेदध्वनिनिनादितम् ॥३ यत्र सिंहा मृगा गावो नागमाञ्जारमूषकाः । समं चरंति संहृष्टा भयं त्यक्त्वा सुदूरतः ॥४ यत्र धूमं समीक्ष्यैव ह्यग्निहोत्रसमुद्भवम् । उन्नदंति मयूराश्च नृत्यंति च महीपते ॥५ यत्र सायंतने काले सूर्यस्याभिमुखं द्विजैः । जलांजलीन्प्रक्षिपद्भिः क्रियते भूर्जलाविला ॥६ यत्रांतेवासिभिर्नित्यं वेदाः शास्त्राणि संहिताः । अभ्यस्यंते मुदा युक्तैर्ब्रह्मचर्यव्रते स्थितैः ॥७
श्री वसिष्ठ महामुनि ने कहा— हे राजन् ! इस प्रकार से विद्वान् भृगु बहुत-से जन पदों का अवलोकन करते हुए वे धर्मात्मा राम अकृत व्रण से समन्वित होकर समागत हो गये थे ।१। मार्ग में जहाँ पर भी क्षत्रिय मिले थे वे सब उन परशुराम को देखकर छिप गये थे क्योंकि मार्ग में राम गमन करते हुए उन्हें दिखलाई पड़े थे और वे विचारे अपने प्राणों की रक्षा में परायण होकर इधर-उधर भागे-भागे फिर रहे थे ।२। हे राजेन्द्र ! इसके पश्चात् परशुराम अपने पिता के आश्रम में पहुँच गए थे जो आश्रम परम शान्त जीवों से घिरा हुआ था और जिसमें वेद मन्त्रों की ध्वनि गूंज रही थी ।३। उस आश्रम में स्वभाव जनित वैर भाव भी नाम मात्र को भी नहीं था और परस्पर में निसर्ग शत्रु जीव भी जैसे सिंह और मृग तथा गौ-सर्प-मार्जार और मूषक भी सब मिले-जुले एक साथ सञ्चरण करते थे और अपने स्वाभाविक शत्रुओं का भी भय दूर करके त्याग दिया था ।४। हे महीपते ! जिस आश्रम में निरन्तर अग्नि होत्र के होते रहने से समुत्पन्न हुए धूम (धूँआ) को देखकर ही मेघावरण की भ्रान्ति से अर्थात् घने धूम के द्वारा समावृत अन्तरिक्ष को मेघाच्छन्न समझकर मयूर बहुत प्रसन्न हो रहे थे और अपने चित्रविचित्र पिच्छों को फैला कर नृत्य कर रहे थे जहाँ पर सायंकाल के समय में द्विजगण सूर्यदेव के सम्मुख में जल की अञ्जलियों
३५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
का प्रक्षेप कर रहे थे जिस जल से सारी भूमि आविल हो गई थी अर्थात् भीगकर मटमैले रङ्ग की हो रही थी ।६। जहाँ पर अध्ययन शील बटु ब्रह्म-चारियों के द्वारा नित्य ही वेदों-शास्त्रों और संहिताओं का अभ्यास किया जाता था । ये सभी छात्र परमाधिक हर्ष से समन्वित तथा ब्रह्मचर्य व्रत में समास्थित रहा करते थे ।७।
अथ रामः प्रसन्नात्मा पश्यन्नाश्रमसंपदम् । प्रविवेश शनै राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥८ जयशब्दं नमः शब्दं प्रोच्चरद्भिद्विजात्मजैः । द्विजैश्च सत्कृतो रामः परं हर्षमुपागतः ॥६ आश्रमाभ्यंतरे तत्र संप्रविश्य निजं गृहम् । ददर्श पितरं रामो जमदग्निं तपोनिधिम् ॥१० साक्षाद्भृगुमित्रासीनं निग्रहानुग्रहक्षमम् । पपात चरणोपान्ते ह्यष्टांगालिंगितावनिः ॥११ रामोऽहं तव दासोऽस्मि प्रोच्चरन्निति भूपते । जग्राह चरणौ चापि विधिवत्सज्जनाग्रणीः ॥१२ अथ मातुश्च चरणावभिवाद्य कृतांजलिः । उवाच प्रणतो वाक्यं तयोः संहर्षकारणम् ॥१३ राम उवाच- पितस्तव प्रभावेण तपसोऽतिदुरासदः । कार्त्तवीर्यो हतो युद्धे सपुत्रबलवाहनः ॥१४
