संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 338, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
संतो भुजिष्यातनयं सत्कुर्वन्त्यात्मपुत्रवत् । भवता तु कृतो नैव सत्कारो वचसाऽपि हि ॥१६ आत्मनस्तनयस्यास्य ततो यास्यामि दुःखिता। वसिष्ठ उवाच- एतच्छ्रुत्वा तु वचनं पार्वत्या भगवान्भवः ॥१७ नोवाच किंचिद्वचनं साधु वासाधु भूपते । सस्मार मनसा कृष्णं प्रणतक्लेशनाशनम् ॥१८ गोलोकनाथं गोपीशं नानानुनयकोविदम् । स्मृतमात्रोऽथ भगवान् केशवः प्रणतार्त्तिहा । आजगाम दयासिंधुर्भक्तश्योऽखिलेश्वरः ॥१९ मेघश्यामो विशदवदनो रत्नकेयूरहारो विद्युद्वासा मकरसदृशे कुण्डले संदधानः । बर्हापीडं मणिगणयुतं बिभ्रदीषत्स्मितास्यो गोपीनाथो गदितसुयशाः कौस्तुभोद्भासिवक्षाः ॥२० राधया सहितः श्रीमान् श्रीदाम्ना चापराजितः ॥२१
हे विभो ! मैं अब यहाँ पर नहीं रहूँगी क्योंकि आपने मेरा अपमान कर दिया है अर्थात् मुझको अपनी नहीं समझा है, अब मैं तो अपने दोनों पुत्रों को साथ में लेकर अपने पिताजी के घर में चली जाऊँगी ।१५। सत्पुरुष तो अपनी पुत्री के पुत्रों को अपने ही पुत्रों के समान सत्कार किया करते हैं । आपने तो अपने वचनों से भी कभी सत्कार नहीं किया है ।१६। यह तो आपका ही पुत्र है फिर भी कभी इसका आदर-सम्मान वाणी के द्वारा भी नहीं किया है । इसी कारण से मैं अधिक दुःखित होकर ही चली जाऊँगी । वसिष्ठ जी ने कहा—भगवान शङ्कर ने अपनी परम प्रिया पत्नी पार्वती के इस वचन का श्रवण किया था ।१७। हे राजन् ! किन्तु इस वचन को सुनकर भी उन्होंने पार्वती जी से अच्छा या कुछ भी वचन उत्तर के स्वरूप में नहीं कहा था । और प्रणतों के क्लेशों का विनाश कर देने वाले भगवान श्री कृष्णचन्द्र का मन में स्मरण किया था ।१८। ब्रज की गोपियों के नाथ और गोलोक के स्वामी तथा अनेक भाँति के अनुनयो-विनयों के ज्ञाता महान