इसके अनन्तर उस परम पुनीत आश्रम की अनिर्वचनीय विशाल विभूति का अवलोकन करने से प्रसन्न आत्मा वाले राम ने हे राजन् ! अपने पालित अकृत व्रण के सहित मन्दगति से उस आश्रम में प्रवेश किया था ।८। जैसे ही राम ने भीतर अपना पदार्पण किया था वैसे ही उनका दर्शन करके वहाँ पर स्थित द्विजों के बालकों ने जय-जयकार और नमस्कार की ध्वनियों को प्रोच्चारण किया था और विप्रों के द्वारा भार्गवेन्द्र राम का बड़ा ही अधिक सम्मान-सत्कार किया गया था । इस रीति से अपने स्वागत-समादर को देखते हुए राम को परमाधिक हर्ष हुआ था ।६। उस आश्रम के
सगरोपाख्यान (१) ] [ ३५६
अन्दर अपने गृह में जब राम ने प्रवेश किया था तो वहाँ पर परशुराम जी ने तपस्या के परम निधि अपने पिताश्री जमदग्नि महामुनि का दर्शन किया था।१०। वे जमदग्नि मुनि साक्षात् अपने पूर्व पुरुष भृगु मुनि के समान वहाँ पर विराजमान थे जो अपने तपोबल से विग्रह और अनुग्रह करने की विशाल सामर्थ्य धारण करने वाले थे। उनके समीप में पहुँचकर राम ने उनके चरण कमलों के निकट में अपने आठों अङ्गों से भूमि का आलिङ्गन करते हुए गिर गये थे अर्थात् भूमि पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम किया था।११। हे भूपते ! परशुराम ने प्रणिपात करते हुए—मैं आपका दासानुदास राम हूँ—आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित है—ऐसा मुख से उच्चारण करते हुए उस सज्जनों में प्रमुख राम ने प्रणाम करने की विधि से साथ पिताश्री के दोनों चरणों का ग्रहण किया था।१२। इसके अनन्तर उन्होंने अपनी माता श्री के चरणों में करबद्ध होते हुए अभिवादन किया था। फिर परम प्रणत होकर उन दोनों माता-पिता के अतीव हर्ष का कारण स्वरूप वाक्य कहा था।१३। राम ने कहा—हे पिताजी, आपके परम दुरासद तप के प्रभाव से ही मैंने बड़े बलवान कार्त्तवीर्य राजा का पुत्रों-सैनिकों और वाहनों के सहित हनन कर दिया है। इस निवेदन का तात्पर्य यही है कि उस इतने बलशाली शत्रू के निपातन करने में मेरा पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है यह सब कुछ आपके ही तप का प्रभाव है जिस से मेरे द्वारा वह दुष्ट मारा गया है।१४।
यस्तेऽपराधं कृतवान्दुष्टमंत्रिप्रचोदितः ।
तस्य दण्डो मया दत्तः प्रसह्य मुनिपुंगव ॥१५॥
भवन्तं तु नमस्कृत्य गतोऽहं ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।
तं नमस्कृत्य विधिवत्स्वकार्यं प्रत्यवेदयम् ॥१६॥
स मामुवाच भगवाञ्छ्रुत्वा वृत्तांतमादितः ।
व्रज स्वकार्यसिद्धयर्थं शिवलोकं सनातनम् ॥१७॥
श्रुत्वाऽहं तद्वचस्तात नमस्कृत्य पितामहम् ।
गतवाञ्छिवलोकं वै हरदर्शनकांक्षया ॥१८॥
प्रविश्य तत्र भगवन्नुमया सहितः शिवः ।
नमस्कृतो मया देवो वांछितार्थप्रदायकः ॥१९॥